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फेमिनिज़म इन इंडिया अपने बेहतरीन लेखकों में से एक लेखक को हर महीने उनके योगदान का आभार जताने के लिए फीचर करता है। लेखकों के योगदान के बिना फेमिनिज़म इन इंडिया का सफ़र अधूरा होता। दिसंबर की फीचर्ड राइटर ऑफ द मंथ हैं रितिका श्रीवास्तव से। रितिका ने फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए जेंडर, नारीवाद, विशेषाधिकार आदि मुद्दों पर कई बेहतरीन लेख लिखे हैं। महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर पितृसत्तात्मक समाज की चुप्पी, हिंसक मर्दानगी नहीं, पुरुषों को थामना चाहिए नारीवाद का हाथ, ऑनलाइन शिक्षा और घर का माहौल लड़कियों के लिए दोहरी चुनौती उनके कुछ बेहतरीन लेखों के उदाहरण हैं।

फेमिनिज़म इन इंडिया : अपने बारे में हमें बताएं और आप क्या करती हैं?

रितिका श्रीवास्तव : मैं उत्तर प्रदेश के लखनऊ की रहने वाली हूं। मैंने ग्रेजुएशन और मास्टर्स यूनिवर्सिटी ऑफ़ लखनऊ से किया है। मैंने लखनऊ यूनिवर्सिटी से एमएड करने के बाद 2014 में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान हैदराबाद में एमफिल और पीएचडी इंटीग्रेटेड कोर्स एजुकेशन में दाखिला लिया। 2016 में एजुकेशन से एमफिल करने के बाद क्षेत्रीय शिक्षा संस्थान भोपाल में शिक्षा विभाग में तीन साल असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर रह कर अध्ययन-अध्यापन किया। फिलहाल टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान हैदराबाद से एजुकेशन में पीएचडी कर रही हूं। साथ ही फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए लेख लिखना और पढ़ना मुझे पसंद है। मेरा विश्वास है कि ‘शिक्ष ‘ समाज में सामाजिक परिवर्तन ला सकती है। मैं सामाजिक न्याय, समानता और शांति में विश्वास रखती हूं। मैं रोज़मर्रा की ज़िंदगी और इंसान के स्वभाव पर गौर करने और उस पर लिखने का शौक रखती हूं। मुझे बच्चों और शिक्षकों के साथ काम करना अच्छा लगता है। भविष्य में मैं और लिखना चाहती हूं , मैं लिखना चाहती हूं कि किस प्रकार हम सभी जीवन से जुड़े एक्शन्स के प्रति सचेत रहकर या सचेत न रहकर समानता या असमानता , न्याय या अन्याय, शांति या हिंसा का अभ्यास करने लगते हैं और फिर इसके तहत हम स्वयं समाज और सामाजिक दायरे बना देते हैं।

फेमिनिज़म इन इंडिया : आप फेमिनिज़म इन इंडिया से बतौर लेखक कैसे जुड़ी?

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रितिका श्रीवास्तव: मैं पिछले लगभग दो सालों से फेमिनिज्म इन इंडिया के लेख पढ़ती रही हूं। इस साल अगस्त 2020 में मैंने अपना पहला लेख फेमिनिज़म इन इंडिया हिंदी में भेजा था। लेख प्रकाशित होने के बाद मैंने अन्य लेख लिखे और भेजे। मैं फेमिनिज़म इन इंडिया हिंदी की संपादक, सह-संपादक और टीम की आभारी हूं कि आपने मेरे लेख प्रकाशित किए।

फेमिनिज़म इन इंडिया : आप कब और कैसे एक नारीवादी बनीं? नारीवाद से जुड़े कौन से मुद्दे आपके बेहद करीब हैं?

रितिका श्रीवास्तव : 2015 में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान हैदराबाद में एडमिशन मिलना मेरे जीवन का एक अहम् मोड़ रहा। TISS में एडमिशन लेने और बेहतर टीचर्स और दोस्तों के साथ ने मुझे जीवन के मुद्दों जैसे जेंडर, जाति, रंग, धर्म इत्यादि पर सोचना और सवाल करना सिखा दिया। क्षेत्रीय शिक्षा संस्थान, भोपाल के विद्यार्थियों और टीचर्स के अनुभवों ने मुझे नारीवाद के विषय में और पढ़ने-समझने के लिए प्रेरित किया । घर-परिवार और समाज से जुड़े नारीवाद के मुद्दे मेरे करीब हैं। साथ ही मैं मर्दानगी, जाति और धर्म के विषय में लिखना और पढ़ना पसंद करती हूं। मैं मानती हूं कि नारीवादी होना समाज को मजबूती प्रदान करना है , समानता के सवाल उठाना है और बेहतर भविष्य की ओर बढ़ना है।

फेमिनिज़म इन इंडिया : हमारी वेबसाइट पर प्रकाशित आपके लेखों में से कौन सा लेख आपको सबसे अधिक पसंद है?

रितिका श्रीवास्तव : मेरा पसंदीदा लेख है – क्वारंटीन में रहने का मेरा अनुभव जब मैंने घर का कोई काम नहीं किया

फेमिनिज़म इन इंडिया : जब आप नारीवादी मुद्दों, जेंडर, सामाजिक न्याय पर नहीं लिख रहे होते तब आप क्या करती हैं?

रितिका श्रीवास्तव : जब मैं नारीवादी मुद्दों, जेंडर, सामाजिक न्याय पर नहीं लिख रही होती तो मैं पीएचडी से जुड़े काम में या घर के काम में व्यस्त होती हूं। मेरा पीएचडी का काम 3- ६ साल के टीचर / वालंटियर /बालवाड़ी वर्कर्स और बच्चों पर आधारित है। इसलिए जब मैं नारीवादी मुद्दों के बारे में नहीं लिख रही होती तो बच्चों और महिलाओं के विषय में पढ़ रही होती हूं या उनके बीच होती हूं। फिलहाल मैं कंस्ट्रक्शन साइट्स पर बच्चों के लिए चाइल्ड केयर एंड लार्निंग सेंटर (CCLC) चलाने वाली संस्था Aide–et-Action और पारधी समाज के बच्चों के साथ काम कर रही रही संस्था मुस्कान की बालवाड़ी सुपरवाइजर के सहयोग से वहां काम करने वाले वालंटियर / बालवाड़ी टीचर को मिल सकी हूं। अभी मैं वालंटियर/ बालवाड़ी टीचर का काम और उनकी चुनौतियों, हाशिये पर रह रहे बच्चे उनका जीवन, शिक्षा और समुदाय को समझने की कोशिश कर रही हूं।

फेमिनिज़म इन इंडिया : आपको फेमिनिज़म इन इंडिया और हमारे काम के बारे में क्या पसंद है? आप हमसे और किन-किन चीज़ों की उम्मीद करती हैं?

रितिका श्रीवास्तव : सबसे पहले तो मेरे लिए फेमिनिज़म इन इंडिया का हिंदी भाषा में प्लेटफॉर्म होना ही बहुत खास बात है। मेरे कई दोस्त है जिन्होंने बताया के हिंदी में होने की वजह से वो फेमिनिज़म इन इंडिया में छपे हुए लेख को आसानी पढ़ और समझ पा रहे हैं, लिखी हुई बातों को जीवन से जोड़ कर देखने की कोशिश कर रहे हैं। आपने इतिहास, समाज, इंटरसेक्शनल, स्वास्थ्य, अच्छी खबर, संसाधन ऐसे विभाजन किए हैं जिनकी वजह से थीम आधारित पुराने- नए सभी लेख पढ़ने में आसानी होती है। साथ ही पुस्तकों की समीक्षा और ख़ास बात सेक्शन पढ़ने में मुझे अच्छा लगता है। अगर भविष्य में आप कुछ ऐसा प्रोग्राम कर सकें कि सभी ऑथर और FII टीम साल में एक या दो बार आमने-सामने मिल सकें तो मुझे अत्यधिक ख़ुशी होगी। साथ ही यदि संभव हो तो लेखन के लिए कुछ राशि भुगतान कर सकें तो अच्छा है।


फेमिनिज़म इन इंडिया रितिका का उनके योगदान और उनके बेहतरीन लेखन के लिए आभार व्यक्त करता है। हमें बेहद खुशी है कि वह हमारी लेखकों में से एक हैं।

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