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“अरे, लड़का होगा तो बाप का वंश आगे बढ़ाएगा। बाप को आग देगा।”

एकदिन जब मैं गांव की महिलाओं के साथ लैंगिक भेदभाव पर चर्चा करने गई तब लड़के की ज़रूरत और महत्ता बताते हुए गांव की एक अधेड़ उम्र की महिला ने ऊंचे स्वर में यह ज़वाब दिया। वैसे तो यह कोई अनोखी बात नहीं है या यूं कहूं कि यह हमारे समाज की सच्चाई है। वह समाज जहां लड़कियों को लड़कों से कमतर आंका जाता है, क्योंकि वंश आगे बढ़ाने के लिए लड़के को वरीयता दी जाती है, न कि लड़की को। सत्रह साल ही पूजा (बदला हुआ नाम), पैदल बीस किलोमीटर अपने स्कूल पढ़ने जाती है। पांच बहनों में सबसे छोटी पूजा को स्कूल भेजने का फैसला उसकी ज़िद के कारण किया गया। पूजा के घर में एक साइकिल है वह भी उसके छोटे भाई के लिए। आमतौर पर भाई को स्कूल छोड़ने उसके पापा जाते हैं, लेकिन चूंकि साइकिल बेटे के नाम से ख़रीदी गई है इसलिए वह पूजा को नहीं दी जाती है।

वहीं मंशा (बदला हुआ नाम) की शादी आज से आठ से पहले पंद्रह साल की उम्र में कर दी गई थी क्योंकि उसके घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। बेटे की चाह में छह बहनों का जन्म हुआ जिसमें मंशा सबसे बड़ी थी। पूजा और मंशा दोनों ही गांव में रहती हैं। बीस किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल जाने वाली पूजा पढ़ाई में बेहद कमज़ोर है। उसका स्वास्थ्य भी ठीक नहीं रहता क्योंकि स्कूल जाने से पहले उसे घर में अपने हिस्से का काम करके स्कूल जाने की इजाज़त मिलती है। वहीं तीन बच्चों की मां बन चुकी मंशा एक बार फिर से गर्भवती है और हाल ही में किसी बीमारी के चलते उसके पति का देहांत हो चुका है। मंशा की ज़िंदगी अब मझधार में है। ससुराल में ज़्यादा खेती नहीं है और मायके वाले किसी भी तरह की मदद को तैयार नहीं है।

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ग्रामीण क्षेत्रों में पूजा और मंशा जैसी ढ़ेरों ऐसी बच्चियां हैं, जिनका जन्म ही उनके लड़की होने की वजह से अनचाहा हो गया। बेटे की चाह में ज़्यादा बच्चे पैदा करने का प्रचलन आज भी जारी है। आज भी बेटे की चाह में कई बेटियों को पैदा कर उनकी ज़िंदगी अभावग्रस्त बनाई जाती हैं। ग़ौरतलब है कि बेटे की चाह में जन्मी बच्चियां अनचाही सिर्फ़ उनके बुनियादी अवसरों के लिए होती है। लेकिन घर, परिवार और खेतों के सारे काम करवाने के लिए वे कभी भी अनचाही नहीं होती है। उनके लिए उनकी पढ़ाई, खान-पान या विकास के कोई भी अवसर में भले ही परिवार हाथ पीछे करे लेकिन उनसे दिन-रात काम करवाने में बिल्कुल भी पीछे नहीं हटता है।

गांव में किशोरियों के साथ काम करते हुए मैंने यह भी अनुभव किया है कि ऐसे परिवारों की अनचाही बच्चियों में एक समय के बाद ज़िंदगी को लेकर उदासीनता बढ़ने लगती है क्योंकि बचपन से ही अभाव और भेदभाव का दंश उन्हें मानसिक रूप तोड़ देता है। वे जब भी कुछ करने की इच्छा ज़ाहिर करती हैं तो परिवार उनकी इच्छाओं को कोई तवज्जो नहीं देता। ठीक उसी समय कई बार वही परिवार अपने खेत गिरवी तो कभी बेचकर बेटे की हर इच्छा को पूरा करता है। परिवार का ये रवैया कई बार बच्चियों में द्वेष की भावना भी बढ़ा देता है।

ग़ौरतलब है कि बेटे की चाह में जन्मी बच्चियां अनचाही सिर्फ़ उनके बुनियादी अवसरों के लिए होती है। लेकिन घर, परिवार और खेतों के सारे काम करवाने के लिए वे कभी भी अनचाही नहीं होती है।

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हर सरकार लड़का-लड़की एक समान के विचार को बढ़ावा देने के लिए कोई न कोई योजना ज़रूर लाती है। किशोरियों की शिक्षा के लिए भी हर सरकार में कई योजनाएं भी शुरू की जाती हैं, लेकिन इन सबके बावजूद आज भी गांव का एक तबका लड़कियों की ज़िंदगी को चूल्हे में समेटे हुए है। वह समय के बाद लड़कियों को बोझ मानकर उन्हें ब्याह करके अपना जी छुड़ाता है। इस जी छुड़ाने की प्रवृत्ति के चलते वो कई बार लड़कियों के जीवन को भी जोखिम में डाल देता है। आज हम लाख कहें कि अब लड़का-लड़की में कोई भेद नहीं होता है पर ज़मीनी हक़ीक़त यही है कि लैंगिक भेदभाव आज भी जारी है। इतना ही नहीं, बेटे की चाह में बेटियों के जीवन उनके अस्तित्व को अनचाहा मनाना और उसे अभाव और हिंसा के धकेलना भी आम है।

यूं तो अब लड़कियों ने शिक्षा और अवसर के लिए आवाज़ उठानी शुरू की है, पर वह संख्या अभी भी बहुत सीमित है। पर जो लड़कियां आवाज़ उठाती भी हैं तो उन्हें भले ही वह अवसर दिया जाए लेकिन उन्हें उचित साधन उपलब्ध नहीं करवाए जाते हैं, जैसा पूजा के साथ भी हुआ। इसके चलते एक समय के बाद लड़कियां ख़ुद अपने कदम पीछे करने को मजबूर हो जाती हैं। इसकी एक वजह यह भी है कि जब लड़कियां लड़कर या ज़िद करके अपने लिए किसी अवसर की राह बनाती है तो उसे लेकर किसी भी समस्या को किसी से साझा नहीं कर पाती है, जैसे – रास्ते में यौन उत्पीड़न की समस्या, जिसके बारे में लड़कियां कभी घर में नहीं बताती है क्योंकि इससे उन्हें इस बात का डर होता है कि सुरक्षा के नाम पर उनपर ही पाबंदी लगा दी जाएगी। इन हालात से लैंगिक हिंसा, भेदभाव और जनसंख्या विस्फोट जैसी कई समस्याएं होती हैं और इन सबका का ख़ामियाज़ा महिलाओं और लड़कियों को भुगतना पड़ता है। चूंकि ये समस्याएं सोच से बढ़ती हैं, जिसे बदलने के लिए हमें हर स्तर पर काम करने की ज़रूरत है वरना आधी आबादी का आधा हिस्सा अपनी ज़िंदगी की आहूति अनचाही बेटियों के नाम देने को मजबूर होता रहेगा।

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तस्वीर साभार: Media India

बनारस से दूर करधना गाँव की रहने वाली वंदना ने सामाजिक और आर्थिक संघर्ष के बीच अपनी पढ़ाई पूरी की और एक स्वयंसेवी संस्था में क्षेत्र समन्विका के पद पर कार्यरत है। वंदना अपनी लेखनी के ज़रिए गाँव में नारीवाद, जेंडर और महिला मुद्दों को उजागर करने की दिशा में आगे बढ़ रही है।

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