संस्कृतिमेरी कहानी ‘नौकरी के लिए मेरे काम से अधिक ज़रूरी मुद्दा मेरा शादीशुदा होना क्यों बन गया’

‘नौकरी के लिए मेरे काम से अधिक ज़रूरी मुद्दा मेरा शादीशुदा होना क्यों बन गया’

पता नहीं यह पितृसत्तात्मक समाज कब यह समझेगा कि एक महिला भी अपने बलबूते पर लिख सकती है। अच्छा काम कर सकती है, एक अदद नौकरी पा सकती है।

मुझे अच्छे से याद है बीते साल 13 मार्च को मुझे नई नौकरी मिली थी और उसके कुछ दिन बाद ही कोरोना वायरस महामारी के कारण पूरे देश में लॉकडाउन लग गया था। इस लॉकडाउन ने घर पर सबको कैद तो किया ही लेकिन साथ ही खुशी इस बात की थी कि अब वर्क फ्रॉम होम यानि घर से ही काम करने को मिलेगा। लेकिन कुछ दिन बाद ही सब फीका पड़ गया क्योंकि जहां मैं काम करती थी वहां एक महीने की सैलरी के बाद सैलरी आना ही बंद हो गई। मैं और मेरे साथी दोनों ही परेशानी से गुज़र रहे थे। इसके बाद मैंने अपने संस्थान से कितनी बार यह भी कहा कि मेरा मानसिक स्वास्थ्य ठीक नहीं है। मुझे सैलरी की ज़रूरत थी ताकि मैं अपना इलाज करवा सकूं लेकिन उनकी तरफ़ से कोई जवाब नहीं आया। मैं और परेशान हो गई।

जब मैं उस उक्त संस्थान में काम करने गई थी तो उन्होंने मुझे उस वक़्त ये कहा कि वह मुझे मेरा काम देखते हुए रख रहे हैं। मैं खुश थी। चार महीने काम करने के बाद उन्होंने मुझे केवल आधी तनख्वाह दी गई। जब मैंने उनसे कहा कि बाकी की तनख्वाह भी मुझे चाहिए तो मुझसे कहा गया कि तुम्हें आधी तनख्वाह ही मिलेगी क्योंकि मेरा काम अच्छा नहीं है और मुझे मेरे साथी की वजह से नौकरी पर रखा गया था। उन्होंने मेरे कॉल्स उठाने बंद किए। लॉकडाउन में पैसे नहीं दिए। मेरे साथी उस वक़्त जेल में थे और अकेले एक कमरे में मैं अपने आप को अकेला और मजबूर पा रही थी। मुझे पैसों की ज़रूरत थी लेकिन मेरी परेशानी बढ़ती जा रही थी।

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पता नहीं यह पितृसत्तात्मक समाज कब यह समझेगा कि एक महिला भी अपने बलबूते पर लिख सकती है। अच्छा काम कर सकती है, एक अदद नौकरी पा सकती है।

समाज का हर प्रोग्रेसिव तबका यह सोचता है कि नौकरी करना लड़कियों के लिए महज एक हॉबी, एक शौक की तरह होता है। एक टाइम पास होता है, और वे अपनी नौकरी के लिए सीरियस नहीं होती है। इसके बाद जब मैं लिखने लगी अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर तब भी मुझे यह कहा गया कि मैं खुद ये सब नहीं लिखती, मेरी जगह मेरे साथी लिखते हैं। प्रोग्रेसिव दिखने वाला हमारा यह समाज आज भी उतना ही पितृसत्तात्मक और स्त्रीद्वेष से भरा हुआ है जितना हजारों साल पहले था। मुझे अच्छे से याद है, अपनी शादी के कुछ दिन पहले मैं कहीं इंटरव्यू देने गई थी तो उन्होंने मुझे ये कहकर नौकरी पर नहीं रखा था क्योंंकि मेरी शादी होने वाली थी। यहां तक उन्होंने मुझसे वे सवाल पूछे जो इंटरव्यू से जुड़े हुए नहीं थे क्योंकि लड़कों से ये कोई नहीं पूछता कि वे घर कैसे संभालेंगे। इंटरव्यू लेने वाले के सवाल कुछ इस तरह थे-

आप शादीशुदा हैं?

मैनेज कर लेंगी?

नाइट शिफ्ट कर लेंगी?

आपके पति को कोई ऐतराज़ तो नहीं है?

घरवालों को तो कोई दिक्कत नहीं है?

आप प्रेग्नेंट होने का तो नहीं सोच रही हैं?

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ये सारे सवाल अगर ज़रूरी हैं तो केवल महिलाओं से क्यों पूछे जाते हैं? लेकिन नौकरी से पहले शायद हर महिला से ये सवाल किए जाते हैं और आगे भी किए जाते रहेंगे। आपने सिंदूर नहीं लगाया तो आप शादीशुदा नहीं हैं। आपको हर तरीके से शादीशुदा लगना होता है। उसके लिए आप सिंदूर, मंगलसूत्र, पांव में पायल और हर तरीके का साज-श्रृंगार करें और अगर आप ऐसा नहीं करती हैं, तो समाज को आप शादीशुदा नहीं लगेंगी। पिछले 8 महीनों में यह शायद तीसरी-चौथी बार है, जब ये सवाल मुझसे पूछे गए हैं। मेरे पार्टनर से कभी ये सब नहीं पूछा गया होगा, क्योंकि उन्हें जीवन की चीज़ें मुझसे पूछकर मैनेज नहीं करनी होती हैं। शादी से पहले जब अपने घर पर थी, तो सवाल आते थे,अब जब शादी हो गई है, तब भी ऐसे ही सवाल पूछे जाते हैं क्योंकि शायद एक महिला का इस पितृसत्तात्मक समाज में अपना कोई अस्तित्व नहीं होता। आप शादी करते हैं, तो उस इंसान के साथ अपनी ज़िन्दगी बिताने के लिए लेकिन एक महिला के लिए शादी बहुत बदलाव लाती है। लोगों की बातें और तमाम वे लोग जो आपको बताते हैं कि आप ऐसा करें या आप वैसा करें। आप यह ठीक नहीं कर रही हैं या आप वह ठीक नहीं कर रही हैं।

ये सारे सवाल हमेशा यह बताते रहेंगे कि समाज आज भी उसी ढर्रे पर खड़ा हुआ है। ये सब बातें बताती हैं कि हमारा समाज कितना पिछड़ा हुआ है। ये समाज लैंगिक भेदभाव से पूरी तरह ग्रसित है, पितृसत्तात्मक है। लड़की कोई काम खुद नहीं कर सकती। लड़का ही लिखता होगा। लड़का ही बताता होगा। जबकि ये सवाल किसी आदमी से नहीं पूछे जाते कि उसकी जगह उसकी साथी लिख तो नहीं रही? पता नहीं यह पितृसत्तात्मक समाज कब यह समझेगा कि एक महिला भी अपने बलबूते पर लिख सकती है। अच्छा काम कर सकती है, एक अदद नौकरी पा सकती है।

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तस्वीर: श्रेया टिंगल फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए

About the author(s)

A historian in making and believer of democracy.

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