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मैंने बीए की पढ़ाई के बाद आगे पढ़ने की जब इच्छा ज़ाहिर की तो परिवार में सिरे से सभी ने विरोध किया। आठ भाई-बहनों और मज़दूर परिवार से ताल्लुक़ रखने की वजह से ग़रीबी, अभाव और संघर्ष से मेरा नाता पुराना रहा है। तीन साल कई जगह नौकरी का प्रयास करने के बाद मुझे एक स्वयंसेवी संस्था में काम मिला। यह नौकरी मेरे लिए सिर्फ़ पैसे कमाने का नहीं बल्कि अपने गांव-क्षेत्र में अपनी पहचान बनाने और मेरे आत्मविश्वास को वापस लाने का एक सशक्त ज़रिया भी बनी। संस्था ने मुझे गांव में फ़ील्डवर्क के संयोजन का काम सौंपा। नई सीख और बेहतर अनुभवों से मेरा मनोबल हमेशा और बेहतर काम करने के लिए बढ़ता रहा। इसके बाद हाल ही में, जब मैंने शादी की तो जीवन में एक बंदिश-सी महसूस होने लगी। यह शादी मेरी मर्ज़ी से हुई, लेकिन शादी के बाद बतौर पत्नी और बहु मेरे ऊपर बंदिशों का सिलसिला मेरी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ रहा।

आज जब मैं गांव में महिलाओं और किशोरियों के साथ काम करते हुए उनकी ज़िंदगी के बारे में देखती हूं तो मेरी और उनकी ज़िंदगी एक जैसी ही लगती है। गांव की हर वह लड़की जो पढ़ना चाहती है, नौकरी करना चाहती है और आत्मनिर्भर बनाना चाहती है, उन सभी पर शादी के बाद नकेल कसने का सिलसिला शुरू कर दिया जाता है। अक्सर ससुराल में कहा जाता है, “अब तुम्हारी शादी हो गई है। अब तुम्हें काम करने की क्या ज़रूरत। तुम्हारा पति अब तुम्हें खिलाएगा।‘ समाज की इस सोच का पीड़ित जिस समय महिलाओं को बनाया जाता है ठीक उसी समय पुरुषों को भी इसका सामना करना पड़ता है। उन्हें नकारात्मक मर्दानगी का हवाला देते हुए कहा जाता है, “कैसे मर्द हो तुम शादी होते देरी नहीं तुम्हारी पत्नी तुम्हारे हाथ से बाहर जा रही है या फिर तुम्हारे होते हुए तुम्हारी पत्नी कमाने बाहर जाए, कितना बुरा लगेगा ये देखकर।” नतीजतन पति भी महिला पर उसकी नौकरी या पढ़ाई छोड़ने के लिए दबाव बनाने लगता है।

मेरा मानना है कि शादी की पितृसत्तामक व्यवस्था बुरी है, जो महिला और पुरुष को एक-दूसरे से अलग करके मालिक और नौकर के रिश्ते में बांधती है। इसलिए ज़रूरी है कि शादी को साझेदारी के रिश्ते के रूप में प्रोत्साहित किया जाए।

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ग़ौर करने वाली बात यह है कि शादी के बाद जितना दबाव महिला पर बनाया जाता है उतना ही दबाव पुरुषों पर भी बनाया जाता है क्योंकि हमारा पितृसत्तामक समाज शादी को साझेदारी की बजाय पुरुष के वर्चस्व का रिश्ता मानता है। वह ये मानता है कि शादी के बाद हर संसाधन और महत्वपूर्ण निर्णय लेने की ताक़त सिर्फ़ और सिर्फ़ पुरुषों के हाथों में क़ायम रहे, जिससे वह महिला को अपने क़ाबू में कर सके। पुरुष को कभी उसके परिवार तो कभी उसके दोस्त लगातार उसे पितृसत्ता के अनुसार मर्द के रूप में व्यवहार करने के लिए मजबूर करते है। वह व्यवहार जिसमें महिलाओं की इच्छाओं और उनके विकास की संभावनाओं का हनन किया जाता है।

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इन सबके बावजूद जब महिलाएं अपने काम या पढ़ाई को जारी रखती हैं तो कई बार परिवार वाले तेरा-मेरा की रणनीति भी अपनाते हैं। ऐसा अमिनी गांव की मीरा (बदला हुआ नाम) के साथ हुआ। मीरा काफ़ी पढ़ी-लिखी थी, शादी के बाद ससुराल वालों ने पहले उसपर नौकरी छोड़ने को दबाव बनाया जब बात नहीं बनी तो उसके पति पर दबाव बनाया लेकिन तब भी बात नहीं और मीरा ने अपनी नौकरी ज़ारी रखी तो उसके ससुराल वालों ने एकदिन उसके पति से सवाल किया, तुम्हारी पत्नी तुमसे ज़्यादा कमाती है।” उसपर पति ने ज़वाब दिया, “ज़्यादा कमाए या कम, हमदोनों मिलकर अपना परिवार चलाते है। फिर घरवालों ने कहा, “तुमदोनों कैसे, पैसे तो उसके बैंक में ज़्यादा आते हैं, तुम्हारे नहीं। तुम अपना सोचो।”

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घरवालों की इस बात से मीरा और उसके पति के रिश्ते में दरार पड़ने लगी। मीरा का पति उससे जलने लगा और नतीजतन दोनों की शादी टूट गई। कई बार हमलोगों को लगता है कि मैं और मेरा साथी पढ़ा-लिखा है, समझदार है या वह मेरा हमेशा साथ देगा। लेकिन जैसे ही महिला के रोज़गार, इच्छा या फिर विकास का सवाल आता है तो हमारा पितृसत्तामक समाज अलग-अलग पैंतरों से एक-दूसरे में फूट डालने की कोशिश करता है, जिसके चलते न केवल महिला का बल्कि पुरुष का भी जीवन प्रभावित होता है। कई बार यह प्रभाव घरेलू हिंसा के रूप में देखने को मिलता है तो कई बार मानसिक अस्वस्थता के रूप में।

मेरा मानना है कि शादी को अगर साझेदारी के रिश्ते में लागू किया जाए तो ये एक अच्छे-सफ़ल रिश्ते की सूत्रधार बन सकती है, लेकिन जिस पल इस रिश्ते में पितृसत्ता का रंग चढ़ता है, वह दोनों की ज़िंदगी को प्रभावित करने लगती है। ग्रामीण क्षेत्रों में अक्सर लड़कियों को शादी के बाद अपनी पढ़ाई या नौकरी की आहुति देनी पड़ती है, यही वजह है कि उनमें अक्सर पढ़ाई या फिर आत्मनिर्भर बनने को लेकर उदासीनता देखने को मिलती है क्योंकि बचपन से ही उनके मन में ये बैठा दिया जाता है कि शादी के बाद उसे सिर्फ़ अच्छी पत्नी और अच्छी बहु बनाना है। मैं यह नहीं कहती कि शादी बुरी है बल्कि मेरा मानना है कि शादी की पितृसत्तामक व्यवस्था बुरी है, जो महिला और पुरुष को एक-दूसरे से अलग करके मालिक और नौकर के रिश्ते में बांधती है। इसलिए ज़रूरी है कि शादी को साझेदारी के रिश्ते के रूप में प्रोत्साहित किया जाए।

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तस्वीर साभार :  The Hindu

बनारस से दूर करधना गाँव की रहने वाली वंदना ने सामाजिक और आर्थिक संघर्ष के बीच अपनी पढ़ाई पूरी की और एक स्वयंसेवी संस्था में क्षेत्र समन्विका के पद पर कार्यरत है। वंदना अपनी लेखनी के ज़रिए गाँव में नारीवाद, जेंडर और महिला मुद्दों को उजागर करने की दिशा में आगे बढ़ रही है।

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