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90 के दशक में जब औरत की जिंदगी पर्दे के पीछे जन्म लेती थी और पर्दे के पीछे ही खत्म हो जाती थी तब भारत की एक महिला फ़ातिमा बेगम ने ना सिर्फ अपनी जिंदगी को पर्दे पर उभारा बल्कि फिल्म जगत में भी काम किया। उस फिल्म जगत में जहां महिलाओं का आज भी काम करना इस रूढ़िवादी समाज के द्वारा उन्हें एक अलग श्रेणी में खड़ा कर देता है। फ़ातिमा बेगम का जन्म साल 1892 में भारत के एक मुस्लिम परिवार में हुआ था। इनके पारिवारिक जीवन की बात करें तो ऐसा मानना था कि इनकी शादी नवाब सिदी इब्राहिम मोहम्मद यकुत खान तृतीय से हुई थी। लेकिन इस बात का कोई प्रमाण नहीं है। यहां तक की नवाब ने इनके बच्चों को अपना नाम देने से भी इनकार कर दिया था। इन की तीन बेटियां थी- जु़बैदा, सुल्ताना और शहजा़दी। फा़तिमा ने अपने तीनों बच्चियों की परवरिश अकेले ही की और खुद हमेशा उन्नति के राह पर अग्रसर रहीं।

फा़तिमा बेगम ने जब फिल्म जगत में कदम रखा था तब महिलाओं के रोल भी ज्यादातर पुरुष ही निभाते थे और तब के समय में उनका फिल्म जगत को अपने करियर के रूप में चुनना उनकी एक मजबूत शख्सियत का परिचय देता है लेकिन फातिमा बेगम ने ना सिर्फ फिल्मों में अभिनय किया बल्कि कई फिल्मों की पटकथा लिखी और उन्हें निर्देशित भी किया। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत एक उर्दू नाटक से की थी और अपने उम्दा काम की वजह से बहुत जल्द ही वह मशहूर हो गई। फिर उन्होंने साल 1922 में अपने करियर की पहली फिल्म ‘वीर अभिमन्यु’ में अभिनय किया। जो एक साइलेंट फिल्म थी और आर्देशिर ईरानी द्वारा निर्मित थी। इसके बाद साल 1924 में उन्होंने सीता सरदावा, पृथ्वी बल्लभ, काला नाग और गुल-ए-बकावली जैसी फिल्मों में काम किया। साल 1925 में भी उन्होंने ‘मुंबई नी मोहिनी’ में अपनी अदाकारी का जलवा बिखेरा।

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फिर साल 1926 में उन्होंने अपनी एक फिल्म-निर्माण कंपनी शुरू कर दी जिसका नाम उन्होंने ‘फातिमा फिल्म्स’ रखा। इस फिल्म कंपनी के अंतर्गत उन्होंने बुलबुल-ए-पेरिसतान का निर्देशन किया और यहीं से उनके करियर को एक नया आयाम मिला। इस फिल्म के निर्देशन के बाद से वह भारत की पहली महिला निर्देशक के रूप में उभरी। इस फिल्म में विदेशी तकनीक में इस्तेमाल होने वाले स्पेशल इफेक्ट्स का उपयोग किया गया था। यह एक बड़ी बजट की फिल्म थी और आंकड़ों की मानें तो उस समय में इस फिल्म का निर्माण करने के लिए लाखों रुपए खर्च किए गए थे। फिल्म निर्माण कंपनी बनाने के बाद तीन साल के अंदर ही उन्होंने सात फिल्मों का निर्देशन किया। जिसमें देवी ऑफ लव (1927), हीर रांझा (1928) और चंद्रावली (1928) शामिल है। फिल्म निर्माण कंपनी शुरू करने के दो साल बाद ही साल 1928 में उन्होंने उसका नाम बदलकर ‘विक्टोरिया फा़तिमा फिल्म्स’ रख दिया। उन्होंने अपनी फिल्म निर्माण कंपनी के अलावा कोहिनूर और इंपीरियल स्टूडियो के बैनर तले भी कुछ फिल्मों का निर्देशन किया। उनकी निर्देशित फिल्में भारतीय सिनेमा जगत में भी सफल रहे और साथ ही साथ लोगों के दिलों को भी जीता।

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फा़तिमा बेगम ने जब फिल्म जगत में कदम रखा था तब महिलाओं के रोल भी ज्यादातर पुरुष ही निभाते थे।

फा़तिमा बेगम ने आख़िरी बार साल 1938 में ‘दुनिया क्या कहेगी’ फिल्म में काम किया और इसके बाद उन्होंने अपने मर्जी से फिल्म जगत को अलविदा कह दिया। अपने 16 साल के फिल्मी करियर में उन्होंने नानू भाई और आर्देशिर इरानी जैसे मशहूर फिल्म निर्माताओं के साथ काम किया था। फा़तिमा बेगम की मृत्यु साल 1983 में 91 वर्ष की आयु में हो गई थी। उनकी पूरी जिंदगी भारतीय महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है क्योंकि उन्होंने उस समय में अपने सपनों को तवज्जो दिया जिस समय में लोग औरतों के अस्तित्व को भी तवज्जो नहीं देते थे, ना सिर्फ उन्होंने अपने सपनों को महत्व दिया बल्कि एक अकेली मां होने के बावजूद अपनी बेटियों को पाला और उन्हें काबिल बनाया। उनकी बेटी जु़बैदा ने भारत के पहले ध्वनि सहित फिल्म ‘आलम आरा’ में अभिनेत्री का रोल अदा किया था। फा़तिमा बेगम की शख्सियत इस पितृसत्ता समाज पर एक गहरा चोट करती है। उनका हौसला और जज़्बा काबिल-ए-तारीफ है। क्योंकि आज उनकी पहल की वजह से ही भारतीय सिनेमा जगत में महिलाएं अपने अस्तित्व को मोहताज नहीं है।

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तस्वीर : फेमिनिज़म इन इंडिया

A very simple girl with very high aspirations. An open-eye dreamer. A girl journalist who is finding her place and stand in this society. A strong contradictor of male-dominant society. Her pen always writes what she observes from society. A word-giver to her observations.

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