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एडिटर्स नोट : यह लेख फेमिनिस्ट अप्रोच टू टेक्नॉलजी के प्रशिक्षण कार्यक्रम से जुड़ी लड़कियों द्वारा लिखे गए लेखों में से एक है। इन लेखों के ज़रिये बिहार और झारखंड के अलग-अलग इलाकों में रहने वाली लड़कियों ने कोविड-19 के दौरान अपने अनुभवों को दर्शाया है। फेमिनिज़म इन इंडिया और फेमिनिस्ट अप्रोच टू टेक्नॉलजी साथ मिलकर इन लेखों को आपसे सामने लेकर आए हैं अपने अभियान #LockdownKeKisse के तहत। इस अभियान के अंतर्गत यह लेख बिहार के बक्सर ज़िले की पूनम ने लिखा जिसमें वह बता रही हैं गुड़िया की कहानी।   

गुड़िया का विवाह 14 साल की उम्र में हो गया था। उसका गौना एक साल बाद किया गया था। गुड़िया को नहीं पता था कि उसके साथ ससुराल में क्या होनेवाला है। ससुराल आने के एक साल बाद ही वह गर्भवती हो गई। तीन साल बाद 18 साल की उम्र में उसका दूसरा बच्चा भी हो गया। आज वह बहुत पछताती है। सोचती है कि अगर उसकी जल्दी शादी नहीं हो गई होती, उसने पढ़ाई की होती तो आज उसे मजदूरी नहीं करनी पड़ती, लेकिन उसके साथ ऐसा नहीं हुआ। ससुराल में गुड़िया को उसकी सास कहने लगी कि अगर वह मज़दूरी नहीं करेगी तो घर में खाना कहां से आएगा। उसका पति मकान बनाने के काम में ईंट, बालू, सीमेंट ढोने का काम करता है। सास की गाली के साथ-साथ गुड़िया पति का थप्पड़ भी खाती थी। परेशान होकर गुड़िया ने अपने पति और बच्चे के साथ गांव छोड़कर कहीं बाहर काम करने का सोचा। पति को उसने मनाया और साल 2019 के जुलाई महीने में उसके साथ दिल्ली चली गई। दिल्ली में गुड़िया की मौसी की बहू रहती है यानी उसकी मौसेरी भाभी। वह अच्छी है। उसने गुड़िया के परिवार को अपने घर में कुछ दिन रखा। उसके बाद गुड़िया के पति को चप्पल बनाने की कंपनी में नौकरी मिल गई। तब से वे लोग नेहरू नगर में किराये पर एक कमरा लेकर रहने लगे। वह भी एक कंपनी में प्रेशर कुकर में सीटी सेट करने का काम करने लगी थी।

पति और अपने बच्चों के साथ गुड़िया शहर में अच्छे से रह रही थी। उसके पति ने यहां भी उसके साथ एक-दो बार मारपीट की थी, लेकिन वह उसकी बात मानता भी था। दिल्ली में रहते हुए उसे एक साल होने जा रहा था, अचानक कोरोना महामारी आ गई और कोरोना वायरस के कारण लॉकडाउन लागू हो गया। अचानक सारी कंपनियां बंद हो गई। गुड़िया और उसके पति दोनों का काम बंद हो गया। गुड़िया ने जो थोड़े-बहुत पैसे बचाकर रखे थे वह एक हफ्ते में खत्म हो गए। यहां तक कि खाने के लिए भी पैसे नहीं बचे था। उसका छोटा बच्चा भूख से रोता रहता था। लॉकडाउन के समय जो पका हुआ खाना और राशन बांटा जाता था गुड़िया को वह भी नहीं मिल रहा था। कहा गया कि उन्हीं लोग को खाना और राशन मिलगा जिनके पास आधार कार्ड या राशन कार्ड या कंपनी का आईडी कार्ड हो। गुड़िया के पास कोई कार्ड नहीं था तो उसे कुछ नहीं मिला। सारा गुस्सा उसके पति ने उस पर निकाला। लॉकडाउन में वह अक्सर मारने-पीटने लगा। वह बहुत रोती थी। मैं उसके पास कभी-कभी फोन करती तो वह मुझसे बातें करते वक्त भी रोती थी।   

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मुसीबत के समय गुड़िया की मौसेरी भाभी गुड़िया से पैसा मांगने लगी। गुड़िया के पास पैसे थे ही नहीं। बहुत हिम्मत जुटाकर वह लॉकडाउन के दौरान भी छिप-छिपकर काम कर रही थी ताकि वह और उसका परिवार भूखा न मरे। कंपनी बाहर से बंद करके काम होता था। पीछे के रास्ते से चुपके से वह मास्क लगाकर काम करने जाती थी। लॉकडाउन में 20 दिन काम हुआ लेकिन उस काम का उसे पैसा नहीं मिला। गुड़िया उदास हो गई। उसके इलाके में कुछ बाहर के लोग खाना ऑटो से लाकर बांटते थे। उसने खाना बांटनेवाले लोग से बात की कि उसके छोटे-छोटे बच्चे भूखे हैं। उसे कुछ भी खाने को दे दो, बचा-खुचा दे दो। गुड़िया बोली, “भैया, हमारी सरकार ने तो हमें थाली पीटने और दिया जलाने को कहा, लेकिन सरकार ने हमें हक नहीं दिया। इस वक्त आप लोग खाना भी नहीं दे रहे हैं।” इतना कहने-सुनने पर खाना बांटनेवाले ने थोड़ा सा उसे दे दिया मगर वह बहुत कम खाना था। अपने बच्चों को खिलाकर गुड़िया खुद भूखी रह गई। उसके पति ने उससे बात करना बंद कर दिया था। कुछ भी बोलने पर वह गाली देने लगता था। लॉकडाउन के पहले वह बहुत कम नशा करता था लेकिन लॉकडाउन के समय उसका नशा काफी बढ़ गया। शराब, गुटका और न जाने क्या क्या! शराबी पति गुड़िया से शराब पीने के लिए पैसा मांगता था और नहीं देने पर मारता-पीटता था। इतना ही नहीं, जिस दिन लॉकडाउन लगा उसके पांच दिन बाद मकानमालिक ने सारा पैसा लेकर गुड़िया से अपना कमरा भी खाली करवा लिया। 

काम मिल जाता तो गुड़िया की समस्या दूर हो जाती। उसे पढ़ी-लिखी लड़की बनना था, लेकिन वह एक प्रवासी मज़दूर बनकर रह गई है।

दिल्ली में जोगी एक जगह है। अपने बच्चे और पति के साथ वहां जाकर गुड़िया ने एक मकान मालिक से कमरे के लिए बात की। मकान मालिक ने उसके परिवार को रहने के लिए कमरा दे दिया। उसने गुड़िया की पूरी मदद की। उधर खाना बांटनेवाले लोगों से जो खाना मिलता था उसमें से जब बचता तो मकान मालिक गुड़िया को थोड़ा सा दे देते थे। उसी में से थोड़ा-थोड़ा अपने बच्चों को वह खिलाती थी। उसका एक बच्चा पांच साल का है दूसरा दो साल का। वह खुद सबसे कम खा कर सो जाती थी। किसी तरह गुड़िया ने लॉकडाउन के तीन महीने गुजारे। तमाम मुश्किलों के बीच वह अपने गांव वापस आने का सोचने लगी लेकिन उसके पास में एकदम पैसा नहीं था। आखिरकार उसने अपना सोने का मंगसूत्र बेचने का फैसला किया। सुनार ने मंगलसूत्र लेकर एक हज़ार रुपये गुड़िया को दे दिए। गुड़िया को नहीं पता था कि वह मंगलसूत्र असल में कितने का है। उस पूरी रात वह सोचती रही कि मैं क्या करूं। मकानमालिक का किराया चुकता कर दूं कि अपने गांव चली जाऊं। इतने में उसके पति ने देख लिया कि वह सोई नहीं है। उसने पूछा कि क्या सोच रही हो। गुड़िया ने सारी बात बताई। उसके पति ने सलाह दी कि हमलोग इतने पैसा से कुछ दूर जा सकते हैं। उस रात उसने शराब नहीं पी थी।

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गुड़िया को उस मकान में अपने साथ हिंसा होने का डर भी लग रहा था। उसके मकान में चोर-बदमाश घुस जाते थे, उसका दरवाजा पीटने लगते थे। एक बार तो तोड़ भी दिया था। गुड़िया और उसके पति चिल्लाने लगे तो वह चोर भाग गया था। इसके बाद सारा सामान छोड़कर छिपते हुए गुड़िया वहां से अपने परिवार के साथ भाग निकली। छोटा बच्चा गोद में था। पूरी रात वे लोग चलते रहे। अगली सुबह एक जगह जाकर दम लिया। कुल पांच दिन और पांच रात गुड़िया अपने परिवार के साथ पैदल चलती रही। दो बच्चे छोटे-छोटे साथ में। बड़ा बच्चा पैदल चलता फिर थक जाता तो पिता गोद में उठा लेता था। लेकिन गुड़िया ने अपने छोटे बच्चे को कभी गोद से नहीं उतारा था। कहीं पानी पीती थी तो उसे भी पिला देती थी। पांच दिन बिना ठीक से खाना खाए पैदल चलते रहे सब। बीच में दिल्ली बॉर्डर के पास पुलिस भी मार-पीट करने लगी थी। बॉर्डर पर करीब 2000 लोग पहुंच चुके थे। सारी महिलाओं ने पुरुष को पीछे किया और आगे आकर प्रशासन के लोगों से कहने लगी कि हमारे बच्चे भूखे हैं। वे पूछने लगी कि यहां क्यों रोका जा रहा है और उन्हें खाना क्यों नहीं दिया जा रहा है। वहां की पुलिस ने तब सबको पानी पिलाया और बच्चे को दूध दिलवाया। 

बाद में वहां से स्कूल में ले जाकर गुड़िया के परिवार को 14 दिनों तक क्वारंटीन रखा गया। सोने के लिए केवल दरी बिछाई गई थी। वहां उनलोगों को केवल एक मास्क मिला। साफ-सफाई के लिए कुछ नहीं मिला। नहाने के लिए पानी था, साबुन नहीं। दवाई छिड़काव होता था। वहां भी खाना एक टाइम देते थे। दिन में 12 बजे दाल-चावल मिलता था, वह भी कम। फिर भी गुड़िया खुश थी क्योंकि सारे लोग एक जैसे थे। उसके बाद एक बस में ले जाकर उन लोगों को ट्रेन में बैठा दिया गया। वहां से बक्सर जिला आने में 24 घंटे लगते हैं, लेकिन इस बार गुड़िया को अपने गांव पहुंचने में तीन दिन और तीन रातें लग गई। ट्रेन से आने के बाद गुड़िया परिवार के साथ अपने ब्लॉक में एक रात रही। जांच होने के बाद स्कूल में दोबारा दिन फिर रही, उसके बाद जाकर अपने घर वापस आ पाई। आई तो भी चैन नहीं था। उससे किसी ने खाने के लिए नहीं पूछा। मुखिया और गांववाले उसे घर में नहीं रहने देना चाहते थे। गांव से बाहर जाने के लिए कहने लगे थे। सबको डर था कि वह कोरोना लेकर आई है। उसका पति मारने लगा कि यही हमें दिल्ली से लेकर आई है। तब कुछ बूढ़े लोगों ने उसे समझाया। 

गुड़िया को बहुत अफसोस होने लगा, फिर भी उसने हिम्मत नहीं हारी। वह बोली कि मैं अपने घर से कहीं बाहर नहीं जाऊंगी। वह एक महीने तक अपने घर में रही। उसको कोरोना नहीं था। अभी तक उसके घर में उससे कोई अच्छे से बात नहीं करता है। गुड़िया के मोबाइल पर मकान मालिक फोन करते हैं कि अगर उसने किराया नहीं चुकाया तो वह उन पर केस कर देगा। गुड़िया आज भी उतनी ही परेशान है। वह चाहती है कि कोई काम मिले तो उसका गुज़ारा हो। वह दसवीं फेल है ऐसा उसके जल्दी हुए गौना के कारण हुआ। उसकी मां ने गौना के बाद दसवीं की परीक्षा दिलवाई थी तो उसका रिजल्ट खराब हो गया। अब उसे काम नहीं मिल रहा है। काम मिल जाता तो गुड़िया की समस्या दूर हो जाती। उसे पढ़ी-लिखी लड़की बनना था, लेकिन वह एक प्रवासी मज़दूर बनकर रह गई है।

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तस्वीर : फेमिनिज़म इन इंडिया

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