वो कौन थी: महिलाओं को कॉरसेट से आज़ादी दिलाने वाली डिज़ाइनर कोको शनैल की कहानी
वो कौन थी: महिलाओं को कॉरसेट से आज़ादी दिलाने वाली डिज़ाइनर कोको शनैल की कहानी
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एडिटर्स नोट : यह लेख फेमिनिज़म इन इंडिया हिंदी और DW हिंदी की सहभागिता के तहत प्रकाशित किया गया है। इसके तहत हम DW हिंदी की नई पॉडकास्ट सीरीज़ ‘वो कौन थी’ के अलग-अलग एपिसोड्स को फीचर करेंगे। इस सीरीज़ के तहत पॉडकास्ट की होस्ट और DW हिंदी की डेप्युटी हेड ईशा भाटिया सानन उन महिलाओं की जीवनी और योगदान को अपने श्रोताओं तक पहुंचा रही हैं जिन्होंने लीक से हटकर काम किया और सपने देखने की हिमाकत की। वो कौन थी के दूसरे एपिसोड में आज सुनिए कोको शनैल की कहानी।

फैशन, दुनिया की सबसे बड़ी इंडस्ट्रीज़ में से एक। इस इंडस्ट्री में हर रोज़ कुछ नया आता है और हर रोज़ कुछ न कुछ ‘आउट ऑफ फैशन’ यानि चलन से बाहर हो जाता है। जब आप किसी बड़े ब्रैंड से कुछ खरीदते हैं तो क्या कभी सोचते हैं कि आखिर ये ब्रैंड, ये डिज़ाइन किसके दिमाग की उपज होगी? जब महिलाएं जींस या सूट-पैंट पहनती हैं तो क्या वे सोचती होंगी कि किसने पहली बार ये आरामदायक कपड़े उनके लिए डिज़ाइन किए होंगे। आमतौर पर फैशन इंडस्ट्री के बारे में राय यह होती है कि इस इंडस्ट्री की सबसे बड़ी खरीददार औरतें हैं, लेकिन कितने लोग इस बात से आज भी सहज होते हैं कि एक औरत अपने दम पर एक बड़ा फैशन ब्रैंड चला सकती है। DW हिंदी के पॉडकास्ट ‘वो कौन थी’ के दूसरे एपिसोड में पॉडकास्ट की होस्ट ईशा भाटिया सानन एक ऐसी ही महिला की कहानी सुना रही हैं जिसने  फैशन की दुनिया को बदलकर रख दिया। 

इस पॉडकास्ट की शुरुआत ईशा ने एक वाकये से की है। वह बताती हैं कि दुनिया के सबसे बड़े ऑक्शन हाउस Sotheby में एक सादी सी काले रंग की ड्रेस की नीलामी करीब 15 लाख में हुई। इस ड्रेस को बनाने वाली महिला और उनका ब्रैंड भी इतना ही मशहूर है। यहां बात हो रही है मशहूर फैशन डिज़ाइनर कोको शनैल की। कोको शनैल की ज़िंदगी के बारे में बताते हुए इस पॉडकास्ट की शुरुआत होती है जो हमें फ्रांस के शहर Saumur में ले जाता है। पॉडकास्ट की शुरुआत में फैशन इंडस्ट्री की इमेज से मेल खाता एक बेहद मज़ेदार गाना बज रहा होता है लेकिन जैसे-जैसे पॉडकास्ट कोको शनैल की ज़िंदगी की ओर बढ़ता है, इसका बैकग्राउंड म्यूज़िक बेहद धीमा होता चला जाता है।

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ईशा बताती हैं कि किस तरह गैब्रिएल शनैल का जन्म एक बेहद गरीब परिवार में हुआ था। लेकिन Saumur, फ्रांस में 19 अगस्त 1883 को जन्मी यह बच्ची फैशन की दुनिया में क्रांति लाने वाली थी। यही गैब्रिएल शनैल आगे चलकर फैशन की दुनिया में कोको शनैल के नाम से मशहूर हुई। गैब्रिएल के माता-पिता की शादी नहीं हुई थी। उनकी मां जीन शादी से पहले ही 2 बेटियों की मां बन चुकी थी और इस ज़माने के समाज ने उनकी बेटियों पर ‘नाजायज़’ का ठप्पा लगा दिया था। गैब्रिएल की मां जीन के परिवारवालों ने ज़बरदस्ती उनकी शादी करवा दी लेकिन जीन के पति ने कभी अपने परिवार की ज़िम्मेदारी नहीं निभाई। सात लोगों का परिवार एक छोटे से कमरे में रहने को मजबूर था लेकिन इस परिवार की दिक्कतें यहां कहां खत्म होने वाली थी। अपने आखिरी बच्चे के जन्म के बाद गैब्रिएल की मां की तबीयत बेहद खराब रहने लगी और आखिरकार टीबी की बीमारी के कारण उनकी मौत हो गई। गैब्रिएल के परिवार की कहानी सुनाते वक्त पॉडकास्ट का खूबसूरत बैकग्राउंड म्यूज़िक और होस्ट का कहानी सुनाने का अंदाज़ कहानी के इस हिस्से को बेहद जीवंत बनाता है। 

पैरिस में अपनी बुटिक में बैठी कोको शनैल सोचा करती थी कि औरतों के कपड़े भी आदमियों की तरह आरामदायक क्यों नहीं होते। महिलाओं की बड़ी-बड़ी फ्रॉक और दमघोंटू कॉरसेट वाले फैशन को कोको बदलना चाहती थी, वह अपने कपड़ों में आराम और सादगी चाहती थी।  

जीन की मौत के बाद भी गैब्रिएल के पिता को अपने बच्चों की फिक्र नहीं रहती। किसी के कहने पर उसने अपने बेटों को मज़दूरी करने और बेटियों को अनाथालय भेज दिया। यह वही अनाथालय था जहां से गैब्रिएल की ज़िंदगी बदलने वाली थी। और इसके साथ ही पॉडकास्ट का धीमा संगीत धीरे-धीरे तेज़ होता है, जिससे पता चलता है कि अब गैब्रिएल की ज़िंदगी में अच्छा वक्त आने वाला है। इस अनाथालय में लड़कियों को सिलाई का काम सिखाया जाता था ताकि आगे चलकर वे अपने पैरों पर खड़ी हो सकें, कुछ कमा सकें। लेकिन गैब्रिएल के सपने इतने छोटे नहीं थे, उसे तो कुछ बहुत बड़ा करना था। कहानी के इस पड़ाव के दौरान बीच-बीच में सिलाई मशीन की आवाज़ भी आती रहती है।

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गैब्रिएल के अनाथालय में बिताए वक्त के बारे में ईशा बेहद रोचक ढंग से बताती हैं। अनाथालय से निकलने के बाद गैब्रिएल ने एक दुकान में दर्ज़ी का काम शुरू कर दिया। लेकिन उनका चंचल मन यहां कहां टिकने वाला था। दर्ज़ी की दुकान से होते हुए गैब्रिएल ने लाइव कैबरे परफॉर्मेंस देना शुरू कर दिया। उनका एक पंसदीदा गाना भी था, यही गाना उनके नाम बदलने की वजह भी बना। अब वह गैब्रिएल से कोको बन चुकी थीं। गैब्रिएल इस दौरान कई लोगों के संपर्क में आई। इन्हीं लोगों में से एक थे इटीएन बालज़ो। बालज़ो कोको को पसंद करने लगे थे। बता दें कि बालज़ो उस वक्त देश के सबसे अमीर लोगों में से एक थे, तो ज़ाहिर है इस बदलाव से कोको की ज़िंदगी भी बदलने लगी। कैसे, इसे जानने के लिए आपको पॉडकास्ट का यह एपिसोड सुनना होगा।

ये रिश्ता तीन सालों तक चला। इन तीन सालों के दौरान कोको ने अमीर वर्ग के लोग जैसे कपड़े पहनते थे उस पर मानो रिसर्च कर डाली थी। वक्त बदला, हालात बदले और कोको दुनिया के फैशन कैपिटल पैरिस जा पहुंची। यह वही अहम पड़ाव था जहां से उनके शनैल ब्रैंड के सफर की शुरुआत होने वाली थी। पैरिस में अपनी बुटिक में बैठी कोको सोचा करती थी कि औरतों के कपड़े भी आदमियों की तरह आरामदायक क्यों नहीं होते। महिलाओं की बड़ी-बड़ी फ्रॉक और दमघोंटू कॉरसेट वाले फैशन को कोको बदलना चाहती थी, वह अपने कपड़ों में आराम और सादगी चाहती थी।  

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इधर कोको ने अपना बुटिक खोला, उधर पहला विश्व युद्ध शुरू हो गया। लेकिन कोको शनैल ने इस मुश्किल को भी मौके में बदल दिया। ईशा बताती हैं कि कैसे विश्व युद्ध के बाद के उदासीन समय को कोको शनैल ने बेहतरीन ढंग से इस्तेमाल किया। यही वक्त था जब कोको ने अपनी लिटिल ब्लैक ड्रेस का आविष्कार किया। ईशा बताती हैं कि किस तरह शनैल महिलाओं के फैशन को बदलती जा रही थीं। कैसे शनैल ने औरतों के लिबास के साथ हर दिन कुछ न कुछ नया किया, इसे जानने के लिए आप वो कौन थी के इस एपिसोड को ज़रूर सुनें।

कोको शनैल के डिज़ाइन की सबसे ख़ास बात सादगी थी। मशहूर होने के साथ-साथ उनके डिज़ाइन की नकल भी होने लगी लेकिन वह इससे खुश होती थी। ऐसा नहीं था कि कोको शनैल सिर्फ कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ रही थीं। इस दौरान कई मुश्किलें भी आईं जिसका ज़िक्र इस पॉडकास्ट में किया गया है। फैशन की दुनिया का वह चमचमाता सितारा कोको शनैल बाहरी दुनिया में जितनी मशहूर थी, निजी जीवन में उतनी ही अकेली। कभी कोट, तो कभी सूट-पैंट, तो कभी स्कर्ट हम ज़रूर पहनते हैं लेकिन हम ये नहीं जानते कि हमारे लिए ये आरामदायक कपड़े किसने इजाद किए। तो अगली बार जब आप सूट-पैंट पहनकर आराम से अपने ऑफिस जा रही हों, तो इस एपिसोड को सुनने के बाद आपको पता होगा कि इस आरामदायक आउटफिट के लिए आपको किसे शुक्रिया कहना है। 


तस्वीर : फेमिनिज़म इन इंडिया

Ritika is the Managing Editor at Feminism in India (Hindi). Ritika is an award-winning multimedia journalist with over five years of experience. She is a passionate advocate for social justice and gender rights, and has been awarded the prestigious UN Laadli Media Awards twice and Breakthrough Reframe Media Awards for her gender-sensitive writing and reporting. She is also a fellow of Rise Up (Youth Championship Initiative).

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