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एडिटर्स नोट : यह लेख फेमिनिस्ट अप्रोच टू टेक्नॉलजी के प्रशिक्षण कार्यक्रम से जुड़ी लड़कियों द्वारा लिखे गए लेखों में से एक है। इन लेखों के ज़रिये बिहार और झारखंड के अलग-अलग इलाकों में रहने वाली लड़कियों ने कोविड-19 के दौरान अपने अनुभवों को दर्शाया है। फेमिनिज़म इन इंडिया और फेमिनिस्ट अप्रोच टू टेक्नॉलजी साथ मिलकर इन लेखों को आपसे सामने लेकर आए हैं अपने अभियान #LockdownKeKisse के तहत। इस अभियान के अंतर्गत यह लेख  झारखंड की गिरिडीह ज़िले की प्रिया ने लिखा है जिसमें वह बता रही हैं रेणु की कहानी।

यह कहानी मेरी दोस्त रेणु के घर की है। उसका परिवार बड़ा है जिसमें उसके माता-पिता, तीन बहनें और एक भाई है। सभी भाई-बहन में सबसे बड़ी रेणु 24 साल की है और वह रांची में नौकरी करती थी। दूसरी है रिया, 20 साल की, जो कॉलेज में पढ़ती थी। तीसरी बहन सिमरन, 18 साल की है जिसकी पढ़ाई में ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी। मुश्किल से उसने बारहवीं कक्षा तक पढ़ाई की। पढ़ाई आगे नहीं करने के कारण वह घर ही रहती है। घर का काम ज़्यादातर उसे ही करना पड़ता है। घर में गाय   है तो उसकी देखभाल से लेकर रसोई, साफ़-सफाई का काम उसकी ही जिम्मेदारी है। रेणु का परिवार अच्छे से रह रहा था, लेकिन लॉकडाउन ने सब उलट-पुलट कर दिया। 23 मार्च को पूरे देश में लॉकडाउन की शुरुआत हुई थी। रेणु के पिता अलग-अलग तरह का काम करते थे, जैसे गाय का दूध बेचना और छोटे-मोटे काम जैसे होटल में रसोइये का काम। 

रेणु ने एमए किया है और वह बीते दो साल से नौकरी कर रही थी। उसकी नौकरी के कारण घर की स्थिति में काफी सुधार आया था। लेकिन जब लॉकडाउन की घोषणा हुई और वह बढ़ता ही चला गया तो उसकी नौकरी चली गई। स्कूल, दुकानें समेत सब कुछ बंद होने लगा। सभी अपने-अपने घरों में बंद होते जा रहे थे। रेणु भी अपने घर लौटना चाह रही थ मगर गाड़ियों का आना-जाना भी रुक गया था। मजबूरी में वह रांची में ही रही। वहां वह दो लड़कियों के साथ एक कमरे में रहती थी। अचानक उन लोगों का बाहर जाना बंद हो गया था। पूरा बाजार बंद होने के कारण उनको अपनी बुनियादी जरूरत की चीजें भी नहीं मिल पाती रही थी। उनके पैसे भी घटने लगे थे। कुछ दिनों बाद दोनों समय का खाना भी जुटाना भारी पड़ने लगा था। कई बार वे मुश्किल से दिन में एक वक्त खाना खा पाती थी। किसी को वहां उस हाल में रहना अच्छा नहीं लग रहा था। रेणु भी सिर्फ अपने घर आना चाहती थी।      

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दूसरी तरफ रेणु के घर वाले भी परेशान हो रहे थे। फोन पर रेणु की परेशानी सुन-सुनकर वे बेचैन हो रहे थे। रेणु अपनी मां से कहती, “मा, मुझे यहां बिल्कुल जेल जैसा लगता है। मुझे बस घर आना है।” नौकरी के दौरान रेणु अपने कमरे में शाम में लगभग सात बजे तक लौटकर आती थी। उसे घूमना बहुत पसंद है। इसलिए वह दफ्तर से लौटते वक्त बाजार घूमते हुए और सामान लेकर कमरे में आती थी। लॉकडाउन के कारण अब हर वक्त कमरे में रहना सचमुच जेल जैसा लगता था। इसलिए उसकी मां  जल्द से जल्द रेणु को घर लाना चाहती थी। दूसरी तरफ उसके पिता का भी होटल का काम बंद हो चुका था अब वे सिर्फ दूध का ही कारोबार करते थे। उनके पास और कोई उपाय नहीं था। उसी से उनके परिवार का भरण-पोषण हो रहा था। 

लॉकडाउन के कारण रेणु की दूसरी बहन रिया का कॉलेज बंद हो गया था और उसकी पढ़ाई रुक गई थी। भाई की भी स्कूल की पढ़ाई रुक गई थी। इसी तरह दिन गुजर रहे थे। रेणु घर आने की बात बार-बार करती थी। लॉकडाउन लागू होने के दो-ढाई महीने बाद रेणु की मां ने उसके पापा को रांची भेजा। उस समय गाड़ी का आना जाना बंद था, इसलिए रेणु खुद से घर नहीं आ पाती। उसके पापा शुरू में कुछ दिन तो टालते रहे थे। आखिरकार 180 किलोमीटर दूर रांची मोटरसाइकिल से गए। बीच रास्ते में  एक रिश्तेदार का घर आता था तो वहां एक दिन रुककर फिर रांची की ओर चले और फिर आने समय भी उन्होंने ऐसा ही किया। रेणु कहती है कि जब लॉकडाउन के दौरान वह अपने पापा के साथ घर आ रही थी तो उसे ऐसा महसूस हो रहा था कि वह रास्ता बहुत अलग-सा है। एकदम खाली, सुनसान लग रहा था। पहले रास्ते में इतने लोगों की  भीड़ रहती थी, इतनी दुकानें थी और अब सब शांत था, ट्रैफिक बंद था। उसे सबकुछ एक नई दुनिया जैसा प्रतीत हो रहा था, मानो रेणु और उसके पापा के अलावा वहां कोई है ही नहीं। उसने पहली बार यह नज़ारा देखा था। साफ वातावरण, प्रदुषण मुक्त। न भीड़ और न कोई झगड़ा-झंझट, सफर करने में परेशानी भी बहुत कम। सही मायने में मोटरसाइकिल पर बैठने का आनंद आ रहा था। 

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घर आकर रेणु खुश थी। लेकिन लॉकडाउन के कारण हर रोज़ नई-नई समस्या पैदा हो रही थी। घर में बस दो-तीन गाय के बलबूते पर ही गुजारा हो रहा था। परिवार में  सदस्यों की संख्या ज्यादा होने के कारण जरूरत की चीजों में भी कमी आ रही थी। इसी कारण घर में उलझन पैदा हो रही थी। बहुत झगड़े होने लगे थे। उसका छोटा भाई भी किसी की बात नहीं मानता था और घर में शोर मचाता रहता था। रेणु के लिए यह सब बहुत ही दर्दनाक था। उसे ऐसा लग रहा था कि वह कैसे अपने घर की स्थिति को सुधार सके। उसकी बहनों को भी अच्छा नहीं लग रहा था, एक दिन घर में रेणु के माता-पिता के बीच खूब झगड़ा हुआ। जब रेणु की मां ने रेणु के पिता से जरूरत की चीजें और पैसों की मांग की तो तो वह भड़क उठे, कहने लगे,”घर का दुखड़ा मुझे मत सुनाओ। हम कहां से लाएं। मेरे पास थोड़ी ना है, मांगो अपनी बेटी से।” रेणु की मां ने कहा कि अभी सब घर में हैं  तो पैसे कहां से आएंगे। रेणु भी रांची से वापस आ गई है। उसके पास जो था वह दे ही रही थी। तब रेणु के पापा ने कहा, “तो हम अभी कहां से लाएं और एक ही बात बार-बार मुझे सुनाया मत करना।” यह कहकर वह वहां से चले गए। रेणु अपनी मां को चुप रहने और शांत रहने को कह रही थी। फिर रेणु ने कहा कि वह बड़ी है वह कुछ न कुछ करने की कोशिश करेगी।

सब परेशानियों को देखकर रेणु ने सोचा कि उसके पास नौकरी नहीं है तो क्यों न वह कुछ बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू करे। उसने इस बारे में अपनी बहनों से बात की और रिया से कहा कि वह आसपास के घर चली जाए और कहे कि रेणु दीदी ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर रही है और उनके बच्चे से पैसे भी कम लिए जाएंगे। वहां के आसपास के लोगों ने सोचा कि रेणु पढ़ी-लिखी भी है और अभी उनके बच्चों की पढ़ाई भी बहुत दिनों से पूरी तरह से छूट चुकी है। ऊपर से रेणु पैसे भी कम ले रही थी तो वे अपने बच्चों को भेजने के लिए तैयार भी हो गए। जल्दी ही रेणु के पास कुछ बच्चे पढ़ने के लिए आने लगे। साथ में रेणु ने अपने भाई को भी पढ़ाना शुरू कर दिया।

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यह सब देखकर रिया भी उत्साहित हुई। उसने कहा कि “मैं अगर आसपास के लोगों को दूध पहुंचाने का काम भी शुरू करूं तो अच्छा रहेगा। रेणु ने कहा ठीक है! आसपास के घर के लोगों से बात करके देखो। फिर रिया ने इस बारे में आसपास के लोगों से बात की। पहले तो लोगों ने कहा कि बाद में बताते हैं, फिर सात-आठ दिन बीत जाने के बाद कुछ लोगों ने कहा कि वे दूध ले लेंगे, पर सही कीमत। रिया को रेणु से बहुत हिम्मत मिली थी। उसने अपने घरवालों से बात की और पिता को समझाया कि यहां के लोगों से 2-4 रूपए कम लेते हैं तो उन लोगों की ज्यादा बिक्री होने लगेगी और अभी जैसी स्थिति है, उसमें ये बेहतर है। लॉकडाउन हटने के बाद वे दूध की कीमत पहले की तरह ही कर देंगे। पापा चुप रहे, लेकिन उसकी मां राजी हो गई। बाद में उनके पापा भी राज़ी हो गए। रेणु तो रिया के साथ खड़ी ही थी। उसने कहा, “रिया, अभी ऐसा करना जरूरी है और तुम करो।” हरी झंडी मिलते ही रिया अपने आस-पास के घरों में दूध पहुंचाने लगी। रेणु और रिया की तीसरी बहन सिमरन घर के  काम में लगी रहती थी। रेणु उसे घर के काम के साथ-साथ पढ़ाई करने को कहती थी ताकि आगे चल कर वह कुछ कर सके। लेकिन सिमरन का मन पढ़ाई में रमता नहीं था। लेकिन उसने अपनी पसंद के काम को ही आगे बढ़ाने की ठानी। 

उधर सिमरन ने अपनी दोनों दीदी के काम को देखकर घर में ही खाद बनाना-बेचना शरू किया। अपनी मां की मदद ली। घर में सब्जी उगाना और बेचना भी शुरू किया। धीरे-धीरे कुछ लोग उनसे खरीदने लगे। तीनों बहनों की बदौलत घर की आर्थिक स्थिति में थोड़ा सुधार होने लगा। फिर उनके पिता भी इन सब कामों में उनका साथ देने लगे थे। जैसे दूर घरों में दूध पहुंचाना और उनसे कहना कि उनकी बड़ी बेटी कम पैसों में बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती है। इसी तरह खाद बेचने में भी वह सिमरन का हाथ बंटाने लगे। एक दिन रेणु ने अपनी दोंनो बहनों से मजाक में कहा, “मान गए कि तुम मेरी ही बहन हो। मुझसे इतना कुछ सीख गई कि तुम सब भी मेरी तरह घर को संभालने में साथ देने लगी हो।” दोनों बहनों ने कहा,”लॉकडाउन के दौरान नौकरी छूट जाने के बावजूद तुमने घर को संभाला। इसलिए हम दोनों को भी हिम्मत मिली।” उसके बाद रेणु ने कहा कि चलो ठीक है, अब इतनी भी तारीफ मत करो और जिंदगी में अपने आप पर विश्वास रखना और आगे बढ़ते रहना और हां, सिमरन, तुम्हें पढ़ाई करनी ही है। सिमरन ने वादा किया कि वह ज़रूर पढ़ेंगी। फिर रेणु, रिया, सिमरन सब अपने-अपने काम में  व्यस्त हो गईं। मां-पिता दरवाज़े की ओट से तीनों बेटियों की बात सुन रहे थे  और उनकी आंखें खुशी से छलछला आईं। 

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तस्वीर : फेमिनिज़म इन इंडिया

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