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आज पूरे विश्व में लैंगिक समानता की बात हो रही है। सिर्फ महिलाएं नहीं बल्कि सभी लिंगों और समुदायों के समान अधिकार, उनके कपड़े, नौकरी या जीवनसाथी के चुनाव और उनकी आज़ादी की बात हो रही है। हमारा संविधान लिंग, जाति, समुदाय या लैंगिकता के आधार पर भेदभाव नहीं करता। बहरहाल, समाज की नज़र में भेदभाव करने के लिए यह पर्याप्त और उचित कारण हैं। ऐसे में, देश के न्याय-व्यवस्था से यह उम्मीद की जाती है कि फैसले संवैधानिक हो। पत्रकार प्रिया रमानी के केस ने लाखों महिलाओं को उम्मीद दी कि वे उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठा पाएं। लेकिन पिछले कुछ दिनों में देश की अलग-अलग अदालतों में ऐसे अजीबोगरीब और आपत्तिजनक फैसले सुनाए गए जो महिलाओं के आज़ादी, सुरक्षा, और गरिमा पर चोट करते हैं।

गुवाहाटी हाईकोर्ट ने तलाक के एक केस की सुनवाई करते हुए कहा कि अगर पत्नी ‘शाखा और सिंदूर’ पहनने से मना करती है तो इसका मतलब है कि उसे शादी मंजूर नहीं है। ‘शाखा और सिंदूर’ पहनने से मना करना या तो उसे कुंवारी दिखाता है या फिर यह कि उसे शादी मंजूर नहीं है। कोर्ट ने कहा कि पत्नी का ऐसा रुख यह बताता है कि वह अपनी शादी जारी नहीं रखना चाहती। कोर्ट ने इस आधार पर तलाक के लिए याचिका डालने वाले शख्स को तलाक दे दिया है। बात ‘सिंदूर और शाखा’ की करें, तो आज ऐसी कई महिलाएं हैं जो इस पितृसत्तात्मक सोच से जन्मे नियम को नकारती हैं और इनका पालन नहीं करती। कानूनी तौर पर किसी भी व्यक्ति पर उसके कपड़े या हुलिया के नियम थोपे नहीं जा सकते। यह मानना कि इन नियमों का पालन न करने वाली शादी को जारी नहीं रखना चाहती या उसे कुंवारी दिखाता है, पुरुषत्व के अहम की उपज है। यह उस मानसिकता और असुरक्षा को दर्शाता है जो पितृसत्ता की देन है। देश के कानून व्यवस्था का पितृसत्ता की वकालत करना न सिर्फ नकारात्मक है बल्कि प्रगतिशील समाज के लिए गलत उदाहरण पेश करती है।

पुरुषों को अपने विशेषाधिकारों को त्यागने और एक समान समाज की रचना में अपनी भूमिका निभानी की आवश्यकता है। साथ ही लोकतांत्रिक स्तंभों को पक्षपाती, दकियानूसी, रूढ़िवादी और पितृसत्तात्मक होने से बचना अनिवार्य है।

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हमने कुछ दिनों पहले यह जाना कि ससुराल वालों द्वारा बहु से व्यंग्यात्मक तरीके और ताना मारकर बात करना वैवाहिक जीवन का हिस्सा है। नहीं, यह बालाजी टेलीफ़िल्म्स के किसी धारावाहिक का रीपीट टेलिकास्ट नहीं, मुंबई सेशन कोर्ट की टिप्पणी है। जो समाज पितृसत्तात्मक संस्थान के नियमों पर चलता है, जाहिर है वहां सामाजिक या राजनीतिक नीतियां और उससे जुड़े फैसले भी इससे बिना प्रभावित हुए नहीं रह सकती। इसलिए न्यायिक फैसले किसी रूढ़िवादी सोच या पितृसत्ता के अधीन नहीं बल्कि संविधान से अनुसार किए जाने की आवश्यकता है। पिछले साल कोरोना के कारण हमारी अर्थव्यवस्था और सामाजिक जीवन बुरी तरह प्रभावित हुई। अलग-अलग सर्वेक्षणों में पाया गया कि महिलाओं को कोरोना के कारण पुरुषों से कहीं अधिक शारीरिक, मानसिक या आर्थिक नुकसान झेलना पड़ा। अनेक दुष्परिणामों में घरेलू हिंसा में वृद्धि चिंता का विषय बना रहा। ऐसे में, न्यायालयों की गैरजिम्मेदार टिप्पणियां घरेलू हिंसा, जिसकी शुरुआत अकसर ससुराल वालों के तानों से होती है, को बढ़ावा देना होगा। साथ ही यह महिला के मानसिक स्वास्थ्य, आत्म-सम्मान और गरिमा को नजरंदाज करना और आहत करना है।

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हाल ही में, मुंबई हाईकोर्ट की नागपुर पीठ की न्यायमूर्ति पुष्पा गनेडीवाला के POCSO एक्ट के एक मामले का आदेश विवादों में घिरा रहा। उन्होंने इस मामले के तहत आरोपी को बरी करते हुए आदेश में कहा था कि एक व्यक्ति द्वारा बिना पीड़ित की त्वचा के संपर्क में आए एक ही समय में पकड़ना, जकड़ना, उसके और अपने कपड़े हटाना और जबरन यौन-संपर्क करना असंभव है। उन्होंने कहा था कि बिना ‘स्किन-टू-स्किन कॉन्टैक्ट’ के नाबालिग के स्तन को दबोचना POCSO अधिनियम के तहत यौन उत्पीड़न नहीं कहा जा सकता। और ‘यौन उत्पीड़न’ माने जाने के लिए यौन संबंध स्थापित करने के इरादे से ‘स्किन-टू-स्किन कॉन्टैक्ट’ होना चाहिए।

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बता दें कि आरोपी की उम्र 39 वर्ष और पीड़ित की उम्र महज 12 साल है। किसी भी हादसे के वक्त इंसान अकसर घबराहट, दर्द, सदमा, आवेश या अनिश्चितता में कोई त्वरित प्रतिक्रिया नहीं दे पाता। गनेदीवाला ने पिछले दिनों न्यायालय में एक अन्य मामले के तहत यह भी कहा था कि नाबालिग का हाथ पकड़ना और पैंट की चैन खोलना ‘यौन उत्पीड़न’ नहीं कहा जाएगा। आज सभी विशेषज्ञ स्कूल में सेक्स एजुकेशन को लागू करने की दलील दे रहे हैं। बच्चों को अच्छे और बुरे स्पर्श और संपर्क का अंतर सिखाया जा रहा है। अगर इन टिप्पणियों को समाज के विकास का आधार बनाएं, तो मुझे भीड़ बस में उस अधेड़ उम्र के व्यक्ति को अपने पैंट की चैन खोल हस्त-मैथुन करते हुए देखने में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए। या जब मुझे अपने सीने, कमर या कूल्हे पर किसी का हाथ फिरता हुआ महसूस हो, तो असहज और क्रोधित नहीं होना चाहिए।

समाज के मौजूदा ढांचे और विचारधारा के कारण महिलाओं को सदियों से पुरुषों से कमतर ही माना गया है। इसलिए उन्हें अपने मानवाधिकारों, अपनी सुरक्षा और आज़ादी, यहां तक कि सिर्फ अपनी बात रखने के भी लिए निरंतर लड़ाई लड़नी पड़ती है। फिर चाहे वह मतदान हो, शिक्षा हो, किसी दोस्त या सहेली की पार्टी हो या स्टेट बसों में रोज़ाना सफर। साल 2012 में गुवाहाटी के ग्यारहवीं कक्षा की एक छात्रा को भीड़ द्वारा उत्पीड़ित करने, गाली-गलीज करने, छीना-झपटी और स्ट्रिप करने की घटना हमें आज भी आक्रोशित करती है। वहीं उसी साल दिल्ली में हुआ गैंगरेप का हादसा मानवता के मुंह पर तमाचा था। दोनों घटनाएं अलग-अलग राज्यों और अलग-अलग उम्र की महिलाओं के साथ हुईं। लेकिन इन घटनाओं से साफ है कि महिलाएं तबतक सुरक्षित नहीं हो सकती जबतक पुरुष पितृसत्ता से जन्मे अपने प्रभुत्व का त्याग नहीं कर देते।

वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के अनुसार, पूरी दुनिया में लैंगिक समानता प्राप्त करने में 99 सालों से भी अधिक लगेगा। राजनीतिक प्रतिनिधित्व में लैंगिक अंतर को समाप्त करने में हमें 95 साल लग सकते हैं। समाज के सम्पूर्ण विकास में देश की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक मापदंड भागीदार होते हैं। इन्हीं मापदंडों के आधार पर किसी देश को विकसित घोषित किया जाता है। अफसोस की बात है कि नारी सशक्तिकरण के इतने प्रयासों के बाद भी, ऐसा कोई देश नहीं जिसने सम्पूर्ण लैंगिक समानता हासिल कर ली हो। आज महिलाओं को पितृसत्तात्मक नियमों को नकारने की जरूरत है। पुरुषों को अपने विशेषाधिकारों को त्यागने और एक समान समाज की रचना में अपनी भूमिका निभानी की आवश्यकता है। साथ ही लोकतांत्रिक स्तंभों को पक्षपाती, दकियानूसी, रूढ़िवादी और पितृसत्तात्मक होने से बचना अनिवार्य है।

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तस्वीर साभार : गूगल

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