बदलते समय के साथ काफ़ी कुछ बदलता है। कभी नियम तो कभी परिभाषाएँ और कई बार मायने भी। इसी क्रम में हमारे भारतीय समाज में बदलते वक्त के साथ ‘आदर्श औरत’ के मायने भी काफ़ी बदले। चूँकि जब हम किसी भी प्रक्रिया, इंसान, रिश्ते या चीज़ को परिभाषा में बांधते हैं तो उसका रूप अपने आप संकुचित हो जाता है और वो संकुचन ऐसा होता है जिसमें बदलाव की संभावना भी बेहद सीमित होती है। ऐसी ही बात है ‘आदर्श औरत’ की, जिसे समय बदलने के साथ अब सुपर वीमेन कहा जाने लगा है।
इस सुपर वीमेन ने आधुनिकता के कई रंग समेटे है पर वहीं दूसरी तरफ़ आदर्श औरत की परिभाषा को भी अपने में क़ायम रखे हुए है। लेकिन इसके मूल यानी कि महिला प्रस्थिति में कोई ख़ास बदलाव नहीं आया है, बल्कि हाँ दमन का वार और महीन और गहरा हो चुका है। आज महिलाओं के सुपर वीमेन बनने की उम्मीद की जाती है, वो सुपर वीमेन ऐसी होगी जो घर का सारा काम करे और बाहर नौकरी करके पैसे भी कमाए।
हाल ही में एक फ़िल्म का एक डायलॉग सुना जिसमें हीरो अपने लिए ऐसी दुल्हन की चाह ज़ाहिर करता है, ‘जो माँ को किचन में घुसने में न दे और पति को बेडरूम से निकलने न दे।‘ पर गौर करने वाली बात ये है कि ये सिर्फ़ कोई फ़िल्मी चाह या संवाद नहीं बल्कि ये ज़मीनी सच्चाई है, जिसे हम आए दिन अच्छे पढ़े लिखे युवाओं के मुँह से अक्सर सुनते है। जो फ़ैशन के दौर में गर्लफ़्रेड की संस्कृति को क़ायम रखे हुए है लेकिन वही महिलाओं को साथी की बजाय पत्नी के रूप में स्वीकारने की चाह रखते है। उनकी चाहत होती है कि भले ही शादी से लड़की अपने हिसाब से ज़िंदगी जिए लेकिन शादी के बाद वो साथी नहीं बल्कि पत्नी की भूमिका में हो।
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धीरे-धीरे ही सही अब महिला शिक्षा का स्तर पहले से बेहतर होने लगा है, ऐसे में रोज़गार परक शिक्षा पाने के दौर में लड़कियों ने भी रोज़गार की दिशा में अपना कदम बढ़ाना शुरू कर दिया। अब वे पैसे कमाने और अपनी पहचान की चाह रखती है और इसे लागू करने के लिए अपनी बुरी मेहनत झोंक देती है, ऐसे में अक्सर शादी के बाद लड़कियों को या तो अपने सपनों की आहुति देनी पड़ती है या फिर एक आदर्श औरत की बनायी परिभाषा के साथ-साथ अपने सपनों और अस्तित्व को ढोना पड़ता है, जो कई बार एक समय के बाद महिलाओं के लिए अतिरिक्त बोझ बन जाता है।
भले ही अलग-अलग आँकड़ों में हम महिला रोज़गार की बढ़ती संख्या को देखकर खुश हों, पर वास्तव में ये ख़ुशी बेहद खोखली है।
हमारी सामाजिक व्यवस्था में महिला को दोयम दर्जे का माना जाता है और बड़े ही साफ़ शब्दों में महिलाओं की भूमिका रसोई और बिस्तर तक बतायी है। ऐसे में भले ही कामकाजी औरतें को देखकर हम एक़बार अपनी आँख बंद कर ये कहें कि अब सब बदल गया है पर वास्तव में घर के अंदर अभी भी महिलाओं की भूमिका रसोई और बिस्तर तक ही सीमित देखी जाती है। यही वजह है कि कई बार महिलाओं की कमाई को वो वरीयता नहीं मिलती जो पुरुषों की कमाई को मिलती है। इतना ही नहीं, कई बार ये भी देखने को मिलता है कि अगर कोई महिला पुरुष से ज़्यादा पैसे कमाती है तो समाज इसे मर्दानगी के ख़िलाफ़ बताकर पुरुषों को महिला के ख़िलाफ़ हिंसा बढ़ाने में भी इस्तेमाल करता है।
आज भले ही अलग-अलग आँकड़ों में हम महिला रोज़गार की बढ़ती संख्या को देखकर खुश हों, पर वास्तव में ये ख़ुशी बेहद खोखली है क्योंकि जब तक हम घरों में महिलाओं को पत्नी की बजाय साथी के रूप में स्थापित नहीं करेंगें, उनकी भूमिकाओं को रसोई और बिस्तर से दूर नहीं करेंगें तब तक आँकड़ों को लेकर हमारी ख़ुशी सतही होगी। इसके साथ ही, महिलाओं की कमाई को घरों में पुरुषों के समान दर्जा दिलवाना बेहद ज़रूरी है, क्योंकि जब तक हम महिलाओं के मेहनताने को पुरुष के समान दर्जा नहीं दिलवाएँगें तब तक महिलाओं के काम को काम नहीं समझा जाएगा और वे सुपर वीमेन के तमग़े के साथ बाहर और घर दोनों के कामों के बोझ तले पिसती रहेंगीं। इसलिए समय के साथ शब्दों या संख्या में ही नहीं बल्कि व्यवस्था और वैचारिकी में भी बदलाव बेहद ज़रूरी है। वरना भले आदर्श महिला की जगह सुपर वीमेन ले लें लेकिन महिला स्थिति हमेशा बड़े सवालों के घेरे में रहेगी।
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तस्वीर साभार : qz.com
About the author(s)
Swati lives in Varanasi and has completed her B.A. in Sociology and M.A in Mass Communication and Journalism from Banaras Hindu University. She has completed her Post-Graduate Diploma course in Human Rights from the Indian Institute of Human Rights, New Delhi. She has also written her first Hindi book named 'Control Z'. She likes reading books, writing and blogging.

