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साल 1984 में गोविंद निहलानी निर्देशित बहुचर्चित फ़िल्म ‘पार्टी’ में कला पर बातचीत करते हुए ओम पुरी कहते हैं, “कोई भी कविता केवल कविता नहीं बल्कि एक हथियार है। हर कलात्मक रचना, कविता, उपन्यास, फ़िल्म, जिसके जरिए जनता से विचार की सतह पर जुड़ सकते हैं,  सामाजिक-राजनैतिक संघर्ष में एक हथियार है।” ये डायलॉग मौजूदा राजनीतिक माहौल पर बिल्कुल सटीक बैठता है। आज हम ऐसे दौर में जी रहे हैं, जहां एक-एक करके ऐसे कानून लाए जा रहे हैं, जिनके आधार पर नागरिक अधिकारों को सीमित किया जा रहा है। बोलने-लिखने की आज़ादी को खत्म किया जा रहा है। पत्रकारों से लेकर कमीडियन्स तक, छात्रों से लेकर एक्टिविस्ट्स तक को गिरफ़्तार करके जेल में डाल दिया जा रहा है। इसके समानांतर ही, सत्ता दल और उसकी लोकप्रियता बनी हुई है। इसका मूल कारण है कि सत्ता दल ने अभिव्यक्ति के महत्वपूर्ण साधनों ‘मीडिया’ और अलग-अलग क्षेत्र में सक्रिय महत्वपूर्ण हस्तियों को अपने ख़ेमे में शामिल कर लिया है।

पॉप सिंगर रिहाना के किसानों से जुड़े एक ट्वीट के बाद भारत के तमाम खिलाड़ी और कलाकार, जो किसी भी हालत में चुप रहते हैं, भारत के आंतरिक मामले का हवाला देते हुए धड़ाधड़ ट्वीट करते हैं। आख़िर क्यों? जबकि इतने लंबे समय से चल रहे किसान आंदोलन और उत्तराखंड के क्रिकेट एसोसिएशन में वसीम जाफ़र के ख़िलाफ़ हो रही सांप्रदायिक विभेदीकरण के ख़िलाफ़ कोई कुछ नहीं बोलता? अव्वल तो यह कि किसी भी समय में शोषण और दमन के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना कलाकारों की अहम ज़िम्मेदारी है। कला समाज से अलग कहीं एकांत में नहीं घटित होती, बल्कि यह समाज में ही उपजती है और समाज में घट रही गतिविधियां ही इसकी रूप-रेखा तैयार करती हैं। शहर में आग लगने पर यदि कोई कवि कोने में बैठकर प्रेम कविताएं लिख रहा है तो उसका प्रेम और उसकी कविता दोनों ही बेमानी हैं। दरअसल, कला मूलतः सामाजिक सच्चाई व अपने समय के साथ संवाद से ही उपजती है।

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किसी भी समय में सामाजिक-राजनैतिक सत्य और नैतिकता तय करने का भार कला पर होता है। कला को राजनीति से अलग नहीं किया जा सकता। यही कारण है कि सत्ता पर बैठे लोग हमेशा कला और अभिव्यक्ति के माध्यमों पर कब्ज़ा करना चाहते हैं। ऐसे समय में एक कलाकार की ज़िम्मेदारी है कि वह अपनी कलात्मकता को समय के साथ संवाद करने में लगाए और एक ऐसे समाज व संस्कृति का निर्माण करे तो समतावादी और प्रगतिशील हो। अलग-अलग दौर में, जब-जब सरकारें तानाशाही और फांसीवादी रवैया अपनाकर शोषण व दमन पर उतारू हुई हैं, प्रतिरोध की अगली पंक्ति में खड़े होकर कलाकारों ने जनसमूह को एकजुट करके उसकी वैचारिकी तैयार की है और व्यवस्था में परिवर्तन कि नींव रखी है। चाहे वह इंदिरा सरकार के आपातकाल के दौर हो या हिटलर की तानाशाही का दौर, ट्रम्प की नस्लवादी टिप्पणियों व व्हाइट सुप्रीमेसी का समय हो या कश्मीरियों के साथ किया जाने वाला व्यवहार। जब-जब सरकारें ग़ैर-लोकतांत्रिक ढंग से कार्य करती हैं, कोई ‘पाश’ भीड़ से उठकर कहता है―

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”मैं घास हूँ, मैं अपना काम करूंगा।

मैं आपके हर किए-धरे पर उग आऊंगा।”

हमारे आस पास ऐसे बहुत से कलाकार मौजूद हैॆ जिन्होंने समकालीन समय में हो रहे शोषण और दमन के विरोध के अलग-अलग कलात्मक माध्यमों से अपनी आवाज़ बुलंद की है:

1.मीर सुहैल

मीर सुहैल, तस्वीर साभार: ट्विटर

मीर सुहैल कादिरी एक राजनीतिक कार्टूनिस्ट हैं, जो कश्मीर से ताल्लुक रखते हैं। उन्होंने अपने कार्टूनों के माध्यम से समकालीन कश्मीरी राजनैतिक-इतिहास पर गंभीर टिप्पणी की है। वह अपने कार्टूनों से कश्मीरी लोगों के विरोध एवं प्रदर्शनों पर सत्ता द्वारा की जाने वाली क्रूर कार्रवाई की आलोचना करते हैं और मुख्यधारा को कश्मीर में घट रही दमनकारी घटनाओं से अवगत कराते हैं। वर्तमान में वह ‘कश्मीर रीडर’ समाचार के साथ कार्टूनिस्ट के रूप में जुड़े हुए हैं। उनके कार्टूनों में अभिव्यक्ति, स्वतंत्रता, समानता जैसे बुनियादी मूल्यों को लेकर गंभीर टिप्पणी की जाती है, और वह यह महसूस करते हैं कि कश्मीर व उसकी जनता को एक लंबे समय से धोखा दिया गया है। ऐसे समय में, जब सच बोलने वालों को जेलों में बंद किया जा रहा है, मीर सुहैल जैसे लोगों की निडर अभिव्यक्ति जनता को सच्चाई से अवगत कराती है 

2. रचिता तनेजा

रचिता तनेजा, तस्वीर साभार: फेमिना

रचिता तनेजा ‘सैनिटरी पैनल्स’ नाम का एक इंस्टाग्राम पेज चलाती हैं, जो महत्वपूर्ण मुद्दों की व्याख्या करता है। रचिता सैनिटरी पैनल्स के बारे में बताती हैं कि यह एक नारीवादी ‘वेबकॉमिक’ है, जो राजनीति, समाज व संस्कृति पर टिप्पणी करता है। रचिता कहती हैं कि वह इसके माध्यम से सत्ता में बैठे लोगों से सवाल पूछकर उनकी जवाबदेही सुनिश्चित करती हैं, ज़रूरी मुद्दों पर बातचीत करती हैं और एक्टिविस्ट्स का समर्थन करती हैं। हाल ही में वह रिपब्लिक पत्रकार अर्णब गोस्वामी को सुप्रीम कोर्ट से मिली बेल पर एक ट्वीट करने के कारण चर्चा में थीं, जिसपर अटॉर्नी जनरल ने कहा कि उन्होंने ट्वीट के माध्यम से कोर्ट का अपमान किया है। अपने चैनल को सैनिटरी पैनल्स कहने का कारण देते हुए रचिता बताती हैं कि इसके माध्यम से वह समाज मे बने टैबू और चुप्पी को तोड़ना चाहती हैं और लोगों को जागरूक करना चाहती हैं।

3. सिद्धेश गौतम

सिद्धेश गौतम को सोशल मीडिया पर उनके हैंडल ‘बेकरी प्रसाद’ के नाम से जाना जाता है। वर्तमान में वह दिल्ली में स्वतंत्र कलाकार के रूप में कार्यरत हैं। बेकरी प्रसाद के नाम से वह इंटरनेट पर दलित अधिकारों व अन्य जरूरी सामाजिक मुद्दों को डिजिटली प्रस्तुत करते हैं। वह ऐसा मानते हैं कि सामाजिक रूप से विशेष सुविधाएं प्राप्त करने के कारण शुरुआत में उन्हें आस-पास मौजूद भेदभाव व शोषण की जानकारी नहीं मिली, लेकिन धीरे-धीरे समाज में मौजूद जाति, रंग, धर्म आधारित अंतरों को समझते हुए उन्होंने इनके ख़िलाफ़ आवाज़ उठानी शुरू की। वह अलग-अलग थीम्स पर काम करते हैं, जैसे ‘शिक्षा में ब्राह्मणवादी वर्चस्व’ इत्यादि। अपने पालन-पोषण के बारे में बताते हुए कहते हैं कि उनके परिवार ने कभी जाति पर बात नहीं कि क्योंकि वह लोग संसाधन संपन्न थे, लेकिन समाज में विभेद मौजूद हैं और उनपर बात करने की ज़रूरत है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर भी विशेषाधिकार वाले लोगों का ही वर्चस्व है, जिसे बदलने की आवश्यकता है और समाज के बड़े वर्ग तक यह संदेश फैलाया जाना चाहिए। वह कहते हैं कि फूले और आंबेडकर को पढ़कर ही उनमें चेतना आई कि इन सभी मुद्दों पर बातचीत की जानी चाहिए और समाधान के लिए आगे बढ़ना चाहिए।

4. नवीन चौरी

नवीन चौरी, तस्वीर साभार: इंडियन एक्सप्रेस

नवीन चौरी आईआईटी दिल्ली से केमिकल इंजीनियरिंग में ग्रैजुएट हैं और कवि हैं। वह देश की सामाजिक व राजनैतिक घटनाक्रम को देखते हुए चुपचाप नहीं बैठ सके और शोषण व दमन के ख़िलाफ़ उन्होंने अपनी कविताओं को हथियार बना लिया। वह बताते हैं कि लिंचिंग की घटनाओं ने उन्हें स्तब्ध कर दिया था। बढ़ता उन्माद और धार्मिक भेदभाव उन्हें भीतर तक झकझोर रहा था और उसी समय देश में सीएए-एनआरसी के ख़िलाफ़ आंदोलन हो रहे थे, तभी उन्होंने अपनी कविता ‘पिंजरा’ लिखी जो कहती है कि जब हमारे आस-पास भीषण क्रूरता व्याप्त हो तो मनुष्य व नागरिक के रूप में हम चुप नहीं हो सकते। वह मानते हैं कि इस समय में बोलना ज़रूरी है, अगर हम आज नहीं बोले तो फिर क्या सच में हम ज़िंदा हैं? वह अपनी कविताओं में लिंचिंग, कश्मीर और सैनिकों पर बात करते हुए राष्ट्रवाद, देशभक्ति और राज्य की वर्तमान अवस्था पर नया पक्ष रखते हैं। उनकी कविताओं में युवा आदर्शवाद, समतावादी व प्रतिशील समाज की संकल्पना की झलक मिलती है।

5. आमिर अज़ीज़

आमिर अज़ीज़, तस्वीर साभार: टेलिग्राफ

यह वही आमिर अज़ीज़ हैं जिनकी सीएए विरोधी कविता ‘सब याद रखा जाएगा’ का अंग्रेज़ी अनुवाद रॉजर्स वाटर्स द्वारा ‘जूलियन असांजे’ की रिहाई की मांग में पढ़ी गई।आमिर दिल्ली के युवा कवि हैं जो नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा लाए गए फासीवादी नागरिकता कानून के ख़िलाफ़ खुलकर विरोध कर रहे थे। हालांकि आमिर सामाजिक-धार्मिक-राजनीतिक भेदभाव के ख़िलाफ़ 2019 से ही कविताओं के ज़रिये अपनी बात बड़े जनमानस तक पहुंचा रहे थे। इन्हें व्यापक तवज़्ज़ो तब दी गई जब झारखंड में हुई लिंचिंग पर उन्होंने ‘अच्छे दिन ब्लूज़’ कविता लिखी थी। उनकी कविताओं में देश के मौजूदा हालात, धार्मिक ध्रुवीकरण के दुष्प्रभाव, भूमि-अधिकार से लेकर जातिगत भेदभाव जैसे मुद्दों को अड्रेस किया जाता है।

6. लामया खान

लामया मोहसिन खान 21 वर्ष की ग्राफ़िक डिज़ायनर हैं जो सीएए एनआरसी के ख़िलाफ़ आंदोलनों को अपनी कला के माध्यम से स्वर दे रही थीं और मानती हैं कि अब चुप नहीं रहा जा सकता! शाहीन बाग़ आंदोलन के समय अपने ग्राफ़िक्स के ज़रिए उन्होंने आंदोलनरत महिलाओं का समर्थन किया व सरकार की आलोचना की। उन्होxने एक पोर्ट्रेट बनाया जिसमें तीन महिलाएं मुट्ठी भींचकर खड़ी हैं, जिसके माध्यम से उन्होंने औरतों की लचीलता की धारणा खारिज़ करते हुए उनकी दृढ़ता को दर्शाया।

7. तनज़ीला

तनज़ीला का बनाया हुआ आर्ट

शाहीन बाग के क़रीब लगे एक पोस्टर में तिरंगे के रंगों में हिजाब पहने एक औरत कहती है, ”बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे।” यह पोस्टर दिल्ली के कई मेट्रो स्टेशनों और भारत के अलग-अलग भागों में लगा हुआ था जो देश की सरकार के भेदभावपूर्ण नागरिकता संशोधन कानून के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद कर रही महिलाओं का राष्ट्र से आह्वान था। तानिजा विज्ञापन प्रोफेशनल और कलाकार हैं और उनके मुताबिक आपको प्रतिरोध करने से ज़िंदा रहने में मदद करती है।’

ये तो सिर्फ कुछ कलाकारों के नाम हैं जो अपनी कला के माध्यम से सत्ता के दमन को चुनौती दे रहे हैं, अभिव्यक्ति की आज़ादी को बचाए हुए हैं। ऐसे कई और कलाकार हैं जो इस वक्त जिन्होंने अपनी कला को विरोध का ज़रिया बनाया है।

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तस्वीर : फेमिनिज़म इन इंडिया

गायत्री हिंदू कॉलेज से इतिहास विषय में ऑनर्स की पढ़ाई कर रही हैं। मूलत: उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र के एक छोटे से गांव से दिल्ली जाने वाली पहली महिला के रूप में उनके पास सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य से जुड़े बहुत सारे अनुभव हैं, जो इंटरसेक्शनल नारीवाद की ओर उनके झुकाव के प्रमुख कारक हैं। उनकी दिलचस्पी के विषयों में नारीवाद को गांवों तक पहुंचाना और ग्रामीण मुद्दों को मुख्यधारा में ले आना शामिल हैं।

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