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कला-संस्कृति, पर्यावरण, ग्रामीण रहन-सहन, इतिहास और परंपरागत उत्सवों आदि को दर्शाने वाली मधुबनी पेंटिंग मिथिला क्षेत्र की पहचान है। ये चित्रकला मिथिला क्षेत्रों जैसे बिहार के दरभंगा, पूर्णिया, सहरसा, मुजफ्फरपुर, मधुबनी और नेपाल के भी कुछ हिस्सों में जैसे जनकपुर सिरसा-धनुष जिलों में काफी प्रचलित है। इसमें मिथिलांचल की संस्कृति और इतिहास का वर्णन देखने को मिलता है। यह कला त्योहारों पर घर की दीवारों, आंगन, शादी-ब्याह के मौके पर बनाई जाती हैं। आज सरकार द्वारा भी इस कला को बढ़ावा देकर महिलाओं के लिए कई अवसर प्रदान किए जा रहे हैं। इस कला में पूरी तरह प्राकृतिक वनस्पति से बने रंगों का इस्तेमाल किया जाता था। घर की दीवारों और आंगन पर रंगोली की तरह बनाई जाने वाली इस मधुबनी चित्रकला को आज विश्वविख्यात बनाने में कई कलाकारों का योगदान रहा है जिसमें से कुछ कलाकारों की चर्चा हम अपने इस लेख में कर रहे हैं।

1. जदगम्बा देवी

जगदम्बा देवी

जदगम्बा देवी अपनी मधुबनी चित्रकला के लिए साल 1970 में राष्ट्रीय सम्मान और 1975 में पद्मश्री से सम्मानित होने वाली पहली भारतीय महिला कलाकार थी। साल 1962 में अखिल भारतीय हस्तशिल्प बोर्ड के कला पारखी जब कलाकारों का चयन करने के लिए मधुबनी पहुंचे तो उन चुने गए पांच कलाकारों में से एक जगदम्बा देवी भी थीं। बाद में जगदम्बा देवी द्वारा निर्मित चित्रों की नई दिल्ली स्थित में प्रदर्शनी लगी जिसके बाद दूर-दूर से लोग उनके चित्र खरीदने पहुंचने लग गए। उनके कुछ चित्रों को साबरमती आश्रम तो कुछ को विदेशों में भी संग्रहित किया गया है। उनके अधिकतर चित्र पौराणिक कथाओं पर आधारित होती है और साथ ही उनके चित्रों में लाल रंग की प्रधानता पायी जाती है।

2. सीता देवी

सीता देवी

जितवारपुर गांव की सीता देवी मधुबनी कला की एक अग्रणी कलाकार थी, 1960 के दशक में उन्हें उनकी मधुबनी पेंटिंग के लिये व्यक्तिगत रूप से पहचान मिली। वह मिथिला कला को घर की दीवारों और आंगन से कागज़ और कैनवास तक स्थानांतरित करने वाली पहली कलाकार मानी जाती हैं। उनकी कृष्ण-राधा और अन्य देवी-देवताओं की पेंटिंग को सबसे अधिक प्रसिद्धि मिली। नई दिल्ली में राष्ट्रीय हस्तशिल्प और हैंडलूम संग्रहालय में एक कलाकार के रूप में सीता देवी ने कई बड़े-बड़े राजनेताओं जैसे लाल बहादुर शास्त्री, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, इंदिरा गांधी आदि से अपनी अद्भुत कला के लिए प्रशंसा पाई। उन्हें कई पुरस्कारों से भी सम्मानित किया गया था। साल 1981 में उन्हें पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया और इसके बाद साल 1984 में बिहार रत्न भी दिया गया। उनकी इसी प्रसिद्धि के कारण उनके गांव जितवारपुर के लोगों को प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालय, पक्की सड़कें और बिजली के खम्भे आदि की सुविधा प्राप्त हुईं। सीता देवी की प्रभावशाली कला को कई देशों में स्थायी कला के रूप में रखा गया जिसमें से मुख्य हैं; लंदन का विक्टोरिया एंड अल्बर्ट संग्रहालय, लॉस एंजिल्स काउंटी म्यूज़ियम ऑफ़ आर्ट, फिलाडेल्फिया संग्रहालय, पेरिस में मुसी डू क्वाई ब्रांली, जापान में मिथिला संग्रहालय आदि ।

3. महासुंदरी देवी

साल 1961 में महासुंदारी देवी ने खुद को चार दीवारी से निकालकर मधुबनी पेंटिंग की ओर अपने कदम बढ़ाए और खुद को सशक्त बनाकर आनेवाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत बनी। महासुंदारी देवी सिक्की वर्क, सुजनी क्राफ्ट और क्ले वर्क में विशेष रूप से महारथ हासिल थी। कला और कलाकारों के विकास के अपने उद्देश्य को पूरा करने के लिए उन्होंने मिथिला हस्तिशिल्प कलाकार औद्योगिकी साहित्य समिति की स्थापना भी की। साल 1982 में उन्हें कला के प्रति समर्पण के लिये राष्ट्रपति द्वारा मान्यता प्राप्त हुईं और 2011 में महासुंदारी देवी को पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया। उनकी इस विरासत और कलाकृति को उनकी भाभी कर्पूरी देवी और पोती पुष्पा कुमारी ने रुकने नहीं दिया और इसे आगे ले जा रही हैं।

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4. मालविका राज

मालविका राज

मधुबनी कला जो परंपरागत रूप से हिंदू पौराणिक कथाओं से प्रचलित दृश्यों को प्रदर्शित करने के लिये प्रचलित हैं। बिहार के समस्तीपुर की दलित महिला कलाकार मालविका राज ने बुद्ध के समय के लोकगीतों को चित्रित करके इस शैली में सालों से चली आ रही पारंपरिक प्रथा में विशेष रूप से बदलाव लाने का काम किया। द हिंदू के साथ अपने एक इंटरव्यू में उन्होंने दलित महिलाओं के रुके हुए विकास को लेकर अपनी चिन्ता व्यक्त की और कहा, “मैं एक नारीवादी हूं और मैं महिला सशक्तिकरण का पुरजोर समर्थन करती हूं लेकिन दलित महिलाएं इस आंदोलन में काफी पिछड़ रही हैं और जीवन के हर पड़ाव में अन्य महिलाओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने में असमर्थ हैं। वे तीन गुना असमानता का सामना कर रही हैं। पहली बात वे दलित हैं; दूसरी वे महिलाएं हैं और ज़्यादातर सभी अशिक्षित और गरीब हैं।”

5. दुलारी देवी

मल्लाह समुदाय से संबंध रखने वाली दुलारी देवी घरेलू कार्यों में मदद के रूप में काम करते हुए उनकी मुलाक़ात पद्मश्री से सम्मानित मधुबनी कलाकार महासुंदरी देवी और उनकी भाभी कर्पूरी देवी से हुईं, जिनसे वह बहुत अधिक प्रभावित हुईं और उनके सामने अपनी मधुबनी कला सीखने की उत्सुकता प्रकट की जिसके बाद वे दोनों ही उनकी गुरु बन गईं और आज उनकी सिखाई कलाकृति को वो आगे ले जा रही हैं। दुलारी देवी ने मधुबनी कला में बदलाव किए और इसके प्राथमिक रंगों का विस्तार किया है। अपनी कलाकृति के साथ-साथ वह मल्लाह समुदाय से संबंध रखने वाले बच्चों की शिक्षा पर भी काम करना चाहती हैं जिससे कि उन्हें औपचारिक शिक्षा प्राप्त हो सके।

6. पुष्पा कुमारी

1969 में जन्मी, प्रतापी दादी महासुंदरा देवी के मार्गदर्शन में पली बढ़ीं उनकी पोती पुष्पा कुमारी सामाजिक मुद्दों को आध्यात्मिक दृष्टिकोण से दर्शाने के अपने तरीके के लिए जानी जाती हैं। एचआईवी, कन्या भ्रूण हत्या और यहां तक ​​कि पौराणिक कथाओं से संबंधित सामाजिक मुद्दों के प्रति उनका नज़रिया उन्हें सबसे अलग और प्रभावशाली भी करता हैं और वो न केवल दुनिया को चित्रित करती हैं बल्कि उन्हें अपनी समझ और दृष्टिकोण से भी जोड़ती हैं। उनकी कला में विशेष रूप से सामूहिक संघर्षों की व्यक्तिगत और राजनीतिक व्याख्या को सूक्ष्म विवरण या नाटकीय अभिव्यक्ति के माध्यम से दर्शाया जाता हैं। पर इसके बाद भी वह अपनी कलाकृतियों में पारंपरिक शैली को बरकरार रखती है।

7. महालक्ष्मी

महालक्ष्मी

महालक्ष्मी उन युवा महिला कलाकारों में से एक हैं, जो सड़क पर होने वाले उत्पीड़न और शिक्षा जैसी समस्याओं के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए अपनी कला का उपयोग करती हैं। महालक्ष्मी संस्कृति मंत्रालय द्वारा एक छात्रवृत्ति प्राप्त विद्यार्थी और सफल कलाकार हैं। साथ ही वह शादी के बाद भी अपना काम जारी रखना चाहेंगी। द बेटर इंडिया के साथ एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने बताया कि जब उनके गुरुओं ने उनसे अपनी कला में पौराणिक कथाओं पर जोर न दिए जाने के बारे में पूछा, तो उन्होंने जवाब दिया कि, अहल्या एक खूबसूरत महिला थी, जिसे शाप दिया गया था, जिसके कारण वह पत्थर में बदल गईं जिसे आखिरकार भगवान राम के स्पर्श के बाद अपने शाप से मुक्ती मिली । लेकिन एक महिला को किसी के ‘बचाव’ के लिए इंतजार क्यों करना चाहिए? मैं मानती हूं कि अब समय आ गया है कि हम महिलाओं को अपना राम स्वयं बनना होगा और खुद को पितृसत्ता की बेड़ियों से मुक्त करना होगा।”

8. बउआ देवी

बउआ देवी महज़ 13 साल की उम्र से ही मधुबनी चित्रकला बनाती आ रही हैं और अब तक उन्हें इस चित्रकला में लगभग 60 वर्ष हो चुके है। बउआ देवी जापान के मिथिला म्यूजियम में भी 11 बार अपनी हाजरी दे चुकी है और मिथिला पेंटिंग से जुड़े दुनिया के हर मंच पर उन्हें पुरस्कृत किया जा चुका। साथ ही उन्हें पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया और उनके साथ-साथ उनका पूरा परिवार भी मिथिला पेंटिंग को समर्पित है और इस विधा को आगे बढ़ाने का कार्य कर रहा है।

ऐसी ही कई अनेक महिला कलाकार समय के साथ अपनी कला को व्यक्तिगत, राजनीतिक से जोड़ रही हैं। उनकी कलाकृतियां ही अब उनकी वास्तविकता का प्रतिबिंब हैं, जो पितृसत्तात्मक संरचना से मेल नहीं खाती, जो उन्हें विरासत में मिली हैं। पर वे अपने कौशल के साथ नया इतिहास रचने में सक्रिय रूप से कार्यशील हैं।

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