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वीथिका यादव मानवाधिकार की जानकार हैं और क़रीब दस से अधिक वर्षों से आधुनिक दासता (मॉडर्न डे स्लेवरी), यौन और लैंगिक अधिकारों पर काम कर रही हैं। वर्तमान में वह ‘लव मैटर्स इंडिया’ की कंट्री हेड हैं। साल 2007 में उन्हें यंग राइजिंग लीडर एंड डेवलपमेंट प्रोफेशनल कैटेगरी में ‘एटलस कॉर्प्स फ़ेलोशिप’ से नवाज़ा गया था जिसके तहत वह अमेरिका में भारत की ओर से नेतृत्व कर रही थीं। उन्होंने देश-विदेश के अनेक महत्वपूर्ण संस्थानों जैसे UNODC, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस ट्रस्ट, फ्री द स्लेव्स और एमटीवी. एग्जिट के साथ काम किया है। इस दौरान उन्हें तमाम उपलब्धियां व सम्मान भी मिले हैं। पढ़िए, उनके साथ फेमिनिज़म इन इंडिया की ख़ास बातचीत।

सवाल : तमाम बड़े अंतरराष्ट्रीय संगठनों के साथ काम करने से लेकर ‘लव मैटर्स इंडिया’ तक की अपनी यात्रा के बारे में बताइए।

वीथिका यादव : देखिए, बुनियादी शुरुआत मानवाधिकार संबंधी मुद्दों पर उसमें भी मूलतः महिलाओं और बच्चों से जुड़े विषयों पर शोध करने से की। इस दौरान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैले मानव व्यापार के नेक्सस के बारे में पता चला। यह उस समय की बात है, जब इसपर ज़्यादा बातचीत नहीं होती थी, जो कुछ जानकारी बाहर आ भी रही थी, वह ‘सेक्सुअल एक्सप्लॉइटेशन’ के बारे में थी, जिसे कभी-कभी मीडिया द्वारा ‘सेंसेशनल’ बनाकर पेश किया जाता था। इसके अतिरिक्त इसपर कोई विमर्श या बातचीत नहीं की जाती थी कि यह समूचा नेक्सस किस तरीके से काम कर रहा है और किन-किन स्तरों पर लोगों का शोषण हो रहा है। शोध के दौरान अध्ययन करने पर गहराई में उतरती चली गई। आप समझिए कि जब ‘मॉडर्न डे स्लेवरी’ की बात की जाती है तो लोग इसको पहले-पहल स्वीकार ही नहीं करते, उन्हें लगता है, ये क्या चीज़ है क्योंकि उनके मन में तो यह धारणा है कि दास प्रथा खत्म की जा चुकी है फिर आज के दौर में भी इसपर बातचीत क्यों हो।

मानव व्यापार के मौजूदा तंत्र पर गौर करने पर मालूम चलता है कि यह पहले के प्रचलित ‘बंधुआ मज़दूरी’ व्यवस्था से अलग है। पहले के गुलामों की स्थिति दयनीय थी लेकिन कहीं न कहीं वे सोशल-स्टेटस का भाग होते थे, तब वह सब कुछ वैध था इसलिए शोषण के पैमाने भी अलग थे। आज यह व्यवस्था अवैध है, फिर भी मौजूद है और इसको जो लोग नियंत्रित कर रहे हैं, वे और अधिक बड़े पैमाने शोषण कर रहे हैं क्योंकि ग़रीबी और लोगों की कोई कमी नहीं है। इसलिए उनका टारगेट आसानी से उपलब्ध है। इस प्रकार, लोगों की मज़बूरी का फ़ायदा उठाकर उनका अत्यधिक शोषण किया जा रहा है। इन्हीं सभी मुद्दों को समझते हुए मैंने अपनी शुरुआत की, उस दौरान मैंने समझा कि मीडिया भी जबरन श्रम और बंधुआगिरी की समस्या को बड़े मुद्दे के रूप में नहीं उठाता क्योंकि ये मुद्दे उन्हें सनसनीखेज़ नहीं लगते। उसके बाद मैंने देश में भी महिलाओं और बच्चों को केंद्र में रखकर काम किया जिसमें बिहार और उत्तर प्रदेश की सीमाओं पर रहने वाले लोगों से ज़्यादा मिलना जुलना हुआ। इस दौरान मैंने देखा कि उनकी स्वास्थ्य स्थितियां ठीक नहीं हैं। उनके साथ छोटी उम्र में यौन शोषण की घटनाएं होती रही हैं जिससे मानसिक स्थिति व विश्वास संतुलित नहीं हैं।

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इसी दौरान मैंने अन्य देशों में भी काम किया, जिसमें कम्बोडिया, वियतनाम इत्यादि प्रमुख रहे। संयुक्त राष्ट्र के UNODC यानी यूनाइटेड नेशन ऑर्गनाइज़ेशन ऑफ ड्रग एंड क्राइम के साथ भी कुछ समय तक काम किया। इस प्रकार, महिलाओं, बच्चों सहित बंधुआ मज़दूरी, नशे और अपराध इत्यादि के विषय में व्यापक जानकारी हासिल की और इस दौरान इन सभी क्षेत्रों के बड़े व प्रतिष्ठित लोगों के साथ काम करने के अवसर का लाभ उठाया। इस दौरान बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के लिए मैंने रेडियो पर बिहार में बंधुआ मजदूरी पर एक कार्यक्रम किया। इसी दौरान न्यू मीडिया की शुरुआत ही रही थी। मैंने सोचा कि समाज में बड़े बदलाव लाने के लिए इसका एक शक्तिशाली हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। मैंने इसे एक ऐसे माध्यम के रूप में देखा, जिससे सीधे जनता से जुड़ने में आसानी होगी। इंटरनेट का चलन बढ़ रहा था। साथ ही, विभिन्न इलाकों में काम करते हुए मैंन पाया था कि यौन और प्रजनन पर खुलकर बात नहीं ही रही है। इस क्षेत्र में जो ग़ैर-सरकारी संस्थाए हैं, वे भी इसे ‘फैमिली प्लानिंग’ कहकर सेक्स के अन्य आयामों को सीमित कर रहे हैं। सेक्स और सेक्सुअलिटी को फैमिली प्लानिंग के चश्मे से देखने के कारण युवाओं के अन्य जरूरी सवालों का समाधान नहीं किया जाता। इसके साथ ही, एक बड़ी चुनौती थी कि आख़िर युवाओं से बात कैसे की जाए क्योंकि समाज में इन मुद्दों को लेकर सहजता नहीं थी।

न्यू मीडिया के माध्यम से युवाओं से बात करने पर मालूम हुआ कि सेक्स के बारे में किसी किस्म की पहली जानकारी उन्हें पोर्नोग्राफी से ही मिली है। वे अक्सर कहते थे कि उनके पास बहुत से सवाल हैं जिनके जवाब जानने की इच्छा है लेकिन कोई स्रोत नहीं है। वे उन्हें निजी सवाल मानते हुए इनके जवाब निजी रूप से ही जानना चाहते थे। इस तरह समस्या को जानकर हमने इसके समाधान के लिए साल 2011 में  ‘लव मैटर्स इंडिया’ की शुरुआत की। हमने इसे हिंदी और अंग्रेज़ी दोंनो ही भाषाओं में उपलब्ध करवाया क्योंकि कहीं न कहीं हिंदी क्षेत्र अक्सर ही इसमें पीछे छूट जाता है और वहां रूढियां और अधिक मजबूत हो जाती हैं।

इसमें हमारा प्रमुख लक्ष्य टीनएजर्स को टारगेट करना, उनकी समस्याएं जानना और बहुत सारी गलत जानकारी जो उन्होंने समाज से ली थी, उसे अनलर्न करने की एक प्रक्रिया सहजता से शुरू करना था। बहुत सारे लोगों ने आलोचना करते हुए इसे फूहड़ और असहज भी बताया। लोगों को लगता था, ये लोग कैसे हस्तमैथुन और ऑर्गैज़म पर खुले तौर पर बात कर रहे हैं। हालांकि, हमने पहले बात करने का स्पेस तैयार किया और समझा कि व्याप्त सोशल कंडीशनिंग तो तोड़कर नई और सकारात्मक समझ बनाई जाए। इसके बाद, हमने ऑनलाइन और मीडिया के सहयोग से अनेक कार्यक्रम भी चलाए, जिससे लोगों में जागरूकता फैले। इसमें एमटीवी के साथ इंटिमेट रिश्तों और हिंसा पर आधारित एक फ़िल्म और दिल्ली के दस मेट्रो स्टेशन पर यौन और प्रजनन सम्बंधी फ़िल्म का प्रसारण भी शामिल था। अभी हम ‘कम्प्रेहेंसिव सेक्सुअल एडुकेशन’ पर एक नया ऐप लांच कर रहे हैं, जिससे लोगों तक अधिक से अधिक सूचनाएं पहुंचा सकें। भारत में ‘लव मैटर्स’ की सफ़लता के बाद ज़रूरत के हिसाब से यह योजना दुनिया के अलग अलग हिस्सों में भी शुरू किया जा रही है। इसमें इजिप्ट, अफ़्रीका इत्यादि शामिल हैं और यहां की स्थानीय टीम्स ही इसका नेतृत्व कर रही हैं।

सवाल: आप जिन मुद्दों पर काम कर रही हैं, वो सामाजिक, सांस्कृतिक संरचना और परंपरा को सीधे तौर निशाने पर लेती हैं और उन्हें चुनौती देती हैं, ऐसे में आपके सामने कोई बड़ी सामाजिक या प्रशासनिक चुनौती आई थी?

वीथिका यादव: मुझे नहीं लगता कि बिना किसी चुनौती के कोई भी काम, खासकर जब इस तरह का कोई काम हो, संभव हो पाएगा। हालांकि इस तरह की सीधी  प्रशासनिक चुनौती नहीं रही, न ही धमकी दी गई। इसका एक कारण ये हो सकता है कि हम अपने अप्रोच को लेकर बहुत स्पष्ट थे। हमने सामाजिक सच्चाई को देखकर अपनी एक स्ट्रेटजी तैयार कर रखी थी, जिसमें पहले लोगों को सहज बनाना शामिल था। हम अपनी सोच उनपर थोपना नहीं चाहते थे, न ही उनको कमतर आंक रहे थे। हम यह मानकर चल रहे थे कि सामाजिक तौर पर जो असहजता थी, हम उसको चुनौती दे रहे थे। लेकिन सालों से जो धारणा बनी हुई है, उसे सीधे तौर पर नकारना संभव नहीं था, इसलिए हमने चरण दर चरण कोशिश की कर इस तरह सामाजिक स्वीकृति और सहयोग हासिल किया। इस दौरान हमें उन संस्थाओं द्वारा जज किया गया जो ‘परिवार नियोजन’ के लिए काम कर रही थी लेकिन फिर भी कोई सीधा हमला नहीं किया गया। इस दौरान हम ‘प्लेज़र-पॉज़िटिव इन्फर्मेशन’ लेकर आए, जिसे हिंदुस्तान में तमाम संस्थाओं द्वारा अडॉप्ट किया गया, इस प्रकार यह ‘यौन व प्रजनन’ की दिशा में हमारे द्वारा हासिल बड़ी जीत साबित हुई।

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सवाल : आप टेडक्स (tedx) वीडियो में ‘कल्चर ऑफ साइलेंस’ पर बात करते हुए बात कहती हैं कि इसके कारण महिलाओं को बलात्कार, भेदभाव, स्त्रीद्वेष, अन्याय इत्यादि मिला है, जो कि सच भी है। लेकिन, चुप रहने की यह संस्कृति आज के उत्तर-आधुनिक विश्व में भी क्यों बनी हुई है? साथ ही, कुछ दिन पहले उत्तर प्रदेश के उन्नाव में तीन दलित लड़कियां जंगल में बंधी मिलीं, जिनमें से दो की मौत हो गई है, एक की स्थिति गंभीर है। इसी के परिप्रेक्ष्य में ग्राउंड रियलिटी देखें तो मालूम पड़ता है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश पूर्वी भाग से अपेक्षाकृत आर्थिक रूप से मज़बूत है। ऐसे में क्या इन सब के बीच कोई तालमेल है और अगर है तो आर्थिक मज़बूती के बरक्स सामाजिक मज़बूती को लेकर आपके क्या विचार हैं?

वीथिका यादव: अगर वास्तविक स्थिति को देखते हुए बात करूं तो भारत के परिप्रेक्ष्य में आर्थिक मज़बूती से सामाजिक मज़बूती की निश्चितता का दावा नहीं किया जा सकता। यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है क्योंकि जब हम उन परिवारों की ओर देखते हैं जो आर्थिक रूप से सशक्त हैं, उनमें भी लड़की और लड़के के बीच भेदभाव मौजूद हैं। वहां भी लड़कियों की शिक्षा पर ध्यान नहीं दिया जाता, उन्हें लड़कों के समान आगे बढ़ने के अवसर नहीं दिए जाते, न ही यह देखने को मिला है कि आर्थिक संपन्नता आने से जातिगत या धार्मिक भेदभाव की प्रवृत्ति खत्म हो जाए। यह असल में सोच का मसला है और यदि अमीर व्यक्ति रूढ़िवादी है तो किसी भी स्थिति में सामाजिक विकास संभव नहीं हो सकता। कई बार तो शिक्षा मिलने पर भी ये रूढियां नहीं टूटती, पढ़े-लिखे लोगों के भीतर भी पितृसत्ता और जातिवाद बना रहता है। तार्किकता और बौद्धिकता के लिए शिक्षा ज़रूरी है लेकिन इसकी कोई गारंटी नहीं है कि पढ़ा-लिखा आदमी रूढ़ियों से मुक्त ही होगा। आप देखिए कि बड़े शहरों में जहां शिक्षा और रोजगार की संभावनाएं मौजूद हैं, वहां भी लड़कियां सीमित की गई हैं, लड़कियों को पढ़ने-लिखने-बोलने नहीं दिया जा रहा है, उनके साथ शहर और गांव दोनों ही जगह बलात्कार हो रहे हैं, इसलिए ज़रूरी है यह देखना कि भीतर सदियों से जमी धारणा खत्म हो रही है या नहीं, और अगर वह धारणा खत्म नहीं होती तो समाज में कोई बड़ा परिवर्तन देखने को नहीं मिलेगा।

सवाल : तो क्या भारत की वर्तमान शिक्षा प्रणाली रूढ़िवादी धारणाओं को तोड़ने और खत्म करने में सफल नहीं है? क्या लैंगिक संवेदनशीलता जैसे ज़रूरी मुद्दे अभी भी बहस के दायरों से से बाहर हैं? 

वीथिका यादव : जी बिल्कुल, आज भी बड़े विश्वविद्यालयों व स्कूलों में तमाम ऐसे वाकये हो रहे हैं जो ‘शॉकिंग’ हैं। शिक्षा पद्धति में रूढ़िवादी परंपराओं की आलोचना करना, उन पर सवाल उठाना और लैंगिक संवेदनशीलता फैलाने पर ज़ोर दिया जाना चाहिए। साथ ही, शिक्षा पद्धति में ऐसे सुधार किए जाएं जिससे लैंगिक विभेदों को खत्म किया जाए। बॉयज़ लॉकर रूम से लेकर ‘हिंदू कॉलेज वी ट्री पूजा’ जैसी घटनाएं भारतीय शिक्षा व्यवस्था पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा रही हैं।

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सवाल : आपने UNODC (यूनाइटेड नेशंस ऑर्गनाइज़ेशन ऑफ ड्रग एंड क्राइम) के साथ काम किया है। आज के अंतर्राष्ट्रीय पटल पर ‘ड्रग’ और ‘स्लेवरी’ एक बड़ी समस्या बने हुए हैं। इनके अधिकतर मामलों में पीड़ितों से लेकर नेक्सस में शामिल लोगों पर ग़ौर करें तो उनमें से अधिकतर ‘मार्ज़िनलाइज़्ड कम्युनिटीज़’ से आते हैं। इसके पीछे क्या कारण होगा?

वीथिका यादव : मैं ऐसा मानती हूं कि जो भी समूह खतरे के क़रीब अथवा हाशिए पर होते हैं, वे ड्रग और अपराध का तंत्र चलाने वालों के आसान निशाने होते हैं। दरअसल, हाशिए पर स्थित जनसंख्या आर्थिक तंगी से जूझ रही होती है, उन्हें खाने-जीने के लाले पड़ रहे होते हैं, ऐसे में नेक्सस चलाने वाले ज़रूरतमंदों को पैसे का लालच देकर इसमें खींच लेते हैं। यह असलियत में ‘संस्थागत विभेदीकरण’ का परिणाम है। ऐसी स्थिति में किसी को दोषी ठहराने से पहले समूची प्रक्रिया को देखना होगा, उनका इतिहास खंगालना होगा। वे ऐसा करते हैं क्योंकि वे शक्तिहीन हैं, उनका हमेशा से शोषण हुआ है। उनकी जड़ें देखरे बग़ैर आरोप लगाना न्यायसंगत नहीं है। क्योंकि उनके लिए अवसर बेहद कम रहे हैं, इसलिए वे आसान लक्ष्य बनते रहे हैं।

सवाल : हॉरर किलिंग जिसे अक्सर ‘ऑनर किलिंग’ कह दिया जाता है, के अधिकतर मामलों में लड़की का पक्ष हत्यारा होता है, क्योंकि झूठी शान का दिखावा करने के लिए लड़की की हत्या कर दी जाती है। ऐसे में जब देशभर में सामाजिक नफ़रत बढ़ रही है, उस स्थिति में ‘लव ज़िहाद’ जैसे कानूनों की क्या भूमिका होगी?  क्या यह कानून ‘इज़्ज़त’ के कंस्ट्रक्ट को और अधिक गहराते हुए लड़कियों को ‘वल्नरेबल’ बनाएगा?

वीथिका यादव :  मेरा निजी विचार यह है कि आज के राजनीतिक-सामाजिक स्थिति में आम जनता की भावनाओं का इस्तेमाल किया जा रहा है और उन्हें बेवकूफ़ बनाया जा रहा है। इस दौरान आप देखेंगे कि ‘शिक्षा’ भी अधिकतर मामलों में कोई परिवर्तन नहीं ला रही है, लोग धर्म, जाति, संप्रदाय के नाम पर बंटते जा रहे हैं और राजनीतिक दलों द्वारा ध्रुवीकरण किया जा रहा है। आप देखेंगे कि वैचारिक कट्टरता बढ़ती जा रही है, सोशल मीडिया पर मार-काट मची हुई है। नफ़रत इतनी तेजी से फैलाई जा रही है कि एक किस्म का सामाजिक-बंटवारा हो गया है। ऐसी स्थिति में ये कानून लाए जा रहे हैं क्योंकि कहीं न कहीं लोगों के डर के सहारे उन्हें एक दूसरे से पूरी तरह अलग-थलग करने की कोशिश है। बिल्कुल ‘इज़्ज़त’ जैसे मसले पितृसत्ता की उपज हैं और धर्म के साथ जोड़कर अंतर को और अधिक बढ़ाया जा रहा है। जहां तक लव ज़िहाद की बात है तो देश का संविधान और कानून सबसे बड़ा है और वो कानून बालिग लोगों को उनकी स्वतंत्रता से अपना साथी चुनने का अवसर देता है, जिसमें कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकता। यही विचार समाज में प्रचारित करने व सामाजिक संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता है।

सवाल : फेमिनिज़्म इन इंडिया को कोई संदेश या सुझाव देना चाहेंगी?

वीथिका यादव : सच कहूं तो, फेमिनिज़्म इन इंडिया मेरे पसंदीदा पोर्टल्स में से एक है। आज के समय में, जब एक ओर बहुत सारी सूचनाएं मौजूद हैं, यह सनसनीखेज खबरों से अलग ज़रूरी मुद्दों पर पुख़्ते तौर पर जानकारी उपलब्ध करवाता है। आज की स्थिति को देखते हुए लगता है कि अच्छे प्लेटफॉर्म्स की बहुत कमी है इसलिए पाठकों से मैं कहूंगी कि एक अच्छे नागरिक के रूप में हम सबकी यह जिम्मेदारी है कि अच्छी पत्रकारिता को बढ़ावा दें और उनका सहयोग करें।

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