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आसिया जिलानी कश्मीर के उन पहले पत्रकार सामाजिक कार्यकर्ताओं में से एक थीं, जिन्होंने कश्मीर में हो रहे मानवाधिकारों के उल्लंघन के बारे में बोलने और लिखने का काम शुरू किया। जब लोगों ने अपने साथ हो रहे उत्पीड़न को अपनी किस्मत ही मानना शुरू कर दिया था ऐसे समय में एक 20 वर्षीय युवा महिला पत्रकार और कार्यकर्त्ता पुरुष-प्रधान समाज के ख़िलाफ़ उठ खड़ी हुई। आसिया जिलानी का जन्म कश्मीर की ग्रीष्मकालीन राजधानी श्रीनगर में 9 फरवरी, 1974 को हुआ था। उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा श्रीनगर में ही ली। उसके बाद उन्होंने श्रीनगर में गवर्नमेंट कॉलेज फॉर वीमेन से विज्ञान में स्नातक प्राप्त किया। चूंकि उनकी लेखन कार्यों में विशेष रुची थी, इसलिए उन्होंने कश्मीर विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर हासिल किया। आसिया को अपनी पहली नौकरी साल 1998 में एजेंस फ्रांस प्रेस (एएफपी) में कश्मीर ब्यूरो के प्रशिक्षु रिपोर्टर और शोधकर्ता के रूप में मिली। इसके बाद आसिया साल 2001 में वह दिल्ली में बस गईं और टाइम्स ऑफ इंडिया के साथ काम करने का फैसला किया जिसके लिए उन्होंने वहां से पत्रकार के रूप में इंटर्नशिप की। साल 2002 में वह अपनी नौकरी छोड़कर जम्मू एंड कश्मीर गठबंधन ऑफ़ सिविल सोसायटी (JKCCS) के साथ काम करने लगीं, जो कि उनके जीवन की एक महत्वपूर्ण घटना साबित हुई।

उन्होंने JKCCS के साथ अपने सबसे यादगार काम की शुरुआत की। आसिया कश्मीर में फैली पितृसत्तात्मक संरचनाओं में भारतीय सेना और साथ ही उसके बीच कश्मीरी महिलाओं के हर दिन के संघर्ष और उनके दर्दनाक अनुभवों को शब्द देना चाहती थी। इसके तुरंत बाद साल 2002 में ही आसिया और उनके सहयोगियों ने मिलकर कश्मीर में शांति और निरस्त्रीकरण के लिए कश्मीरी महिला पहल की स्थापना की। यह संगठन, कश्मीर में फैले हुए लिंग संघर्ष पर ध्यान केंद्रित करता है और कश्मीरी महिलाओं की आवाज़ को सशक्त बनाने का काम करता है। वह इसकी पहली मुखिया बनाई गई पर यह सिर्फ एक शुरुआत थी। आसिया ने इस संगठन के माध्यम से कश्मीरी महिलाओं की दुर्दशा के लिए वैश्विक समर्थन इकट्ठा किया। जिसके लिए साल 2003 में उन्होंने नीदरलैंड में एक शांति प्रबंधन सम्मेलन में भाग लिया, जहां उन्होंने कश्मीर और कश्मीरी महिलाओं के बारे में बात की। वह चाहती थी कि कश्मीर में रह रहे लोगों के जीवन की वास्तविकता को जाने। आसिया ने अपनी इस नीदरलैंड यात्रा के दौरान कहा था, “मैं समाज को यह बताना चाहती हूं कि कश्मीर में वास्तव में क्या चल रहा है।”

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आसिया ने KWIPD के बैनर तले ‘वॉयस अनहियर्ड’ नामक अपनी समाचार पत्र की शुरुआत की। इस पत्रिका का प्रचलन साल 2003 से शुरू हुआ था और आसिया इसकी पहली संपादक थी, जिसके अधिकांश लेख उन्होंने ही लिखे थे। उन्होंने कश्मीरी महिलाओं के साथ हो रहे उत्पीड़न जैसे बलात्कार आदि मुद्दों पर प्रकाश डाला और ‘आधी विधवा’ महिलाओं के जीवन संघर्ष को भी व्यक्त किया। ‘आधी विधवा’ यानि ‘हाफ़ विडो’ शब्द उन महिलाओं के लिए बनाया गया था जिनके पति गायब कर दिए गए या वे कभी लौटकर वापस नहीं आए। इन मुद्दों की जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए उन्हें कई बार दूर तक सफर भी करना पड़ता था। पत्रकारिता और लेखन कार्यों के अलावा, आसिया जिलानी ने हिंसा से पीड़ित महिलाओं की मदद करने की भी कोशिश की। उन्होंने अपने साहियोगियों के साथ कश्मीर में महिलाओं के लिए स्वयं सहायता समूहों की शुरुआत की, जहां लड़कियों को प्रशिक्षण दिया जा सके। यह बाद में आसिया मेमोरियल फाउंडेशन के नाम से जाना जाने लगा।

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20 अप्रैल साल 2004 में आसिया ने मानवाधिकार कार्यकर्ता खुर्रम परवेज़ के साथ जुड़ने का फैसला किया। एक फैक्ट फाइंडिंग मिशन के दौरान वह टैक्सी से कश्मीर के एक छोटे से ज़िले कुपवाड़ा जा रही थी, जिसमें उनके साथ खुर्रम परवेज भी थे। वह यह देखने जा रही थी कि वहां हो रहे चुनाव पूरा तरह निष्पक्ष हो रहे थे या नहीं। उनकी इस यात्रा के दौरान ही एक IED विस्फोट हुआ। इस विस्फोट से आसिया गंभीर रूप से घायल हो चुकी थी, जिसके कारण उन्हें अस्पताल ले जाते समय ही उनकी रास्ते में मौत हो गई। आसिया जिलानी की हत्या के अपराधी का पता नहीं चल सका, लेकिन उनकी मौत कैसे हुई, इस बात की जांच पड़ताल की गई थी। उनकी मौत से ना केवल उनके परिवार और दोस्तों को बल्कि कश्मीर की हर पीड़ित महिलाओं को जिनकी आवाज़ को आसिया ने मंच प्रदान किया था, गहरा झटका लगा। चुनाव निगरानी को कुछ समय के लिये रोक दिया गया था पर उनके अंतिम संस्कार के बाद, जेकेसीसीएस ने चुनाव प्रक्रिया पर अपनी फैक्ट फाइंडिंग जारी रखी और आसिया जिलानी को समर्पित करते करते हुए रिपोर्ट भी जारी की ।

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लोग आसिया जीलानी को एक ऐसी महिला के रूप में याद करते हैं जिसने कश्मीरी लोगों के हक के लिए लड़ते-लड़ते अपनी जान गंवा दी। उन्होंने कश्मीरी महिलाओं के लिए न्याय के एक वाहक के रूप में काम किया और पीड़ित महिलाओं की आवाज़ बनीं। वह एक निडर व्यक्तित्व वाली साहसी पत्रकार थी जिसने कश्मीरी लोगों के इंसाफ़ और अधिकारों के लिए काम करना चुना, वह भी उस वक़्त एक ऐसे स्थान पर जहां उन्हें चुप कराने के लिए बहुत से लोग बस मौका तलाश रहे थे पर आसिया के प्रयास बेकार नहीं गए उन्होंने सभी महिलाओं को अपनी सच्चाई बोलने का मार्ग दिखाया और कश्मीरी महिला पत्रकार कार्यकर्ताओं के लिए लिंग संघर्ष के बारे में लिखने और बोलने के लिए एक प्रवेश बिंदु बना दिया था, जो की सभी के लिए एक प्रेरणा बनी।

और पढ़ें : मूल रूप से अंग्रेज़ी में लिखे गए इस लेख को पढ़ने के लिए क्लिक करें


तस्वीर साभार : Wande Magazine

मैं ख़ुशी वर्मा इलाहाबाद स्टेट यूनिवर्सिटी की छात्रा हूं। पढ़ाई के साथ साथ मैं लेखन कार्यों में भी रुचि रखती हूं जैसे कहानियां, गज़ल, कविताएं तथा स्क्रिप्ट राइटिंग । मैं विशेष तौर पर नारीवाद तथा लैंगिक समानता जैसे विषय पर लिखना तथा इनसे जुड़े मुद्दों पर काम करना भी पसंद करती हूँ ।

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