समाजख़बर कश्मीर : कैद के 365 दिन और घाटी के मौजूदा हालात

कश्मीर : कैद के 365 दिन और घाटी के मौजूदा हालात

कश्मीर की महिलाओं के साथ लॉकडाउन के दौरान होने वाली हिंसा से जुड़े आंकड़े या खबरें शायद ही हमारी नज़रों के सामने से गुज़री हो।

5 अगस्त 2019 की वह सुबह जब देश के केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह एक-एक कर जम्मू-कश्मीर को मिले विशेषाधिकार हटाते जा रहे थे, सांसदों की तालियों से पूरा संसद गूंज रहा था, तब दावा किया गया था कि केंद्र सरकार के इस फैसले से जम्मू-कश्मीर में विकास के नए रास्ते खुलेंगे। इसी दावे के साथ उस दिन केंद्र सरकार ने एक झटके में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटा दिया और पूरे राज्य को दो अलग-अलग केंद्र शासित प्रदेशों में बांट दिया गया। सरकार के इस फैसले के तुरंत बाद मेनस्ट्रीम मीडिया अपनी-अपनी टीम के साथ श्रीनगर से लाइव हो चुका था, एंकर अपने स्टुडियो में चीख-चीखकर कह रहे थे, ‘जम्मू-कश्मीर के पक्ष में एक ऐतिहासिक फैसला लिया गया है।’

केंद्र के इस फैसले को आज एक साल पूरा हो चुका है। केंद्र सरकार का यह दावा कि जम्मू-कश्मीर, खासकर कश्मीर में विकास होगा धरातल पर कहीं नज़र नहीं आता। इस फैसले के एक साल पूरे होने से पहले एहतियात के तौर पर घाटी में प्रशासन ने कर्फ्यू लागू कर दिया। एक साल में जम्मू-कश्मीर में हुए विकास का जश्न मनाने के लिए प्रशासन को कर्फ्यू का सहारा लेना पड़ रहा है। भारत के मुख्यधारा मीडिया के प्रौपगैंडा के बीच जम्मू-कश्मीर खासकर कश्मीर की हालत की चर्चा लगातार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होती रहती है। भारत के बाकी हिस्से में मजबूरन कोरोना वायरस के कारण लॉकडाउन लागू किया गया लेकिन कश्मीर की 80 लाख जनता पिछले एक साल से लॉकडाउन में जीने को मजबूर हैं, वह भी बिना 4जी इंटरनेट के। विकास के नाम पर कश्मीर की जनता को उनके घरों में ही कैद रहने को मजबूर होना पड़ा। यह अब भी एक अबूझ पहेली है कि किसी राज्य की जनता को कैद कर वहां का विकास आखिर कैसे संभव है।

24 मार्च को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूरे देश में लॉकडाउन का एलान किया था तब गली-मोहल्ले की दुकानों में अचानक कैसी आपा-धापी मच गई थी। सामर्थ्यवान लोग अधिक से अधिक ज़रूरत का सामान अपने घर में जमा कर लेना चाहते थे। लॉकडाउन के दौरान लंबे समय तक ज़रूरी सामानों की सप्लाई चेन भी बाधित रही। इस दौरान डिप्रेशन, आत्महत्या, घरेलू हिंसा के मामले और बेरोज़गारी के आंकड़े भी बढ़ते चले जा रहे हैं। लॉकडाउन ने मेहनतकश वर्ग से लेकर मध्यवर्गीय परिवारों तक, सबको आर्थिक और मानसिक रूप से प्रभावित किया। एक महामारी के कारण पांच महीनों तक लागू लॉकडाउन में जब देश की बड़ी आबादी इस तरह प्रभावित हुई तो सोचिए कश्मीर के लोग बीते एक साल से अपना गुज़ारा कैसे कर रहे होंगे। दावा किया गया था कि अनुच्छेद 370 हटने के बाद कश्मीर भारत से भावनात्मक रूप से जुड़ जाएगा लेकिन 5 अगस्त से कश्मीर को बोलने का मौका दिया ही नहीं गया। कश्मीर के लोग अनुच्छेद 370 को वह पुल मानते थे जिससे वे खुद को जुड़ा हुआ पाते थे, उनके लिए अनुच्छेद 370 उनकी पहचान थी।

विकास के नाम पर कश्मीर की जनता को उनके घरों में ही कैद रहने को मजबूर होना पड़ा। यह अब भी एक अबूझ पहेली है कि किसी राज्य की जनता को कैद कर वहां का विकास आखिर कैसे संभव है।

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कश्मीर में औरत होने के मायने

बात जब कश्मीर की होती है तो हमेशा एक तरह की खबरें हमारे सामने आती हैं, इतने आतंकी मार गिराए गए, कहीं बमबारी हो रही है तो कहीं मुठभेड़ जारी है। लॉकडाउन के दौरान कश्मीर की महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा से जुड़े आंकड़े या खबरें शायद ही हमारी नज़रों के सामने से गुज़री हो। जम्मू-कश्मीर स्टेट कमिशन फॉर वुमन के आंकडों के मुताबिक कश्मीर में 2016-2017 में लागू किए गए कर्फ्यू के दौरान घरेलू हिंसा और महिलाओं के खिलाफ होनेवाली हिंसा में दस गुना बढ़त हुई थी। हालांकि अनुच्छेद 370 के हटने के बाद अब यह कमीशन खत्म किया जा चुका है। कश्मीर में घरेलू हिंसा का सामना करने वाली महिलाओं के लिए बहुत कम ऐसे साधन हैं जहां वे मदद की गुहार लगा सकती हैं। पिछले साल से लागू सख्त सैन्य लॉकडाउन के कारण महिला हिंसा और घरेलू हिंसा जैसे मुद्दों पर काम करने वाले एनजीओ के लिए भी पीड़ित महिलाओं तक मदद पहुंचाना एक चुनौती बन चुकी है।

जम्मू-कश्मीर स्टेट कमिशन फॉर वुमन की पूर्व चेयरमैन वसुंधरा पाठक के मुताबिक कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान उनके पास ऐसी कई महिलाओं के फोन आए जो घरेलू हिंसा का सामना कर रही थी। यहां एक बात ध्यान दिलाना ज़रूरी है कि कश्मीर में लागू लॉकडाउन भारत के दूसरे हिस्सों के लॉकडाउन से बिल्कुल अलग है। कश्मीर को दुनिया के सबसे मिलिटराइज़्ड ज़ोन के रूप में जाना जाता है। भारत के बाकी हिस्सों में लॉकडाउन कोरोना वायरस के मद्देनज़र किया गया लेकिन कश्मीर पिछले एक साल से कर्फ्यू जैसे माहौल में जीने को मजबूर है।

कश्मीर की महिलाएं किन परेशानियों से गुज़र रही हैं, उनके पास देश के बाकी हिस्सों की महिलाओं की तरह मूलभूत अधिकार हैं या नहीं शायद ही हमने कभी इसका ज़िक्र होते सुना है। याद कीजिए उस उन्माद को जब केंद्र सरकार के फैसले के बाद राजनीतिक गलियारों से लेकर सोशल मीडिया तक इस बात को बार-बार दोहराया जा रहा था कि अब कश्मीर की लड़कियों से शादी का रास्ता आसान हो जाएगा। एक ऐसा माहौल तैयार किया गया मानो कश्मीर के संसाधन, वहां की ज़मीन और कश्मीरी औरतें देश के मर्दों की जागीर हैं। मानो पूरे कश्मीर को किसी युद्ध के तहत भारत में शामिल किया गया हो। जम्मू-कश्मीर के इतिहास को बदलने के वादों के बीच कश्मीर की औरतों को मर्दवादी राष्ट्रवाद इस फैसले के तहत मिला उपहार समझ बैठा। मर्दवाद और राष्ट्रवाद के इस कोलाहल में पिछले एक साल से कश्मीर की औरतों का पक्ष कभी सुना ही नहीं गया।

इस वक्त पूरी दुनिया कोरोना महामारी से जूझ रही है। शिक्षा से लेकर हर तरह का काम ऑनलाइन माध्यमों पर शिफ्ट हो चुका है। डॉक्टर इस महामारी से जूझने के लिए लगातार कश्मीर में ज़रूरी सेवाओं के लिए  इस मौजूदा हालात में जब इंटरनेट पहले से कहीं अधिक ज़रूरी हो गया है तब भी कश्मीर के लोगों का जीवन 2जी इंटरनेट के साथ कट रहा है। कश्मीर में इंटरनेट बहाल करने से जुड़ी याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाने की जगह केंद्र सरकार को गृह मंत्रालय के अंतर्गत एक समिति बनाकर इस मामले पर फैसला लेने का आदेश दिया है।

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इंटरनेट के बुनियादी अधिकार से कब तक वंचित रहेगा कश्मीर

21 जुलाई को केंद्र सरकार ने कोर्ट में हलफनामा दायर कर एक बार फिर सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए कश्मीर में 4जी इंटरनेट बहाल करने से इनकार कर दिया। इंटरनेट जैसी मूलभूत सुविधाओं की गैरमौजूदगी में घाटी में शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं, पर्यटन, अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई है। कोरोना महामारी ने इस स्थिति को और भी गंभीर बना दिया है। 2जी इंटरनेट सेवाओं के साथ छात्रों के सामने अपनी पढ़ाई जारी रख पाना चुनौतीपूर्ण हो गया है। वे महिला उद्यमी जो इंटरनेट के माध्यम से अपने व्यवसाय को आगे बढ़ा रही थी उनकी आत्मनिर्भरता पर ब्रेक लग गया है। कश्मीर में संचार साधनों पर लागू की गई पाबंदी किसी भी लोकतांत्रिक देश में अब तक की सबसे लंबी पाबंदी के रूप में हमारे सामने आई।

बात अगर हम कश्मीर की अर्थव्यवस्था की करें तो केंद्र सरकार के इस फैसले ने कश्मीर की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है। कश्मीर चेंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (KCCI) के मुताबिक इस एक साल के दौरान कश्मीर को 40 हज़ार करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान झेलना पड़ा है। इतना ही नहीं, पिछले साल से लागू लॉकडाउन के पहले चार महीने में ही पांच लाख से अधिक लोग बेरोज़गार हो चुके थे। आर्थिक रूप से भी महिलाएं पुरुषों के मुकाबले कहीं अधिक प्रभावित हुई हैं। वे महिलाएं जो धीरे-धीरे अपने रोज़गार को नया रूप दे रही थी 5 अगस्त के बाद उनकी कामयाबी के रास्ते लगभग बंद से हो गए। सुरक्षा कारणों से कर्फ्यू के माहौल में परिवार वाले महिलाओं को बाहर निकलने पर पहले से कहीं अधिक सख्त पाबंदियां लगा दी जाती हैं।

2018 में अपनी कश्मीर यात्रा के दौरान मुझे यह एहसास हुआ था कि एक कंफ्लिक्ट ज़ोन में महिलाओं के बुनियादी मुद्दे, उनके अधिकारों की बातें बिल्कुल हाशिये पर चले जाते हैं। शोपियां के कापरान में मेरी मुलाकात कश्मीर की सबसे छोटी उम्र की पेलेट गन सर्वाइवर हिबा निसार की मां मर्शला जान से हुई थी। मर्शला जान के लिए बतौर महिला सबसे बड़ी फिक्र उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे बुनियादी अधिकारों की नहीं थी। उन्हें फिक्र थी कि किसी तरह पेलेट गन से घायल अपनी बेकसूर बच्ची की आंखों की रोशनी फिर से वापस आ सके। उनके जीवन की पूरी प्राथमिकता अपनी बच्ची के आंखों के ऑपरेशन पर टिकी थी।  मेरी मुलाकात हुई थी ब्रिजबिहारा में एक इशरत से जिसे इंतज़ार था उस दिन का जब घाटी में किसी सामान्य छात्र की तरह वह अपने कॉलेज जा सके। उसे इंतज़ार था उस दिन का जब किसी इनकाउंटर, आतंकी हमले या कर्फ्यू का कारण उसकी पढ़ाई न रुके। घाटी में और न जाने कितनी ऐसी औरतें मिली जो हर रोज़ यह दुआ मांगती थी कि उनका परिवार रात के खाने पर साथ हो, सुरक्षित हो। तो कितनी ही महिलाएं एसोसिएशन ऑफ पैरंट्स ऑफ डिसअपियर्ड पर्सन (APDP) के साथ अपने कभी न लौटकर आने वाले पति, भाई, पिता के लिए प्रदर्शनों में शामिल होती हैं। उनके प्रदर्शन के मुद्दे देश के बाकी हिस्सों से अलग होते हैं। कंफ्लिक्ट ज़ोन में एक औरत होने के मायने बेहद अलग और जटिल होते हैं।

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तस्वीर साभार: trtworld

About the author(s)

Ritika is the Managing Editor at Feminism in India (Hindi). Ritika is an award-winning multimedia journalist with over five years of experience. She is a passionate advocate for social justice and gender rights, and has been awarded the prestigious UN Laadli Media Awards twice and Breakthrough Reframe Media Awards for her gender-sensitive writing and reporting. She is also a fellow of Rise Up (Youth Championship Initiative).

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