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(एडिटर्स नोट: यह लेख मूल रूप से DW हिंदी हिंदी पर प्रकाशित किया गया था। मूल लेख को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

फेमिनिस्ट शब्द का इस्तेमाल तो आपने बहुत बार किया होगा लेकिन क्या आप उन महिलाओं के बारे में जानते हैं जिन्होंने इस शब्द को इसके असली मायने दिए हैं। एक नजर नारीवादी आंदोलनों की मुखर आवाजों पर।

ओलांपे द गोज (1748-1793)

फ्रांस में महिला अधिकारों के लिए आवाज उठाने वाली ओलांपे द गोज ने वर्ष 1791 में लिखा कि महिलाएं स्वतंत्र पैदा हुई हैं और उन्हें भी पुरुषों के साथ बराबरी के अधिकार मिलने चाहिए।

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सोजर्न ट्रूथ (1797-1883)

सोजर्न ने अमेरिका में दासप्रथा से पीड़ित लोगों के अधिकारों के लिए काम किया। सोजर्न ने महिला अधिकारों के लिए और महिला पीड़ितों की स्थिति में बेहतरी लाने के लिए अपनी आवाज बुलंद की।

लुईजे ऑटो-पेटर्स (1819-1895)

जर्मनी में महिला अधिकारों की संस्थापक मानी जाने वाली लुईजे का कहना था कि राज्य की गतिविधियों में महिलाओं का शामिल होना महज अधिकार नहीं बल्कि उनका कर्तव्य है।

हेडविष डोम (1831-1919)

जर्मनी में नारीवादी आंदोलन की कट्टर समर्थक रही हेडविष का मानना था कि मानव अधिकार सभी के लिए समान हैं और इनमें लिंग के आधार पर अंतर नहीं किया जा सकता।

एमिली डेविसन (1872-1913)

ब्रिटेन में महिला मताधिकारों के लिए आवाज बुलंद करने वाली एमिली को आठ बार गिरफ्तार किया गया था।एमिली 1903 में गठित वूमन सोशल ऐंड पॉलिटिक्ल यूनियन की सदस्य थीं।

सिमोन द बोभुआर (1908-1968)

नारीवादी आंदोलन की उल्लेखनीय रचना मानी जाने वाली `द सेकंड सेक्स´ की लेखिका सिमोन भी महिलाओं के अधिकारों का पुरजोर समर्थन करती रहीं।

बेट्टी फ्रीडन (1921-2006)

अमेरिका के नारीवादी आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाने वाली बेट्टी ने अपनी रचनाओं में माताओं और गृहणियों के रूप में महिलाओं की सीमित होती भूमिका की आलोचना की है।

जूडिथ बटलर (*1956)

अमेरिका की नारीवादी दार्शनिक कही जाने वाली जूडिथ बटलर को 1990 में आई उनकी किताब `जेंडर ट्रबल´ के लिए याद किया जाता है।

मोजन हसन (*1979)

मोजन हसन और उनका संगठन नजरा 2007 के बाद से ही मिस्र में महिला अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं।हसन को 2016 में राइट लाइवलीहुड अवॉर्ड से नवाजा गया, जिसे अल्टरनेटिव नोबेल प्राइज भी कहा जाता है।

लॉरी पैनी (*1986)

ब्रिटेन की लॉरी पैनी को अहम सामयिक नारिवादियों में से एक माना जाता है।उनकी रचनाएं “मीट मार्केट” और “अनस्पीकबल थिंग्स” सेक्स के नाम पर महिलाओं के दमन की आलोचना करता है।

मार्गरेट स्टोकोव्स्की (*1986)

जर्मनी की लॉरी पैनी के नाम से मशहूर मार्गरेट ने अपनी पहली किताब `उनटेनरुम फ्राय´ में लिंग के आधार पर समाज द्वारा दी जाने भूमिका पर सवाल उठाए हैं।साथ ही इस बात पर जोर दिया है कि छोटी आजादी भी बड़ी स्वतंत्रता से जुड़ी होती है।


(सभी तस्वीरें DW हिंदी के साभार से)

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