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व्यक्तिगत जीवन में घटी छोटी-छोटी तीन घटनाओं का मैं यहां ज़िक्र करूंगी। पहली घटना– मैं बिहार के किसी शहर के लोकेशन से डेटिंग ऐप टिंडर चला रही थी। किसी पुरूष के साथ मैच हुआ। उसकी तरफ से पहला टेक्स्ट था, “फेमिनिस्ट क्यों लिखा है बायो में?” बायो मतलब टिंडर पर अपने बारे में बताते हुए कुछ लाइनें लिखी जाती हैं। दूसरी घटना- किसी क़रीबी मित्र से बहस हो रही थी। व्यक्तिगत बहस में मेरे किसी नारीवादी कथन को कोट करने पर जवाब आया, “फेमिनिज़म का झंडा घर पर ही उठाई हो”। तीसरी घटना– किसी महिला साथी ने कहा था, “मैं फेमिनिस्ट नहीं हूं, न ही मेरी बहुत सारी महिला मित्र हैं। मेरे दोस्त ज्यादातर पुरूष हैं।”

फेमिनिस्ट या फेमिनिज़म शब्द को बिना समझे अलग-अलग जगह, अलग-अलग समय काल में अलग-अलग धारणाओं से जोड़ा गया है। सोशल मीडिया पर अपनी अभिव्यक्ति की आज़ादी को इस्तेमाल करने वाली महिलाओं को ‘एक्स्ट्रा’ कहा जाता है। सोशल मीडिया पर देखने वाली जनता उन्हें देखकर व्यूज़ भी बढ़ा रही होती है लेकिन उस महिला के बहाने नारीवाद की छवि को ‘बोल्ड’ कहकर मन ही मन कुढ़ भी रही होती है। तथाकथित पढ़े-लिखे पुरुषों की तरफ़ से आने वाले तर्कों में से एक यह होता है, “अपनी नग्न तस्वीरें डालने से नारीवाद में क्या बेहतर हो जाएगा या ग्रामीण स्तर पर संघर्ष करती महिलाओं के जीवन में क्या बदल जाएगा।” सोशल मीडिया व्यक्तिगत अभिव्यक्ति का माध्यम होता है। कमला भसीन ने एक बार कहा था “सबसे लिए नारीवाद के मायने अलग-अलग हो सकते हैं।”

कई अभिनेत्रियों या मॉडल्स को सोशल मीडिया पर लोग इसलिए ट्रोल करते हैं क्योंकि उनके हिसाब से किसी महिला के कपड़े, मेकअप, शरीर सभ्य नहीं दिख रहा। इसलिए किसी आम महिला के लिए अपनी कोई भी तस्वीर सोशल मीडिया पर डालना तस्वीर भर को देखकर किसी भी अंजान द्वारा उसका चरित्र आंकलन, बुद्धि आंकलन, नारीवाद आंकलन और तमाम सारे आंकलन करने की छूट जैसा देख लिया जाता है। यह बात तब लागू नहीं होती जब ऐसा करने वाला कोई पुरूष हो। उसे देखने का नज़रिया अलग होता है। तब सोशल मीडिया की जनता उसके जिम जाने से बनी मांसपेशियों या महंगी गाड़ी लेने के पीछे लगी मेहनत या दुनिया घूमने के लिए पाई निडरता या तस्वीर में साथ खड़ी महिलाओं को देखकर उसके ‘सेफ़ गाय’ यानि ठीकठाक पुरूष होने का अनुमान लगाती है। दो लोगों के ऊपर एक ही परिस्थिति में आप अगर दो अलग राय सिर्फ उनके जेंडर की वजह से रखते हैं तो आप में लैंगिक भेदभाव का रवैया मौजूद है।

पितृसत्तात्मक समाज में डेटिंग ऐप या सोशल मीडिया पर केवल अपनी जवाबदेही पर जीवन का हिस्सा अभिव्यक्त करती महिलाएं, अपने टैग गंभीरता वश या हल्के-फुल्के अंदाज़ में खुद निर्धारित करती महिलाएं पितृसत्ता को आतंकित करती हैं।

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लेख की शुरुआत में उद्धरित पहली व्यक्तिगत घटना का ज़िक्र इसी व्यवहार का परिणाम है। टिंडर जैसे डेटिंग ऐप पर कोई भी व्यक्ति अपना बायो अपनी मर्ज़ी के हिसाब से लिखने का अधिकार रखता है । दार्शनिक वाक्य, मीम, सीधे-सरल शब्द, किसी भी तरह की शाब्दिक व्याख्या की जा सकती है। मैच करने वाले पुरुष द्वारा ‘फेमिनिस्ट’ शब्द पर सवाल करना इसलिए दिक़्क़त की बात है क्योंकि महिला द्वारा इस शब्द को डेटिंग ऐप पर खुलेआम लिखना उन्हें रास नहीं आता। वे इस शब्द को किसी महिला की पहचान से जोड़कर देखना किसी अतिवाद की तरह देखते हैं।

जमीला जमील, एक अभिनेत्री और एक्टिविस्ट हैं। उनकी सेई अकिवोवो जो कि अंग्रेजी-नाइजीरियन मूल की महिला अधिकार कार्यकर्ता हैं उनके साथ एक बातचीत है। यह बातचीत इस बारे में है कि क्यों सेल्फ़ केयर जैसे स्पा आदि के प्रचार में ब्लैक महिलाओं को नहीं दिखाया जाता। सेई के अनुसार ब्लैक महिलाओं का आरामदायक मुद्रा में लेटकर केवल अपने बारे में सोच पाने की फुर्सत और स्थिति अपने आप में क्रांति है। संस्कृति और इतिहास के किसी भी पैमाने से शोषितों द्वारा अपने जीवन के मूलभूत आराम को अनुभव करते हुए, बेचारा न दिखने पर शोषक समाज आतंकित हो जाता है। पितृसत्तात्मक समाज में डेटिंग ऐप या सोशल मीडिया पर केवल अपनी जवाबदेही पर जीवन का हिस्सा अभिव्यक्त करती महिलाएं, अपने टैग गंभीरता वश या हल्के-फुल्के अंदाज़ में खुद निर्धारित करती महिलाएं पितृसत्ता को आतंकित करती हैं।

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दूसरी घटना निज़ी जीवन में महिला साथी द्वारा नारीवादी के साथ जुड़ाव के भय का परिणाम है। आम बातचीत में दर्शन, राजनीति, फ़िल्म इत्यादि के बातचीत की जगह हो सकती है तो नारीवाद की क्यों नहीं। सामाजिक शक्ति के ढांचे में जातिगत पहचान की वज़ह से भेदभाव झेलने वाले किसी इंसान के लिए उसकी जाति उसके अनुभवों को गढ़ने में अहम रही होती है। यही बात जेंडर की अस्मिता के साथ भी लागू होती है। घरेलू कामों के बंटवारे, शिक्षा हासिल करने में लगी जद्दोजहद, सोशल मीडिया से लेकर ऑफ़लाइन सार्वजनिक जीवन में, कार्यस्थल से लेकर निज़ी जीवन में महिला या क्वीयर होने की वज़ह से भेदभाव महसूस करने वाले इंसान के लिए यह सब उनके अनुभव का बड़ा हिस्सा हो जाता है। शक्ति श्रेणी में ऊपरी पायदान पर बैठे इंसान द्वारा उनके अनुभवों को नकारना या उन्हें एक वाद के प्रति अतिवादी बताना उनके भय से पैदा होता है। यह भय है निचले पायदान पर रखे गए लोगों का अपने अधिकारों और शोषण को लेकर सहज होने का। ऐसे में ये लोग उनके ज़मीनी संघर्ष को बिना जाने उसे एक अतिवादी वाद का घातक परिणाम कहकर शून्य साबित करना चाहते हैं। बल्कि असल में इन अनुभवों को सुना जाना चाहिए। ताकि ऊपरी पायदान पर खड़े जिन लोगों ने इसे अपने व्यक्तिगत जीवन में नहीं महसूसा है उन्हें अपने व्यवहार को ठीक करने, आत्म-चिंतन करने और अपनी शक्ति का सामाजिक दुरुपयोग समझने का मौका मिले।

तीसरी घटना महिलाओं द्वारा फेमिनिस्ट महिलाओं को सींग लिए घूमने जैसी कल्पनाओं से प्रेरित है। असल में हर वह महिला नारीवादी है जो किसी भी जगह अपने या अन्य महिला या जेंडर के साथ पितृसत्ता द्वारा किए जा रहे भेदभाव के खिलाफ बोलती है या उस असमानता को नजरअंदाज नहीं कर पाती। महिला के नारीवादी होने के लिए उसके सभी मित्रों का महिला होना कोई लिखित नियम नहीं है। हालांकि कई बार नारीवादियों ने ‘सिस्टरहुड’ को तवज्जो दी है कारण, वे अपने निज़ी जीवन में अनुभव किए गए भेदभाव द्वारा अन्य महिला की परिस्थितियों को समझने में ज़्यादा सहज महसूस करती हैं। इसके अलावा दुनिया को ज्यादातर समय पुरुषों के चश्मे यानी मेल गेज़ से देखने की जो सामाजिक परवरिश मिली होती है उसे तोड़ने में उन्हें मदद मिलती है। चूंकि अलग अलग धार्मिक, आर्थिक, सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से आने वाली महिलाओं के अनुभव अलग अलग हो सकते हैं, ‘सिस्टरहुड’ उनके लिए नारीवाद में महिलाओं के अन्य सामाजिक पहचान के साथ आंतरिक द्वंद और एकसमानता दोनों को ही समझने में मददग़ार साबित होता है।

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नारीवाद जब जेंडर के पैमाने पर होने वाले अंतर की बात करता है तो उसमें समावेशिता एक अहम पहलू बन जाता है। नारीवाद में न मानने वाली महिलाओं को नारिवादियाँ नारीवाद की शत्रु नहीं मानती। एक घटना याद आती है जब मैं और मेरी एक दोस्त किसी वादविवाद आयोजन में गए थे। ऐसी किसी महिला को देखकर हम उसे ‘पितृसत्ता को मान रही बहन’ बुलाने लगे थे। महिलाओं द्वारा अपनेआप और अपने आसपास की औरतों को पितृसत्ता के स्थापित आयामों से परिभाषित करते देखना मेल गेज है जो आंतरिक स्त्रिद्वेष को जन्म देती है। लेकिन आंतरिक स्त्रिद्वेष जिस महिला के स्वभाव का हिस्सा है उसके लिए भी उतना ही हानिकारक है जितना उसके आसपास के लोगों के लिए। यही कारण है कि नारिवादियाँ आंतरिक स्त्रिद्वेष को गंभीरता से लेती हैं। जमीला जमील, इंस्टाग्राम पर खुद को ‘फेमिनिस्ट इन प्रोग्रेस’ लिखती हैं, हाल ही में एक इंटरव्यू में उन्होंने जीवन के शुरुआती दिनों में खुद को आंतरिक स्त्रीद्वेष का शिकार बताया था। हममें से कई महिलाएं रोज़ खुद को इस व्यवहार पर टोकती हैं और बेहतर होती हैं। कई बार अपने आप को बिना नारीवाद से जोड़े भी महिलाएं ऐसा करती हैं। नारिवादियाँ इसी व्यवहार को नारीवाद कहेंगी। अहम सवाल यह आता है कि फिर क्यों खुद को नारीवाद के साथ जोड़ना या सभी का नारीवादी होना जरूरी है? अन्य कई वादों की तरह नारीवाद ने भी कई आंतरिक परिवर्तन देखे हैं।

भारत में इस वक्त दलित नारीवाद पर बहुत चर्चा होती हैं। दलित नारिवादियों द्वारा नारीवाद में बाज़ारवाद या सवर्ण नारीवाद के ढांचे पर सवाल किए जाते हैं। जब खुद को नारीवादी बताते हुए कोई नारीवाद के अंदर परिवर्तन लाने की चाह रखता है तो वह इतिहास और समकालीन सभी महिलाओं व अन्य जेंडर आइडेंटिटी के संघर्षों के प्रति विश्वास जताता है जो जेंडर आधारित भेदभाव तोड़ने में लगे हैं। चाहे वह खेल दुनिया में महिलाओं के लिए मौकों और संसाधनों की कमी की बात हो या भारतीय सिनेमा में शादीशुदा होने पर अभिनेत्रियों के करियर ख़त्म हो जाने का तथाकथित नियम, ग्रामीण महिलाओं खुले में शौच करने जाने की परेशानी से संबंधित हो या शादीशुदा शहरी कामकाजी महिला द्वारा किचन और ऑफिस दोनों का काम करने के मजबूरी की बात। नारीवाद में सभी की जगह है। नारीवाद के अंदर आर्थिक, भौगोलिक, जातीय शक्ति श्रेणी के हिसाब से ऊपरी पायदान पर खड़ी महिलाओं द्वारा नारीवाद के विमर्शों आंदोलनों को पूरी तरह संचालित करने की व्यवस्था नहीं हो सकती। इसलिए समावेशी नारीवाद को मानने वाली महिलाओं को सींग लिए घूमने की जगह बराबरी की पक्षधरों की तरह देखने की जरूरत है। वे पुरुषों से बैर नहीं रखती बल्कि उस पितृसत्ता से रखती हैं जो उनके स्त्री होने की वजह से उन्हें कमतर मानता है या किसी अन्य जेंडर को लेकर ऐसी सोच रखता है।

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तस्वीर साभार : French Culture

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