इंटरसेक्शनलजेंडर महिला विरोधी बयान देनेवालों पर समाज की कोई प्रतिक्रिया क्यों नहीं होती ?

महिला विरोधी बयान देनेवालों पर समाज की कोई प्रतिक्रिया क्यों नहीं होती ?

देश में आए दिन कोई ना कोई राजनेता या जाना-माना फ़िल्मी सितारा या सेलिब्रेटी महिला-विरोधी बयान देता ही रहता है। इन बयानों को एक झटके में उनकी एक भूल मानकर भुला भी दिया जाता है पर क्यों? क्या यह तब होता है जब कोई किसी धर्म या उससे जुड़े विषय में ऐसी कोई आपत्तिजनक टिप्पणी करता है? जी नहीं! तब उसके उस बयान को देश की जनता आसानी से नहीं भुलाती और उसे समाज से बहिष्कृत करके उसके लिए सज़ा की मांग भी करती है। ख़ासकर अगर कोई महिला धर्म या राजनीति के बारे में अपनी राय खुलकर जाहिर करती है तो जितनी ‘आपत्तिजनक’ बातें उसने कही भी नहीं होती उससे कहीं ज़्यादा उसे सुनने को मिल जाती हैं। कई बार तो कानून और नैतिकता के विरुद्ध जाकर उसे बलात्कार की जाने की धमकियां भी मिलने लगती हैं। अगर उसके स्थान पर कोई पुरुष हो तो भी ऐसी धमकियां उसके घर की किसी महिला सदस्य को मिलनी शुरू हो जाती हैं। अब सवाल यह उठता है कि जब कभी कोई अभिनेता, राजनेता या कोई अन्य व्यक्ति महिला-विरोधी या लैंगिक असमानता को प्रेरित करने वाला बयान देता है तो उनके उस विवादित बयान पर उनके खिलाफ इतनी प्रतिक्रिया क्यों नहीं दिखाई जाती?

आए दिन हम सुनते रहते हैं कि कभी किसी नेता या उच्च पद पर विराजमान व्यक्ति ने महिला विरोधी बयान दिया। कुछ दिन तो इन पर चर्चा होती है पर दो दिन बाद ही उन्हें भुला दिया जाता है। आइए नज़र डालते हैं ऐसे ही कुछ प्रसिद्धि प्राप्त पुरूषों द्वारा दिए गए महिला विरोधी बयानों पर।

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बीते कुछ समय में हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने महिलाओं को लेकर कई विवादित बयान दिए हैं। साल 2018 में उन्होंने हरियाणा के पंचकुला में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान जब उनसे प्रदेश में बढ़ते बलात्कार के मामलों पर सवाल किया गया तो उस पर इनका जवाब था, “सबसे बड़ी चिंता यह है कि ऐसी घटनाएं 80-90% जानकारों के बीच में होती हैं। काफ़ी समय के लिए इक्क्ठे घूमते हैं, एक-दिन किसी बात पर अनबन हो जाती है तो उस दिन लड़कियां एफआईआर करा देती हैं कि इसने मेरा बलात्कार किया।” साल 2014 में उन्होंने बलात्कार के लिए लड़कियों को ही दोषी ठहराते हुए कहा था, “अगर लड़की सभ्य कपड़े पहने, तो एक लड़का उसे गलत नज़र से नहीं देखेगा। यदि आप स्वतंत्रता चाहते हैं, तो बिना कपड़ो के क्यों नहीं घूमते? स्वतंत्रता एक हद तक सीमित होती है। छोटे कपड़े पश्चिमी देशों का प्रभाव हैं। हमारे देश की परंपरा लड़कियों को सभ्य कपड़े पहनने को कहती है।”

आए दिन हम सुनते रहते हैं कि कभी किसी नेता या उच्च पद पर विराजमान व्यक्ति ने महिला विरोधी बयान दिए। कुछ दिन तो इन पर चर्चा होती है पर दो दिन बाद ही उन्हें भुला दिया जाता है।

तो हरियाणा के ही भूतपूर्व मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला ने भी अपने एक बयान में बलात्कार जैसी घटनाओं को रोकने के लिए बाल विवाह का सुझाव दिया था। वहीं पिछले साल एक समारोह में जिसमें दिल्ली में साल 2012 में हुए गैंगरेप की पीड़िता की मां आशा देवी को भी बुलाया गया था। वहां विशेष अतिथि के तौर पर आए कर्नाटक के पूर्व डीजीपी एचटी सांगलियाना ने निर्भया और उनकी मां को लेकर आपत्तिजनक बातें कहीं। उन्होंने कहा था, “मैं निर्भया की मां को देखता हूं, इतनी अच्छी काया है इनकी। मैं सिर्फ कल्पना कर सकता हूं कि निर्भया कितनी सुंदर रही होगी।” तो कुछ ही दिन पहले शक्तिमान धारावाहिक के मशहूर कलाकार मुकेश खन्ना ने मीटू आंदोलन पर टिप्पणी करते हुए कहा था, “ये सब तब शुरू हुआ जब महिलाओं ने भी बाहर जाकर काम करना शुरू कर दिया, तभी से ये सब मीटू आंदोलन भी शुरू हुए, जब वह घर पर रहती थी तो इतने बलात्कार और उत्पीड़न के मामले नहीं आते थे।”

ऐसे बहुत से विवादित बयान दिए जा चुके हैं जो बेहद निंदनीय है और उनपर पर प्रतिक्रिया दिखाना बहुत आवश्यक है। हम अक्सर देखते हैं चुनाव के वक़्त पुरुष उम्मीदवार अपनी विरोधी महिला उम्मीदवार के विषय में आपत्तिजनक बातें करते हैं और उनपर कोई एक्शन नहीं लिया जाता जिससे कि उन्हें आगे भी ऐसा करने के लिए बढ़ावा मिलता है। ऐसे महिला विरोधी बयान लैंगिक संवेदनशीलता के खिलाफ ऊंगली उठाते हैं और महिलाओं को उनके लिंग के आधार पर अपमानित करते हैं जो कि एक लैंगिक रूप से संवेदनशील समाज बनाने की राह में बाधा है।

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तस्वीर : आश्वरी कुलकर्णी फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए

About the author(s)

मैं ख़ुशी वर्मा इलाहाबाद स्टेट यूनिवर्सिटी की छात्रा हूं। पढ़ाई के साथ साथ मैं लेखन कार्यों में भी रुचि रखती हूं जैसे कहानियां, गज़ल, कविताएं तथा स्क्रिप्ट राइटिंग । मैं विशेष तौर पर नारीवाद तथा लैंगिक समानता जैसे विषय पर लिखना तथा इनसे जुड़े मुद्दों पर काम करना भी पसंद करती हूँ ।

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