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आज लैंगिक समानता सिर्फ महिलाओं की ज़रूरत नहीं, पूरे विश्व की आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक विकास के लिए अनिवार्य है। एक उचित समावेशी सामाजिक परिवेश, अर्थव्यवस्था और राजनीतिक साझेदारी का निर्माण का लक्ष्य होना जरूरी है। इस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए सभी लिंग, विशेषकर महिलाओं का आर्थिक भागीदारी होना महत्वपूर्ण है। विश्व में आज कई देशों में जेंडर बजट पारित किया जाता है। विकासशील देश महिलाओं की सहभागिता और विकास को प्रोत्साहित करने के लिए इसके महत्व और उपयोगिता को समझ रहे हैं। फरवरी 2021 में आई एनजीओ आक्सफैम इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ हिंसा से जुड़ी योजनाओं के लिए न्यूनतम वार्षिक बजट की आवश्यकता 10,000 से 11,000 करोड़ रुपये होती है। यह केंद्रीय बजट का 0.36 प्रतिशत और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का केवल 0.05 प्रतिशत है। मौजूदा बजटीय आवंटन इस न्यूनतम मानक की आवश्यकता को बनाए रखने के लिए एक चौथाई भी नहीं है। इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि परिवहन को छोड़कर चार प्रमुख मंत्रालयों के वित्तीय आवंटन की समीक्षा से पता चलता है कि महिला-केंद्रित सेवाओं के लिए बजट में 85 प्रतिशत तक की कमी होती है।

साल 2013 में शुरू किए गए निर्भया फंड की बात करें, तो इसकी स्थापना के आठ सालों बाद भी यह कोष वित्तपोषित पाया गया। साथ ही इस फंड की राशि पूरे तरीके से काम में नहीं लाया गया। साल 2019-20 में, वित्त मंत्रालय ने निर्भया फंड के तहत 4357.62 करोड़ की राशि प्रदान की। सरकार द्वारा महिला हेल्पलाइन-181, वन स्टॉप सेंटर, स्वाधार ग्रेह (शेल्टर होम्स) और फास्ट ट्रैक स्पेशल अदालतों जैसी योजनाओं को लागू तो किया जा रहा है। लेकिन इन सभी योजनाओं को संयुक्त रूप से 2020-21 के बजट से केवल 2009 करोड़ आवंटित किए गए जो कि पिछले तीन सालों में सबसे अधिक थे।

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पिछले कई वर्षों में निर्भया फंड ने VAWG के अंतर्गत योजनाओं के वित्तीय वृद्धि में प्रमुख योगदान दिया है। केन्द्रीय बजट के सभी महिला केंद्रित आवंटनों में निर्भया फंड की साल 2018-19 में 62, 2019-20 में 75 और साल 2020 में 92 प्रतिशत हिस्सेदारी रही। हालांकि इसकी लगभग 73 प्रतिशत राशि केवल गृह मंत्रालय (पुलिस) को जाना भी एक प्रमुख बाधा रहा है। गौरतलब हो कि, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण– 4 के अनुसार 30 प्रतिशत से भी अधिक महिलाएं और लड़कियां किसी न किसी प्रकार के शारीरिक या यौन हिंसा का सामना करती हैं। भारत में 33 प्रतिशत विवाहित महिलाएं कभी न कभी घरेलू हिंसा की शिकार हुई हैं। नेशनल क्राइम रेकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) की साल 2018 की रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर 15 मिनट में एक लड़की या महिला का बलात्कार होता है।

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हालांकि जेंडर बजट के तहत लक्षित योजनाओं ने लैंगिक असमानताओं को कम करने में मदद की है लेकिन इन असमानताओं को दूर करने के लिए एक लंबा रास्ता तय करना बाकी है।

ग्लोबल जेन्डर गैप इंडेक्स के अनुसार, भारत 112वें पायदान पर है। देश में महिलाओं की आर्थिक भागीदारी और अवसरों की बात करें, तो यह दुनिया के सबसे पिछड़े देशों में से एक है। देश में 82 प्रतिशत पुरुषों की तुलना में सिर्फ 66 प्रतिशत महिलाएं साक्षर हैं। लैंगिक समानता की दिशा में अग्रसर होते विश्व के शीर्ष दस देशों जैसे आइसलैंड, नॉर्वे, फ़िनलंड, स्वीडन आदि पर गौर करें, तो इन सभी देशों ने महिलाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य, आर्थिक और राजनीतिक भागीदारी को सुधारने और सुनिश्चित करने का काम किया है।

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VAWG योजनाओं के लिए मौजूदा केंद्र और राज्य के 60 और 40 प्रतिशत वित्तीय साझेदारी के तहत, यह राशि 6435.78 करोड़ है, जो साल 2020-21 के केन्द्रीय बजट का मात्र 0.21 प्रतिशत है। संभवतः, व्यावहारिक तौर पर केंद्र द्वारा इस व्यापक राशि का आवंटन संभव नहीं। इसलिए इन योजनाओं को सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है कि उत्तर पूर्वी राज्यों जैसा 90 प्रतिशत हिस्सेदारी राज्य की हो। हालांकि वन-स्टॉप केंद्र अस्पतालों से जुड़े होने चाहिए, लेकिन विभिन्न रिपोर्टों और अध्ययनों में इसमें भी कमी पाई गई। हैरानी की बात है कि इन योजनाओं के अंतर्गत स्वास्थ्य सेवाओं के लिए भी कोई विशिष्ट आवंटन नहीं है। VAWG योजनाओं के अधीन कानून और न्याय मंत्रालय का 4.55 प्रतिशत, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की 1.93 प्रतिशत और गृह मंत्रालय की महज 0.76 प्रतिशत हिस्सेदारी रही। जहां विश्व के सभी देशों ने स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में लैंगिक समानता में बढ़ोतरी की है। वहीं विकासशील अर्थव्यवस्था वाले देशों में भारत आज भी इस मामले में पिछड़ा हुआ है।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने फरवरी 2020 में तीन प्रमुख विषय ‘एस्पिरेशनल इंडिया’, ‘इकनॉमिक डेवलपमेंट’ और ‘केयरिंग सोसायटी’ पर केंद्रित बजट घोषित किया था। वर्तमान में, महिला और बाल विकास मंत्रालय महिलाओं को लाभान्वित करने के उद्देश्य से 13 योजनाएं चलाती है। इनमें बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ, महिलाओं की हेल्पलाइन- 181, स्वाधार ग्रेह (शेल्टर होम्स) योजना, महिलाओं की सुरक्षा के लिए समर्पित निर्भया फंड आदि शामिल हैं। लेकिन केन्द्रीय बजट महिलाओं की स्वच्छता उत्पादों की जरूरतें, महिलाओं की अनौपचारिक श्रम-बल को औपचारिक श्रम-बल में परिवर्तित करने, महिलाओं की तकनीकी कौशल के विकास या महिलाओं के वयस्क शिक्षा के जैसी जरूरतों को अनदेखा करती है। साथ ही, बैंक, मीडिया, आईटी कंपनियों आदि में महिलाओं के रोजगार और विकास की बात नहीं करती। न ही पुलिस, स्वास्थ्य विभाग (के उच्च पद), न्याय तंत्र जैसे विभागों में महिलाओं की सहभागिता पर ज़ोर दिया जाता है। बिजनस स्टैन्डर्ड में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 13 वर्षों में, कुल बजट के अनुपात में, जेन्डर बजट की राशि 4.3 और 5.9 प्रतिशत के बीच रही। पिछले छह में से पाँच वर्षों में यह राशि कुल बजट के 5 प्रतिशत से भी कम थी।

हालांकि जेंडर बजट के तहत लक्षित योजनाओं ने लैंगिक असमानताओं को कम करने में मदद की है लेकिन इन असमानताओं को दूर करने के लिए एक लंबा रास्ता तय करना बाकी है। समाज के विकास में महिलाओं का भी उतना ही महत्व है जितना कि पुरुषों का। इसलिए यह महत्वपूर्ण है कि किसी भी देश की सरकार उनके विकास के लिए किस तरह की नीतियां चुनती है या अधिनियम बनाती है। यह ध्यान देने वाली बात है कि देश में महिलाओं की समस्याओं के पीछे आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक या भौगोलिक कारण छिपे है। इसलिए जेंडर बजट के तहत नीतियों और योजनाओं को भी समावेशी होना होगा।

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तस्वीर साभार : gurukunj

कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से हिंदी में बी ए और पंजाब टेक्निकल यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद बतौर पत्रकार और शिक्षिका मैंने लम्बे समय तक काम किया है। बिहार और बंगाल के विभिन्न क्षेत्र में पले-बढ़े होने के कारण सामाजिक रूढ़िवाद, धार्मिक कट्टरपन्त, अंधविश्वास, लैंगिक और शैक्षिक असमानता जैसे कई मुद्दों को बारीकी से जान पायी हूँ। समावेशी नारीवादी विचारधारा की समर्थक, लैंगिक एवं शैक्षिक समानता ऐसे मुद्दें हैं जिनके लिए मैं निरंतर प्रयासरत हूँ।

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