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अभिषेक वर्मा

देश मे पंचायती चुनावों का महौल बना हुआ है। इसी साल उत्तर प्रदेश और बिहार में पंचायत के चुनाव सम्पन्न होने हैं। उसके बाद चुनकर आएंगे वे प्रतिनिधि जो अगले पांच सालों के लिए अपने क्षेत्र का विकास सुनिश्चित करने की कोशिश करेंगे। इनके पहले वाले भी कोशिश कर रहे थे और ये भी कोशिश करेंगे। पचांयती चुनावों की आवश्यकता और उद्देश्य एक अलग मुद्दा रहा है। आगामी पंचायती चुनाव को अलग नजरिए से देखने के लिए आइए जानें की इनका महत्व अन्य चुनावों से अलग कैसे है।भारत में शासन की शक्तियों के संदर्भ में होने वाली बहसों में से एक प्रमुख बहस शासन शक्तियों के विकेन्द्रीकरण की भी रही है। इसको बार-बार लोकतंत्र से जोड़कर भी देखा जाता रहा है। लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण का अभिप्राय है कि शासन की शक्तियों को एक स्थान पर केन्द्रित रखने के बजाए इसका स्थानीय स्तर पर भी आवंटन हो। इसका उद्देश्य होता है कि हर इंसान सरकार में अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर सके और वह अपने हितों और आवश्यकताओं के अनुसार शासन-संचालन में अपना योगदान दे सके। इस सन्दर्भ में भारत में पचांयती राज की एक संवैधानिक व्यवस्था देखने को मिलती है।

भारत जैसे बड़े लोकतंत्र की सबसे छोटी क्षेत्रीय इकाई गांव है। किसी भी तंत्र के सर्वांगीण विकास के लिए उसकी सबसे छोटी इकाई का मज़बूत होना ज़रूरी है। शायद इन्हीं पहलुओं पर विचार करने के बाद भारत में पचांयती व्यवस्था लागू की गई। लेकिन क्या इस व्यवस्था के मूल उद्देश्य, जो इसकी स्थापना के समय रखे गए थे, उनकी प्राप्ती की ओर यह तंत्र अग्रसर है​? वर्तमान में पचांयती राज व्यवस्था किन चुनौतियों का सामना कर रही है और उसे प्रभावी बनाने के लिए क्या-क्या कदम उठाए जा रहे है या उठाए जा सकते हैं, हम अपने लेख में इस पर बात करेंगे।

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भारत में स्थानीय स्वशासन की बात आजादी से पहले ही उठती रही है। फिर भी यह निराशाजनक है कि आजादी के इतने सालों बाद भी इसे वास्तविकता में पूरे प्रभाव के साथ लागू करने में इतनी समस्याएं हैं। भारत में स्थानीय स्वशासन का जनक ‘लाॅर्ड रिपन’ को कहा जाता है। वर्ष 1882 में उन्होंने स्थानीय स्वशासन संबंधी प्रस्ताव दिया ,जिसे स्थानीय स्वशासन संस्थाओं का ‘मैग्नाकार्टा’ कहा गया है। men 1919 के ‘भारत शासन अधिनियम ‘ के तहत प्रांतों में दोहरे शासन की व्यवस्था की गई और स्थानीय स्वशासन को भी हस्तांतरित विषयों की सूची में रखा गया। महात्मा गांधी स्थानीय स्वशासन के बड़े पक्षधर थे। वह कहते थे कि गांवों की स्थिति में सुधार करके ही देश को सभी दृष्टि से अपराजेय बनाया जा सकता है। उनका मानना था कि एक नियंत्रित और संतुलित रूप से गांवों को शासन शक्तियां अवश्य प्रदान करनी चाहिए। पंचायती राज व्यवस्था महिलाओं, जनजातियों और दलितों को भी सशक्त बनाने की ओर भी एक बड़े कदम के रूप में देखा जाता है।

आजादी के बाद वर्ष 1957 में योजना आयोग ने स्थानीय स्वशासन के लिए बलवंत राय मेहता समिति का गठन किया गया और नवंबर 1957 में समिति ने अपनी रिपोर्ट दी । इसमें तीन स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था- ग्राम स्तर , मध्यवर्ती स्तर और ज़िला स्तर पर लागू करने का सुझाव दिया गया था। वर्ष 1958 में राष्ट्रीय विकास परिषद ने बलवंत राय मेहता समिति की सिफारिशें स्वीकार की और 2 अक्टूबर, 1959 को राजस्थान के नागौर ज़िले में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा देश की पहली तीन स्तरीय पंचायत का उद्घाटन किया गया। वर्ष 1993 में 73वें और 74वें संविधान संशोधन के माध्यम से भारत में त्रि-स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था को संवैधानिक दर्ज़ा प्राप्त हुआ। भारत में त्रि-स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था में ग्राम पंचायत ग्राम स्तर पर , पंचायत समिति मध्यवर्ती स्तर पर और ज़िला परिषद ज़िला स्तर पर कार्यरत हैं। 

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पचांयतों को संवैधानिक दर्जा तो मिल गया लेकिन वर्तमान में उनकी स्थिती भी एक सरकारी दफ्तर की तरह खस्ता होती दिखाई पड़ती है। इन ढील भरे रवैये के चलते पंचायत व्यवस्था की चुनौतियों बढ़ रही है। चूंकि पंचायतों के पास वित्त प्राप्ति का कोई मज़बूत आधार नहीं होता है, उन्हें इसके लिए राज्य सरकारों पर निर्भर रहना पड़ता है। राज्य सरकारों द्वारा उपलब्ध कराया गया वित्त जाने कहां खर्च कर दिया जाता है। कई राज्यों में पंचायतों का चुनाव निश्चित समय पर नहीं हो पाता है। कई पंचायतों में जहां महिला प्रमुख हैं, वहां उनके घरों के पुरुष अपना अधिकार जताते हैं। महिलाएं केवल नाम भर की प्रमुख होती हैं। इन घटनाओं से पंचायत में महिला आरक्षण का उद्देश्य लटका रह जाता है। छिछली राजनीती वाले क्षेत्रीय राजनीतिक संगठन पंचायतों के मामलों में हस्तक्षेप करते हैं, जिससे उनके कार्यक्षेत्र और फैसले प्रभावित होते हैं। इस व्यवस्था में कई बार पंचायतों के निर्वाचित सदस्यों औरराज्य द्वारा नियुक्त पदाधिकारियों के बीच सामंजस्य बनाना मुश्किल होता है जिससे पंचायतों का विकास में तमाम अड़चनें आती हैं।

पंचायती राज व्यवस्था में आने वाली समस्याओं को दूर करने के कुछ बड़े प्रयास किए जा सकते हैं। वित्त की समस्या किसी भी तंत्र के विकास में सबसे बड़ी बाधा बनता है। पचांयतों को टैक्स लगाने के कुछ व्यापक अधिकार दिए जाए और वे खुद अपने वित्तीय साधनों में वृद्धि करें। इसके साथ ही पंचायती राज के कार्यपालिका क्षेत्र के अधिकारों को बढ़ा देना चाहिए। पचांयत में भागीदार महिलाओं के निर्णय लेने की क्षमता को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। क्षेत्रीय संगठनों के हस्तक्षेप के बिना राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा पंचायतों का निर्वाचन नियत समय पर होना चाहिए। पचांयतों को समय-समय पर जांचा जाए और उन्हें प्रोत्साहित किया जाए। जब भी भारत को एक लोकतांत्रिक देश कहा जाता है तो उसकी एक छवि बनती है ,जिसमें देश के सभी वर्गों का शासन में एक दायित्व दिखाई पड़ता है। अगर इस छवि में देश के हाशिए पर गए लोगों और लोकतंत्र के सबसे पीछे खड़े लोगों की भागीदारी नही सुनिश्चित हुई, तो यह छवि मात्र एक भ्रम बनकर रह जाती है।

भारत में आज भी शहर और गांवो में एक बड़ा अंतर दिखता है। निश्चित रूप से यहां वे अंतर जरूर होने चाहिए जो गांव को गांव और शहर को शहर बनाए रखें । लेकिन वे अंतर ऐसे नहीं हो जो गांव को सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ा बनाए रखे। ये अंतर ऐसे नहीं हो जो गांवों के बच्चों, युवाओं और महिलाओं के भविष्य पर प्रश्नवाचक चिन्ह लगा दें।  ये सभी जरूरतों की प्राप्ति कौन सुनिश्चित करेगा? कौन गांवों में रहने वाले लोगों के अधिकारों का हनन न हो यह सुनिश्चित करेगा? वह है वहां का शासन तंत्र यानि पंचायत। भारत की कुल जनंसख्या का 65.53 प्रतिशत भाग आज भी ग्रामीण क्षेत्र में निवास करता है। इसलिए गांव के सर्वागींण विकास में बड़ी भूमिका निभाने वाले पचांयत की स्थिति पर बात होनी जरूरी हो जाती है।

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(यह लेख अभिषेक वर्मा ने लिखा है जो भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली मे हिन्दी पत्रकारिता के छात्र हैं)

तस्वीर साभार : Sentinel Assam

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