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आइए, जानते हैं धर्म और जाति व्यवस्था के उन पांच प्रश्नों के बारे में जिनका उत्तर डॉ. भीमराव आंबेडकर ने अपनी किताब ‘जाति का उन्मूलन’ में दिया है।

1- जाति प्रथा को खत्म करना क्यों जरूरी है?   

“हिंदू समाज को सामाजिक सुधार की सख्त जरूरत है और जब तक हिंदू समाज का पुनर्निर्माण नहीं होगा तब तक राजनीतिक सुधार से कुछ नहीं होगा। हिंदू समाज जाति व्यवस्था से ग्रसित है। जो दलितों पर अत्याचार को वैधता देता है। एकजुटता और बंधुत्व को रोकता है और इससे हिंदुओं के बीच अपने ही हितों की खेती की उपज होती है।”

2- क्या धर्म शक्ति का स्त्रोत है?

“एक व्यक्ति की सामाजिक स्थिति अपने आप सत्ता का स्रोत बन जाती है। जिस तरीके से महात्माओं का आम आदमी पर प्रभुत्व है यह इसका एक उदाहरण है।धर्म शक्ति का स्त्रोत है जिसे भारत के इतिहास चित्रित किया गया है, जहां अक्सर एक आम आदमी के ऊपर एक मजिस्ट्रेट की तुलना में एक पुजारी का प्रभुत्व होगा।”

3- क्या जाति व्यवस्था श्रम विभाजन के माध्यम से सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने का एक तरीका है? 

“जाति व्यवस्था मजदूरों का विभाजन है। जाति व्यवस्था सिर्फ काम का विभाजन नहीं है ये काम करने वालों का विभाजन है। सभ्य समाज में काम का विभाजन नहीं होना चाहिए। यह एक अनुक्रम है जिसमें एक मजदूर को दूसरे से ऊपर रखा गया है और किसी भी अन्य देश में मजदूरों का विभाजन इस तरीके से नहीं होता है।” 

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4- क्यों इतने सारे लोगों ने उन सामाजिक बुराइयों को सहा, जिनके वे अधीन थे?  

जाति व्यवस्था के कारण हिंदुओं में निचले वर्ग के लोग इन सामाजिक बुराइयों के खिलाफ सीधे आवाज नहीं उठा पाए। इसी जाति व्यवस्था के कारण वह शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकते थे। यहां तक कि वह अपने बचाव का भी सोच सकते थे।

5- जाति व्यवस्था को कैसे खत्म किया जा सकता है?

डॉ. भीमराव आंबेडकर के मुताबिक, जाति कोई भौतिक वस्तु जैसे ईंट की दीवार नहीं है, जाति एक धारणा है जो कि मन की स्थिति है। उनके मुताबिक जाति व्यवस्था को खत्म करने का एकमात्र तरीका अंतर्जातीय विवाह है। इसके अलावा कुछ भी जाति को खत्म नहीं कर सकता है।

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