उत्तराखंड जिले की रहने वाली 15 वर्षीय दिव्या कहती हैं, “मैं शुरू से ही अपने साथ जातिगत भेदभाव होते हुए देखते हुए आ रही हूं। जैसे हमें शादियों में तथाकथित उच्च जाति के लोगों से अलग बैठकर खाना खिलाना। जब भी हम उनके घर जाते तो हमें नीचे बैठाया जाता और हमारे स्कूल में भी भोजन माता की जाति हमेशा तथाकथित सवर्ण होती थी।” जाति हमारे समाज की वास्तविकता है और उसके नाम पर होने वाले वाले भेदभाव आज भी समाज में जारी है। हम साल 2024 में है और आज भी हमारा समाज जातिवाद की जंजीरों से जकड़ा हुआ है। कहने को तो हमारा देश विकास और तरक्की की तरफ बढ़ रहा है लेकिन जाति के आधार पर होने वाली हिंसा लगातार जारी है।
हालांकि ध्यान देने वाली बात ये है कि जातिगत भेदभाव हमेशा प्रत्यक्ष रूप से न नज़र आता है न समझ। बतौर सामाजिक कार्यकर्ता, जब मैं उत्तराखंड के जिले में किशोरियों के एक समूह के साथ काम की, तो बहुत सी जातिवादी घटनाएं और व्यवहार सामने आई। ख़ासकर जब युवा और किशोरियों के साथ के किसी समूह के साथ काम किया जाता है, तो उस समाज में जो हो रहा होता है वही दिखाई देता है। समूह के साथ जुड़ी किशोरियों के बीच जाति के आधार पर काफी अलगाव और भेदभाव देखने को मिला। शहरी क्षेत्र के मुकाबले ग्रामीण क्षेत्र में मूलभूत रूप से काफी मिलना-जुलना रहता है। लेकिन एक ही गांव और स्कूल के होने के बावजूद, जाति की वजह से सारी किशोरियां एक-दूसरे से समूह में बात नहीं करती थी और न ही किसी का एक-दूसरे के घर जाना था। ग्रामीण क्षेत्र में इस तरह की जातिवाद की घटनाएं बहुत बारीक तरीके से दिखाई देती है जिनको समझ पाना बहुत मुश्किल होता है।
ख़ासतौर पर हमारे परिवार में भी हमेशा से बच्चों को जाति का गर्व और जाति के आधार पर नफ़रत करना सिखाया जाता है। हमेशा बच्चों को यही सिखाया जाता है कि तथाकथित उच्च जाति के लोग दलित समुदाय के लोगों से कोई संबंध नहीं रखेंगे। ऐसे में किशोरियों को एक समूह में बांधना बहुत मुश्किल हो रहा था। जब भी किसी समूह के साथ सामाजिक कार्यों पर काम किया जाता है, तो ऐसे में बहुत ज़रूरी होता है कि समूह में मौजूद सभी साथियों के आपसी रिश्ते ठीक हो। उत्तराखंड के समाज में फैली इस कुरीति का सीधा असर हमारे काम के बीच बाधा बन रहा था।
दिव्या कहती हैं, “जाति के आधार पर मेरे साथ जो भेदभाव होता था पहले ये सब मुझे बहुत बुरा नहीं लगता था। मेरा ऐसा मानना था कि यह हमारे बजुर्गों के बनाए हुए रीती-रिवाज है जो कि सही है लेकिन जब मैंने इसके बारे में गहराई से जाना मुझे तब समझ में आया कि किस तरह से इतने समय से हमारे साथ गलत हो रहा हैं।”
पहाड़ी समाज और उसकी जातीय व्यवस्था
उतराखंड को पूर्ण राज्य का दर्जा मिले हुए 19 साल हो गये है। यू तो उत्तराखंड को हिमालय, गंगा, प्राकृतिक खूबसूरती और धामों के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है, लेकिन इस राज्य में जातिवाद के आधार पर भेदभाव की होने वाली घटनाएं भी लगातार सामने आती रहती है। आए दिन हम समाज में जातिगत भेदभाव से जुड़ी हिंसा की ख़बरें देखते हैं। साथ ही सबके सामने या राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में होने वाली ऐसी घटनाओं का कुछ ही प्रतिशत है। हमारे व्यवहार में स्थापित कर दिए गए जातीय आधार पर होने वाले भेदभाव की हर घटना तो सामने भी नहीं आती है। आज भी जागरूकता के अभाव के कारण लोग जातिगत भेदभाव को ही अपनी नियति मान लेते है।
उत्तराखंड राज्य से जुड़ी हुई जातिवादी घटनाएं
उत्तराखंड की बात करें तो वहां पर कई ऐसे इलाके हैं, जहां पर आए दिन जातिवाद से जुड़ी घटनाएं होती रहती हैं। आए दिन हम अपने मीडिया में जातिवाद से जुड़ी हुई हिंसा के मामले देखते रहते हैं। बीते वर्ष उत्तराखंड में ही स्कूल में दलित भोजन माता के हाथ से बने खाना ना खाने की बात सामने आई। चंपावत जिले के एक सरकारी स्कूल में तथाकथित उच्च जाति के बच्चों ने स्कूल में मिल रहे भोजन को खाने से मना इसलिए कर दिया कि स्कूल में नियुक्त भोजन माता दलित समुदाय से आती हैं। इस बात को लेकर बच्चों समेत मात-पिता ने आपत्ति जताई। ठीक इसी तरह एक शादी में दलित आदमी के तथाकथित ऊंची जाति के लोगों के साथ बैठकर खाना खाने से उसकी मौत की घटना सामने आई। दलित समुदाय के दूल्हे को घोड़े पर बैठने नहीं दिया जाता है।
राज्य में आज भी ऐसे बहुत से मंदिर है जहां पर दलितों की एंट्री पर बैन है। टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित ख़बर के अनुसार, राज्य सरकार के स्टेट कमीशन ऑफ शेड्यूल कास्ट ने बीते वर्ष 13 जिलों से ऐसे मंदिरों की लिस्ट मांगी, जहां दलितों की एंट्री बैन है। प्रदेश की राजधानी देहरादून से करीब 150 किलोमीटर दूर चकारता तहसील में बड़ी संख्या में ऐसे मंदिर हैं, जहां पर दलित समुदाय के लोगों के जाने पर रोक है। इसी समाज में दलित जाति के लोगों को मंदिर में जाने पर तथाकथित स्वर्ण जाति के लोगों द्वारा उनकी हत्या तक कर दी जाती है। राज्य में साल दर साल ऐसे केसों की संख्या बढ़ रही है, जहां पर दलित समुदाय के लोगों के साथ हिंसा के मामले सामने आए हैं। साल 2019 में ऐसे 100 मामले सामने आए थे, 2020 में 135, 2021 में इन मामलों में 35 फीसदी बढ़ोत्तरी देखी गई थी। हर बार यहां के चुनावों में जातीय समीकरण को महत्व दिया जाता है। जाति के मुद्दे पर चुनाव लड़ा जाता है।
जातिगत भेदभाव पर युवतियों का क्या है कहना

किशोरियों के समूह के साथ काम करते हुए यह बात सामने आई कि किस तरह से दलित समुदाय की किशोरी अपने साथ होने वाले जातिगत भेदभाव को परंपरा के नाम पर सही मानती आ रही थी। अल्मोड़ा जिले की रहने दिव्या कहती हैं, “जाति के आधार पर मेरे साथ जो भेदभाव होता था पहले ये सब मुझे बहुत बुरा नहीं लगता था। मेरा ऐसा मानना था कि यह हमारे बजुर्गों के बनाए हुए रीती-रिवाज है जो कि सही है लेकिन जब मैंने इसके बारे में गहराई से जाना मुझे तब समझ में आया कि किस तरह से इतने समय से हमारे साथ गलत हो रहा हैं। रीति-रिवाज के नाम पर हम लोगों को कितना दबाया जा रहा है लेकिन हमारे समझने से क्या वाकई में कोई बदलाव आएगा। जबतक सब लोग चीजें नहीं समझेंगे तक तक स्थिति नहीं बदलेंगी। मैंने अपने गाँव में अपने समूह की लड़कियों और परिवार वालों के अंदर जातिगत भेदभाव पर बदलाव को देखा तो ये एहसास हुआ कि कोशिश करने पर हम बदलाव ला सकते हैं लेकिन ये बदलाव तभी आएगा जब हम सब मिलकर कोशिश करेंगे और बदलाव के कार्यों पर काम करेंगे। अब हम पहले से ज्यादा जगारूक हो गए है तो जो चीजें बचपन से सिखाई गई थी उन पर सवाल उठाने लगे हैं।”
हमें शुरू से यही सिखाया गया था
अल्मोड़ा जिले की रहने वाली 16 वर्षीय पिंकी कहती है, “जाति और उसके आधार पर होने वाले दुर्रव्यवहार की सीख मुझे मेरे घर से ही दी गई थी। तथाकथित उच्च जाति के होने से मेरे घर में भी बहुत जातिवाद होता था। एक सामाजिक संस्था द्वारा हमारे घर में कंप्यूटर सेंटर चलाया जा रहा था जिसमें गाँव की सभी लड़कियां कंप्यूटर सिखने आती थी। मेरी माँ द्वारा समूह की दलित समुदाय की किशोरियों के साथ बहुत भेदभाव किया जाता था। वो जब भी सेंटर में कुछ खाने के लिए लेकर आती थी तो केवल कुछ अमुख जाति की लड़कियों को ही खाने के लिए पूछती थी। मैं भी जब सेंटर में बैठकर कुछ खाती थी तो मेरी माँ मुझे बहुत डांटती थी कि सबके साथ बैठकर क्यों खाती हैं। पहले मुझे कहीं ना कहीं ये बात सही भी लगती थी क्योंकि हमें शुरू से यही सिखाया गया था”
राज्य में साल दर साल ऐसे केसों की संख्या बढ़ रही है जहां पर दलित समुदाय के लोगों के साथ हिंसा के मामले सामने आए हैं। साल 2019 में ऐसे 100 मामले सामने आए थे, 2020 में 135, 2021 में इन मामलों में 35 फीसदी बढ़ोत्तरी देखी गई थी। हर बार यहां के चुनावों में जातीय समीकरण को महत्व दिया जाता है। जाति के मुद्दे पर चुनाव लड़ा जाता है।
बच्चों पर बचपन से ही समाज के रीति-रिवाजों को सिखने का दवाब डाला जाता हैं। घर के बड़े हमेशा बच्चों के अपने बनाए गए रीति-रिवाजों रिवाजों में ढालने की कोशिश करते हैं। पिंकी आगे कहती हैं,”जब हमने अपने समूह में जातिवाद के बारे में सिखा और इसपर चर्चा की तब मुझे पता चला कि हम कितना गलत कर रहे हैं। परंपराआओं के नाम पर हमें जो सिखाया जा रहा है उससे कहीं ना कहीं किसी की भावनाओं उसके लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन हो रहा है। यह सब जानने के बाद मैंने अपने अंदर जातिवाद जैसी सोच को बदला इसके साथ ही मैंने अपने परिवार में इस सोच पर बदलाव लाने की कोशिश की। अब चीजें पहले जैसी नहीं रही है लेकिन जातिगत आधार पर होने वाले भेदभाव की सीख मुझे परिवार द्वारा ही दी गई थी।”
बहुत सी कोशिशों और समय के बाद किशोरियों के इस समूह में बदलाव देखने को मिले। समाज द्वारा बनाई गई जातिवाद की धारणाओं को इन किशोरियों ने बदला। अब समूह की सभी किशोरियां एक-दूसरे के साथ काफी मिल- जुलकर रहती हैं। वो सब अब एक-दूसरे के घरों में जाती हैं जहां एक-दूसरे के साथ खाना खाती है। अपने अंदर के जातिवाद को खत्म करने के बाद ये समूह एक बहुत अच्छे लीडर के रूप में उभर कर आया हैं। जैसे-जैसे इन किशोरियों के समूह में बदलाव आता गया वैसे ही उन्होंने ने अपने परिवार और समाज में भी भेदभाव को खत्म करने की कोशिश की गई है। अब ये समूह मिलकर समाज के विकास और बदलावों पर काम कर रहा हैं। अपने निजी जीवन के साथ-साथ वो सब मिलकर सामाजिक कार्यों में अपना कर्तव्य बखूबी निभा रही हैं। समाज की उस कल्पना का विस्तार कर ही है जो लोकतांत्रिक मूल्यों के आधार पर आगे बढ़े जहां हर व्यक्ति समता और समानता के साथ रहे।
About the author(s)
My name is Pooja. I am from Himachal Pradesh. I see myself as a feminist. I work with youth and adolescents on issues like gender, health, violence, sexuality and caste discrimination. I create such a safe space for them where they feel free to discuss and can talk openly personal and social issues.


