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‘सही पोषण, देश रोशन’ की टैगलाइन के साथ भारत में हर साल पोषण पखवाड़ा का अनुपालन किया जाता है। विकासशील अर्थव्यवस्था वाले देशों में भारत हमेशा से भुखमरी, गरीबी, बच्चों और महिलाओं में कुपोषण, पांच साल से कम उम्र के बच्चों की उच्च मृत्यु दर या उच्च मातृ मृत्यु दर जैसे समस्याओं से जूझता आया है। उत्पादकता की नजर से विचार करें तो भारत आज दूध, अनाज, दालों, सब्जियों, फलों सहित मांसाहारी खाद्य सामग्री के उत्पाद में आत्मनिर्भर हो चुका है। मिंट में छपी एक खबर के अनुसार रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट में बताया कि देश आज एक ऐसे चरण पर पहुंच गया है जहां अतिरिक्त खाद्यान्न का प्रबंधन ही एक बड़ी चुनौती बनकर उभर रही है। साल 2020 के ग्लोबल हंगर इंडेक्स के अनुसार भारत कुल 107 देशों में 94वें पायदान पर था। 27.2 स्कोर के साथ इस रिपोर्ट के आधार पर भारत की भुखमरी के हालात को ‘गंभीर’ श्रेणी में रखा गया है। बता दें कि भारत अपने पड़ोसी देशों नेपाल, बांग्लादेश, पाकिस्तान और श्रीलंका से भी पीछे था। दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों में भारत कुपोषण से जूझता चौथा सबसे खराब प्रदर्शन करने वाला देश है। अकसर गंभीरता से ना लिए जाने वाला कुपोषण की समस्या से जूझते बच्चे और महिलाओं के बीमार या मौत होने से किसी परिवार को आघात तो पहुंचता ही है। लेकिन इससे देश का स्वास्थ्य, शिक्षा और अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में सर्वांगीण विकास भी प्रभावित होता है। जीएचआई कहती है वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में प्रत्येक प्रतिशत के गिरावट से 7 लाख तक अतिरिक्त बच्चों की भयंकर कुपोषण से स्टंटिंग या अवरुद्ध विकास से पीड़ित होने की आशंका बढ़ जाती है।

पिछले वर्ष वैश्विक महामारी कोरोना, फसलों पर टिड्डियों का विनाशकारी प्रकोप और आर्थिक मंदी के संकटों ने तेजी से लाखों लोगों के भुखमरी और कुपोषण का शिकार होने की आशंका को बढ़ा दिया है। इस विकट समस्या ने समाज के वंचित वर्ग को और भी असुरक्षित और असहाय बना दिया है। भारत हमेशा ही सार्वजनिक स्वास्थ्य और पोषण की वृद्धि के लिए महत्वाकांक्षी कार्यक्रम और नीतियां बनाता आया है। देश के फसल उत्पादन में आत्मनिर्भर होने पर भी आज देश के 14 प्रतिशत बच्चे कुपोषित हैं। देश के बच्चों में 37.4 प्रतिशत स्टंटिंग दर और 17.3 प्रतिशत की वेस्टिंग या लंबाई के अनुसार कम वजन होने का दर रिकार्ड किया गया है। साथ ही, पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों में 3.7 प्रतिशत मृत्यु दर पाया गया। केन्द्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन द्वारा इस वर्ष के बजट मेंपोषण अभियान 2.0 की घोषणा की गई।

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पोषण अभियान की वेबसाइट कहती है कि यह प्रधानमंत्री द्वारा शुरू की गई संपूर्ण पोषण के लिए एक व्यापक योजना है जो बच्चों, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं के पोषण परिणामों में सुधार करेगी। हालांकि यह योजना साल 2018 में पोषण अभियान के नाम से शुरू की गई थी जो सरकार की प्रमुख योजना थी। इस योजना की नींव साल 2022 तक ‘कुपोषण मुक्त भारत’ के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए रखी गई थी। सरकार ने एक ओर पिछले अनुपूरक पोषण कार्यक्रम (एसएनपी) और पोषण अभियान को विलय कर इस योजना की घोषणा की तो दूसरी ओर इस महामारी के प्रभाव के बावजूद इस वर्ष के बजट में भारी कटौती की। डाउन टू अर्थ की एक रिपोर्ट के अनुसार साल 2020-21 में 3,700 करोड़ के पोषण बजट की तुलना में इस वर्ष 2,700 करोड़ रुपये आवंटित किए गए। विभिन्न शोध और रिपोर्ट बताते हैं कि कोरोना महामारी के कारण अर्थ और संसाधनों में पहले से व्याप्त असमानताएं अपने चरम पर जा चुकी हैं यानी पोषण की समस्या और इसके दुष्परिणाम उम्र, लिंग, आय, जाति, समुदाय, स्थान और शिक्षा के असमानता के कारण पहले से कहीं ज्यादा प्रभावित होंगी। ऐसे में बजट में कटौती कर कुपोषण मुक्त भारत की कवायद करना खतरनाक साबित हो सकता है।

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ग्लोबल हंगर इंडेक्स के मुताबिक विश्व स्तर पर पोषण सूचकों को अलग-अलग प्रतिमानों से प्रभावित होते देखा गया है। मसलन, बच्चों में ठोस भोजन की पहचान और शुरुआत, खाने का अंतराल, आहार में विविधता, न्यूनतम स्वीकार्य आहार में अत्यधिक विषमताएं देखी गई हैं। अमीर और शहरी क्षेत्र की पढ़ी-लिखी मांओं के बच्चों का इन प्रतिमानों पर बेहतर नतीजे पाए गए। न्यूनतम स्वीकार्य आहार; विशेषकर खाने का अंतराल और आहार में विविधता को मद्देनज़र रखते हुए, 11.5 प्रतिशत आर्थिक, 4.9 स्थानीय और 7.7 प्रतिशत शैक्षिक अंतर दर्ज किया गया। गौरतलब है कि ग्लोबल जेन्डर गैप इंडेक्स 2021 के रिपोर्ट अनुसार भारत स्वास्थ्य के क्षेत्र में साल 2006 के 103वें पायदान से गिरकर आज 155वें पायदान पर पहुँच गया है। 

साल 2020 की ग्लोबल न्यूट्रीशन रिपोर्ट (जीएनआर) की मानें तो भारत में प्रजनन आयु की हर दो महिलाओं में से एक महिला एनीमिक है। पांच साल से कम उम्र के हर तीन बच्चों में से एक स्टनटेड है और पांच साल से कम उम्र के हर पांच बच्चों में से एक वेसटेड है। यह गौर करने वाली बात है कि भारत में शिशु और मातृ स्वास्थ्य बहुत हद तक आंगनवाड़ी और आशा कर्मचारियों पर निर्भर है। कोरोना महामारी से निपटने में इनके संलग्न होने से पूरे देश की, विशेषकर ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य व्यवस्था चरमरा गई है। स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे छोटी इकाई का खुद कम वेतन और सरकार के लापरवाह रवैये का शिकार होना, देश के स्वास्थ्य व्यवस्था को चपेट में ले सकती है। सरकार के संशोधित मानदेय के बावजूद आंगनवाड़ी कर्मचारी किसी प्रधान आंगनवाड़ी केंद्र में 4500 हज़ार प्रति महीने और छोटे केंद्र एवं आंगनवाड़ी सहायक इससे भी कम मानदेय पाती हैं। आशा कर्मचारियों का महामारी के दौरान वेतन वृद्धि और भुगतान निकासी के लिए विरोध प्रदर्शन, इनके खस्ता हालत को बयान करती है। कोरोना महामारी ने समाज के वंचित तबकों द्वारा झेली जा रही सामाजिक असमानताओं को उजागर किया है। बेरोजगारी और आय के सीमित हो जाने से निम्न और मध्यवर्गीय परिवारों के रहन-सहन और खान-पान पर भी असर हुआ है। इसलिए देश में अधिकतर परिवार मूलतः सरकारी योजनाओं या गैर सरकारी संस्थानों से ही लाभान्वित हो सकते हैं। जीएचआई बताती है कि महामारी से कहीं पहले ही विश्व का कोई भी देश सतत विकास लक्ष्य के अंतर्गत साल 2030 तक ‘ज़ीरो हंगर’ के लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में अग्रसर नहीं था। वर्ल्ड फूड प्रोग्राम महामारी के कारण साल 2020 के अंत तक 130 मिलियन अतिरिक्त लोगों का चरम खाद्य संकट से जूझने की आशंका जता चुकी है।

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भारत में खाद्य असुरक्षा और कुपोषण की समस्या को हल करने के उद्देश्य से साल 2013 में संसद ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम पारित किया था। हालांकि देश में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) आज़ादी के वक्त से मौजूद है पर मौजूदा हालात को देखते हुए इस वर्ष के मार्च तक ‘वन नेशन वन राशन कार्ड’ योजना सभी राज्यों में शुरू होने की बात हज़ारों लोगों की एकमात्र उम्मीद है। हाल ही में जारी हुए राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5) में अधिकतर राज्यों में पांच साल से कम उम्र के बच्चों में एनीमिया के मामले में बढ़ोतरी चिंता का विषय है। 15 से 49 वर्ष की महिलाओं के बीच भी एनीमिया के मामलों में इजाफ़ा हुआ है। जीएचआई इस बात पर जोर देती है कि प्रजनन के उम्र की महिलाओं में व्यापक आयरन की कमी और पुरुषों की तुलना में महिलाओं का उच्च वैश्विक कुपोषण दर स्वास्थ्य और पोषण सेवाओं के भीतर व्याप्त प्रणालीगत भेदभाव को बताती है। महिलाओं की खराब पोषण स्थिति उनकी दैनिक गतिविधियों और आजीविका में बाधा डाल सकती है। साधारणतः, यह समस्या पीढ़ियों तक चलती जाती क्योंकि अकसर, गरीब कुपोषित महिलाएं कम वजन वाले बच्चों को जन्म देती हैं। ग्लोबल न्यूट्रीशन रिपोर्ट दर्शाती है कि भारत में स्टंटिंग का प्रचलन शहरी के मुकाबले ग्रामीण क्षेत्रों में 10.1 प्रतिशत अधिक है।

साल 2018 में देश के पिछड़े हुए जिलों में स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा, बुनियादी ढांचे, कृषि और जल संसाधनों के प्रदर्शन में सुधार के लिए एस्पिरेशनल डिस्ट्रिक्ट्स कार्यक्रम की शुरुआत भी की गई थी। हालांकि इस योजना के माध्यम से ‘सबका साथ, सबका विकास’ के तर्ज पर सामाजिक असमानता को संबोधित करने और परिवर्तन लाने की परिकल्पना की गई थी। लेकिन महिलाओं, गरीब और हाशिये पर जी रहे समुदायों के स्थिति में किस हद तक सुधार हुआ है, उसका अंदाज़ा महामारी के दौरान सामाजिक असमानताओं की खुलती परतों से किया जा सका है। निश्चित ही कोरोना महामारी ने सामाजिक सुरक्षा के अभाव और असमानताओं को बढ़ा दिया है। समाज के महिलाओं और कमजोर वर्ग के लिए इन व्यापक और आकर्षक दिखने वाली योजनाओं पर सवाल उठाने जरूरी हैं। समय के मांग के अनुसार नीतियों में फेरबदल और लक्षित कार्यक्रमों का सम्पूर्ण रूप से अमल होना जरूरी है।

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तस्वीर साभार : New Scientist

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