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पिछले मार्च से शुरू हुए राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन ने लाखों आम भारतीयों जैसे प्रवासी श्रमिकों, किसानों, हाशिये पर जी रहे आदिवासियों, दलितों, सफाई कर्मचारियों, निर्माण मजदूरों, अस्पताल के फुटपाथों पर आश्रय लेने वाले कैंसर रोगियों, घरेलू मदद का काम करने वाली महिलाओं समेत असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले करोड़ों लोगों के सामने जीने का संकट पैदा कर दिया था। बड़ी संख्या में लोग रोजॉगार, आय या भोजन के अभाव से ग्रस्त रहे। कई लोग जैसे स्वास्थ्य कर्मचारी बेहद खतरनाक परिस्थितियों में भी अपने काम को जारी रखे हुए हैं। कोरोना की चपेट में आए, पिछले साल से लोग लगातार अलग-अलग चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। अब कोरोना की दूसरी लहर ने फिर से लॉकडाउन की आशंका, आर्थिक तंगी, लचर स्वास्थ्य सेवाएं, दोबारा बंद होते शैक्षिक संस्थान जैसी समस्याओं ने हमें उसी स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है।

कहते हैं, एक स्वस्थ शरीर के लिए तन और मन दोनों का स्वस्थ होना आवश्यक है। लेकिन देश में मौजूद मानसिक स्वास्थ्य को लेकर रूढ़िवादी सोच, चिकित्सा प्रणाली में कमी और कोरोना के कारण बाधा एवं जागरूकता का अभाव आम जनता को नकारात्मक तरीके से प्रभावित कर रहा है। इंटरनेशनल जर्नल ऑफ मेंटल हेल्थ सिस्टम द्वारा किए गए एक शोध अनुसार भारत में लॉकडाउन के दौरान साल 2020 में 369 आत्महत्या से मौत या आत्महत्या की कोशिश के मामलों की जानकारी ऑनलाइन मीडिया रिपोर्ट के ज़रिये सामने आई जबकि लॉकडाउन के पहले यह संख्या 220 थी। इस रिपोर्ट के अनुसार आत्महत्या से होने वाली मौत या आत्महत्या की कोशिशों में लॉकडाउन काल में 67.7 प्रतिशत तक वृद्धि दर्ज हुई।

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भारत में मानसिक स्वास्थ्य की मौजूदा स्थिति और उसकी गंभीरता को बेहतर समझने के लिए यह ज़रूरी है कि हम पिछले आंकड़ों और चिकित्सा प्रणाली को परख लें। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के तहत संचालित नैशनल इंस्टिट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एण्ड निउरो साइंसेस (निम्हान्स) द्वारा की जाने वाली नैशनल मेंटल हेल्थ सर्वे ऑफ इंडिया की साल 2015-16 की रिपोर्ट बताती है कि हर छठे भारतीय को मानसिक स्वास्थ्य सहायता की आवश्यकता है। इस रिपोर्ट के अनुसार 30 से 49 साल या 60 वर्ष से बड़ी उम्र वाले लोगों में अधिक मानसिक समस्याएं पाई गई। इन आंकड़ों के अनुसार कम पैसे कमाने वालों और शहरी क्षेत्र के लोगों को मानसिक विकारों की घटना से सबसे अधिक प्रभावित होते पाया गया।

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मुंबई या दिल्ली जैसे शहरों में कोरोना की दूसरी लहर शुरू होते ही प्रवासी श्रमिकों में भगदड़ मच जाना और घर वापस लौटने की जद्दोजहद करना, यह दर्शाता है कि लोग किस कदर चिंता और आशंका से ग्रस्त है। निश्चित ही हर मौत किसी ना किसी को भावनात्मक और शारीरिक कमी का एहसास कराती है और कई बार आर्थिक संकट भी पैदा कर देती है। पर सड़कों, अस्पतालों, फुटपाथों पर रोते, बिलखते लोगों के दृश्य किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को विचलित कर सकती है। अपने परिजनों के लिए कुछ ना कर पाने की छटपटाहट एवं अस्पतालों में ऑक्सीज़न और दवाइयों की कमी से जूझती आम जनता का असहाय और अनिश्चित महसूस करना लाजमी है। अच्छा स्वास्थ्य होने के लिए अच्छा मानसिक स्वास्थ्य होना जरूरी है। यह लोगों के कल्याण और प्रभावी कामकाज की नींव है। कामकाजी जीवन में किसी भी व्यक्ति का मानसिक बीमारियों से मुक्त होने से उसकी कार्य क्षमता, दैनिक जीवन की गुणवत्ता और अन्य लोगों से संपर्क में बाधा आने की संभावना कम होती है। अच्छा मानसिक स्वास्थ्य ना सिर्फ वयस्कों बल्कि विद्यार्थियों और बुजुर्गों के लिए भी महत्वपूर्ण है जो कई बार सामाजिक रूढ़िवाद या अज्ञानता के कारण इसके लक्षणों को नजरंदाज कर देते हैं।

वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गानाईज़ेशन (डब्ल्यूएचओ) का अनुमान है कि भारत में मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का बोझ प्रति दस हजार लोगों की जनसंख्या पर 2443 विकलांगता समायोजित जीवन वर्ष (DALYs) है। देश में प्रति लाख जनसंख्या पर आयु-समायोजित आत्महत्या से मृत्यु का दर 21.1 है। यह दर साल 2016 में 16.5 रही जबकि वैश्विक औसत 10.5 थी। आत्महत्या से होनेवाली मौत भारत में एक उभरता और गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य मुद्दा है। हालांकि, डब्ल्यूएचओ कहता है कि इसकी रोकथाम समय पर कम लागत वाली चिकित्सा से संभव है। देश में मानसिक स्वास्थ्य व्यवस्था की कमी होने से यह ना सिर्फ व्यक्तिगत रूप में लोगों को नुकसान पहुंचा रही है बल्कि देश की अर्थ व्यवस्था को भी प्रभावित कर रही है। डब्ल्यूएचओ के अनुसार साल 2012 से 2030 के बीच मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति के कारण 1.03 ट्रिलियन अमरीकी डॉलर का आर्थिक नुकसान होने का अनुमान है।

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डीएनए में छपी एक रिपोर्ट बताती है कि लॉकडाउन में सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय द्वारा जारी की गई मानसिक स्वास्थ्य पुनर्वास हेल्पलाइन ‘किरण’ पर 16 सितंबर, 2020 से 15 जनवरी, 2021 तक 13,550 कॉल आए।  इनमें 70.5 फीसदी पुरुष और 29.5 प्रतिशत महिलाओं के कॉल थे और अधिकतर लोगों ने तनाव या चिंता से ग्रसित होने की सूचना दी। इस वर्ष के केन्द्रीय बजट में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए 597 करोड़ रुपए आवंटित किया गया लेकिन इस राशि को मूलतः मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों में खर्च करने की योजना बताई गई। इस बजट का केवल सात प्रतिशत राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम को देते हुए बेंगलुरू स्थित निम्हान्स के लिए 500 करोड़ और तेजपुर में लोकप्रिय गोपीनाथ बोरदोलोई क्षेत्रीय स्वास्थ्य संस्थान के लिए 57 करोड़ रुपये आवंटित किए गए। मौजूदा हालात और बढ़ते मानसिक विकारों के बावजूद पिछले साल की तुलना में राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के बजट में कोई बढ़ोतरी नहीं की गई। यह कमी देश में मानसिक स्वास्थ्य चिकित्सकों के खराब अनुपात में भी दिखाई देती है। डब्ल्यूएचओ द्वारा वर्ष 2017 की भारत की प्रोफाइल के अनुसार, प्रति एक लाख लोगों पर लगभग 0.29 मनोचिकित्सक, 0.07 क्लीनिकल मनोवैज्ञानिक, 0.06 सामाजिक कार्यकर्ता और 0.80 नर्स हैं।

डब्ल्यूएचओ के एक नए सर्वेक्षण के अनुसार, कोविड-19 महामारी ने दुनिया के 93 प्रतिशत देशों में महत्वपूर्ण मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को बाधित किया या रोक दिया है। 130 देशों पर किया गया यह सर्वेक्षण मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के पहुंच पर कोविड-19 के नकारात्मक प्रभाव को दर्शाने वाला पहला वैश्विक रिपोर्ट है। डब्ल्यूएचओ की यह रिपोर्ट मानसिक स्वास्थ्य की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करते हुए इसपर पहले से कहीं अधिक खर्च करने की जरूरत पर जोर देती है। यह गौर करने वाली बात है कि इस सर्वेक्षण में लगभग तीन-चौथाई लोगों ने स्कूल और कार्यस्थल पूरी या आंशिक रूप से बंद होने से मानसिक समस्याओं की सूचना दी। डब्ल्यूएचओ बताता है डिप्रेशन या अवसाद एक सामान्य मानसिक विकार है। विश्व स्तर पर, सभी उम्र के 264 मिलियन से भी अधिक लोग अवसाद से पीड़ित होते हैं। मानसिक, न्यूरोलॉजिकल और सब्सटांस यूस से उत्पन्न मानसिक विकारों का वैश्विक स्तर पर सभी बीमारियों में 10 प्रतिशत से भी अधिक हिस्सेदारी होती है। दो सबसे आम मानसिक विकार अवसाद और चिंता के परिणामस्वरूप खोई हुई उत्पादकता के कारण विश्व स्तर पर अर्थव्यवस्था में प्रत्येक वर्ष 1 ट्रिलियन अमरीकी डॉलर तक खर्च होता है। निम्न और मध्यम आय वाले भारत जैसे देशों में मानसिक विकार वाले 75 फीसदी से अधिक लोगों को अपने विकार के लिए कोई भी उपचार नहीं मिलता है।

बार्सेलोना इंस्टिट्यूट ऑफ ग्लोबल हेल्थ ने मौजूदा हालात में लोगों के बिगड़ते मानसिक स्वास्थ्य पर एक शोध जारी की है। इस में बच्चे, युवा, महिलाओं, प्रवासियों और शरणार्थियों, उम्रदार वयस्क और पहले से किसी शारीरिक समस्या से जूझ रहे लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर खास ध्यान देने की जरूरत पर जोर दिया गया। इस शोध में यह चिंता जाहिर की गई कि दुनिया में कोरोना के बाद मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं की एक नई लहर शुरू हो सकती है। भारत में मानसिक समस्याओं को कई बार उम्र या सामाजिक हैसियत से जोड़ लेने की प्रवृत्ति है। साथ ही हमारा समाज इन्हें विभिन्न रूढ़िवादी सोच, लोककथा और मिथक के चश्मे से देखते हैं। जागरूकता और जानकारी की कमी हर तबके को प्रभावित करती है। गौरतलब हो कि देश की आधी से ज्यादा आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रह रही है। ग्रामीण आबादी मूलतः जन स्वास्थ्य केंद्रों और सरकारी अस्पतालों या डॉक्टरों पर इलाज के लिए आश्रित रहती है। उत्कृष्ट बड़े मानसिक स्वास्थ्य केंद्रों के विकास होने के बावजूद वह सीमित लोगों को ही लाभान्वित कर पाएगी। भारत पहले से ही चरम सामाजिक असमानताओं से ग्रसित है। विश्व संस्थानों के ‘निष्पक्ष और स्वस्थ दुनिया की रचना’ करने की बात भारत के लिए एक सुनहरा सपना बन कर रह जाने की संभावना है। दुनिया के इतिहास की सबसे बड़े स्वास्थ्य संकट के एक साल में लोगों को अप्रत्याशित शारीरिक, आर्थिक, सामाजिक और मानसिक कष्ट झेलना पड़ा है। भारत की स्वास्थ्य प्रणाली दोबारा कोरोना से उत्पन्न मानसिक परेशानियाँ, वित्तीय संकट, और लॉकडाउन के परिणामों से निपटने के लिए कितनी तैयार है, यह विवादास्पद है। ऐसे में देश की आम जनता का मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से जूझना अगली महामारी का कारण बन सकती है।

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तस्वीर साभार : The Hindu

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