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बेगम कुदसिया ज़ैदी एक लेखिका, सामाजिक कार्यकर्ता और थियेटर से जुड़ी थीं। 1950 के दशक में उन्हें दिल्ली में हिंदुस्तानी थियेटर स्थापित करने के लिए याद किया जाता है। एक थियेटर व्यवसायी के रूप में उन्होंने अभिनेताओं और नाटककारों की कई पीढ़ियों को प्रभावित किया है। उनका थियेटर शास्त्रीय और आधुनिक थियेटर का एक मिश्रण था। उन्होंने अपनी प्रतिभा से कई पुराने संस्कृत नाटकों को समय के अनुसार बदला है। उन्होंने समान रूप से बच्चों और वयस्कों के लिए कई किताबें भी लिखी। बेगम कुदसिआ जै़दी का जन्म 23 नवंबर 1914 को दिल्ली में हुआ था। उनके पिता एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी थे। कुदेसिआ अधिक समय उनके साथ नहीं बिता पाईं क्योंकि उनके माता-पिता की मौत उनके बचपन में ही हो गई थी। वह अपनी बहन ज़ुबैदा और जीजा कानून अहमद शाह बुखारी जो एक उर्दू लेखक होने के साथ-साथ थियेटर में गहरी रुचि रखते थे, उनके साथ रहने लगीं। उनके साथ रहकर जै़दी भी थियेटर के प्रति आकर्षित होने लगीं। वह हमेशा साहित्य पढ़ती रहती थी और अलग-अलग भाषाओं को जानने का प्रयास करती थीं।

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बेगम कुदसिया ज़ैदी एक लेखिका, सामाजिक कार्यकर्ता और थियेटर से जुड़ी थीं। 1950 के दशक में उन्हें दिल्ली में हिंदुस्तानी थियेटर स्थापित करने के लिए याद किया जाता है।


कुदसिया ज़ैदी ने पाकिस्तान के केन्नार्ड कॉलेज से अपनी पढ़ाई पूरी की। बाद में उनके जीजा दिल्ली में ऑल इंडिया रेडियो में काम करने लगे इसलिए वह भी अपने बहन के साथ दिल्ली चली आईं। उन्होंने 1937 में बशीर हुसैन जै़दी से शादी की। जो बाद में लोकसभा के सदस्य और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के कुलपति बने। साल 1948 तक वह अपने पति के साथ रामपुर में रहीं। उस समय में उन्होंने कई किताबों का अनुवाद किया। थियेटर उद्योग में हमेशा से पुरुषों का वर्चस्व रहा है लेकिन कुदसिआ बेगम ने हिम्मत करके इस क्षेत्र में ना सिर्फ अपना हाथ आजमाया बल्कि खूब नाम भी कमाया। उनके नाट्य रूपांतरण “चाचा चक्कन के कारनामे” के लिए देश के राष्ट्रपति डॉ जाकिर हुसैन ने भी उनकी खूब प्रशंसा की और उन्हें बच्चों के लिए आगे लिखने को प्रोत्साहित भी किया। उनके पति हमेशा उनका साथ देते थे और उन्हें लिखने और नाटकों का आसान भाषा में अनुवाद करने के लिए हमेशा प्रेरित करते थे। जब वह दिल्ली में थीं तब, भारत की सांस्कृतिक अगुआ कमला चट्टोपाध्याय से भी उनके काफी अच्छे संबंध थे। इतने सारे बुद्धिजीवी और कलाकारों के बीच उनकी प्रतिभा को एक नई दिशा मिली। वह‌ कई सांस्कृतिक निकायों का हिस्सा भी रहीं। जब उनकी उम्र के लोग स्वतंत्रता लड़ाई से जूझ रहे थे तब उन्होंने भारतीय थियेटर का विकास करने का फ़ैसला किया।

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1954 में उनकी मुलाकात भारत के एक प्रख्यात थियेटर के उर्दू निर्देशक हबीब तनवीर से हुई उन्होंने अपने भारत छोड़ने से पहले उन्हें वादा किया कि वह वापस आएंगे और उनके थियेटर को स्थापित करने में उनकी मदद करेंगे। बाद में उन दोनों ने मिलकर हिंदुस्तानी थियेटर की स्थापना की। कुदसिआ ने कई संस्कृत और विदेशी नाटकों का उर्दू और लोक भाषाओं में अनुवाद किया। 1957-58 के दौरान हिंदुस्तानी थियेटर दिल्ली में एक पेशेवर शहरी थियेटर बन गया। भारत में थियेटर की दुनिया की शुरुआत करने वाली वह पहली महिला थीं। उन्होंने इंडियन कम्युनिस्ट्स मूवमेंट में भी हिस्सा लिया था। उनका नाटक “अजर का ख्वाब” भाषा अवरोध और अनुवाद पर प्रमुख नाटकों में से एक था। उन्होंने अपने 12 साल के करियर में 20 नाटकों का अनुवाद किया। वह अपने समय की काफी़ प्रगतिशील औरत थीं। 1960 में वह महज 46 साल की उम्र में इस दुनिया को अलविदा कह गईं। उनकी मौत से पूरा उर्दू थियेटर स्तब्ध रह गया था। उनके प्रमुख लेखन में मिट्टी की गाड़ी (संस्कृत से अनुवादित), शकुंतला (संस्कृत से अनुवादित), खालिद की खाला, इत्यादि शामिल हैं।

स्वतंत्रता संग्राम के दौरान वह थियेटर में पहली महिला थीं जिन्होंने कई माध्यमों से कला में सहयोग दिया। वह एक मजबूत, प्रतिभावान और आत्मविश्वास से लबरेज़ शख्सियत थीं जिन्होंने हमेशा अपने काम के माध्यम से अपने उम्र के लोगों को कला के प्रति प्रेरित किया। अपनी मौत के इतने समय बाद भी साहित्य में अपने योगदान की वजह से वह अपनी किताबों और नाटकों में जीवित हैं। आगे चलकर कुदेशिया ज़ैदी की बेटी शमा ज़ैदी ने फिल्म ‘गर्म हवा’ के लिए पटकथा लिखी जो भारतीय सिनेमा के शुरुआती दौर की सबसे बेहतरीन फिल्मों में एक गिनी जाती है।

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तस्वीर : फेमिनिज़म इन इंडिया

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