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भारत में कोरोना की दूसरी लहर की स्थिति आज इतना विराट और भयावह रूप ले चुकी है कि अब यह हमारे डॉक्टर, नर्स और अस्पताल कर्मचारियों के मानसिक स्वास्थ्य पर असर कर रही है। जबकि कोरोना से लड़ते हुए पिछले साल आम जनता ख़ासकर महिलाओं की मानसिक स्वास्थ्य की बात हो रही थी। वहीं आज लगातार काम करने और दवा, ऑक्सीजन और बेड की कमी के कारण अपने मरीजों को न बचा पाने की असहायता और अपराधबोध से लड़ते स्वास्थ्यकर्मियों की तस्वीरें निश्चित ही हमें विचलित कर रही हैं। इस महीने में एक युवा डॉक्टर की आत्महत्या से हुई मौत कहीं न कहीं आने वाले संकट की ओर इशारा कर रही है। कोरोना महामारी की दूसरी लहर के बाद दिल्ली के एम्स अस्पताल में अब तक तीन डॉक्टरों की आत्महत्या से मौत हो चुकी है। भारत में पहले से ही सुचारु रूप से चल रहे अस्पताल, डॉक्टर, नर्स और पैरामेडिकल कर्मचारियों की भारी कमी थी। ऐसे में उनका बुनियादी जरूरतों के कमी के बीच लगातार महामारी जैसे परिस्थिति का सामना करना एक नई चुनौती के रूप में उभर रही है।  

ऑर्गनाइसेशन फॉर इकनॉमिक कोपॅरेशन एण्ड डेवलपमेंट (OECD) के साल 2019 के आंकड़े अनुसार न्यूज़ीलैंड और अमरीका जैसे देशों में 3.4 और 2.6 डॉक्टर प्रति 1000 निवासी हैं, वहीं भारत में यह संख्या 0.8 है। अस्पताल में बेड या बिस्तर की बात करें, तो जापान में सर्वाधिक 13 अस्पताल बेड, अमरीका में 2.9 और न्यू ज़ीलैंड में 2.6 प्रति 1000 निवासी उपलब्ध है। वहीं, भारत में यह 0.5 बेड प्रति 1000 निवासी है। इस संस्था के अनुसार अमरीका में 11.9, न्यूज़ीलैंड में 10.3 और भारत में 1.5 नर्स प्रति 1000 निवासी उपलब्ध है। पहले से लचर स्वास्थ्य व्यवस्था में स्वास्थ्य कर्मचारियों को महामारी के शुरुआत से ही पीपीई किट जैसे अति आवश्यक जरूरतों की कमी के बीच अपना काम जारी रखना पड़ा। आज ना सिर्फ उनके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य का जोखिम बढ़ रहा है बल्कि जनता के रोष और सरकार के दबाव का भी उन्हें सामना करना पड़ रहा है।

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दवा, ऑक्सीजन और बेड की कमी के कारण अपने मरीजों को न बचा पाने की असहायता और अपराधबोध से लड़ते स्वास्थ्यकर्मियों की तस्वीरें निश्चित ही हमें विचलित कर रही हैं।

पिछले दिनों शिवसेना पार्षद और नागरिक शिक्षा समिति की अध्यक्ष संध्या दोषी का मुंबई के भगवती अस्पताल में डॉक्टरों के साथ दुर्व्यवहार की घटना हो या डॉक्टरों द्वारा ऑक्सीजन की कमी को बताने पर उत्तर प्रदेश प्रशासन का दबाव, ये सिद्ध करता है कि स्वास्थ्यकर्मियों पर केवल महामारी का ही नहीं बल्कि आला अफसरों और सत्ता के निर्देश की खानापूर्ति का भी दबाव है। देश की राजधानी में अपोलो अस्पताल में एक कोरोना मरीज़ की मौत के बाद उनके रिश्तेदारों द्वारा किए गए हमले में डॉक्टरों सहित आठ कर्मचारियों के घायल होने की खबरों पर भी कोई सवाल नहीं उठाए गए। एक ओर हमारे स्वास्थ्य कर्मचारियों से दुर्व्यवहार, मारपीट या उनका सामाजिक तौर पर बहिष्कार करने की घटनाएं महामारी की शुरुआत से ही सामने आती रहीं। वहीं दूसरी ओर नेताओं का जनता को अलग-अलग तरीके से मुद्दे से भटकाने की कोशिश अपने चरम सीमा पर पहुंच गई है। बीते दिनों गुजरात से इंदौर को भेजे ए ऑक्सीजन टैंकर को अस्पताल पहुंचने से पहले ही रोककर भाजपा नेताओं में फोटो खिंचवाने के लिए होड़ मचना पूरी मानवता को शर्मसार करने वाली घटना थी।

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द इंडियन एक्स्प्रेस में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार एक वर्चुअल सम्मेलन में कार्डियक सर्जन डॉ देवी शेट्टी ने डॉक्टरों की मानसिक स्थिति की बात करते हुए कहा कि वे डॉक्टर जो महामारी की पहली लहर के शुरुआत से काम कर रहे हैं, वे मानसिक रूप से थक चुके हैं। वे बर्नआउट और संक्रमण का भी शिकार हो रहे हैं। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि आज देश भर में कोविड मरीज ऑक्सीजन संकट का सामना कर रहे हैं। लेकिन उनके सामने अगली बड़ी चुनौती इलाज के लिए डॉक्टरों और नर्सों की कमी होगी। उन्होंने बताया कि मई में बेहद गर्मी हो सकती है और इसलिए सबसे स्वस्थ डॉक्टर को भी कोविड आईसीयू में चार से पांच घंटे तक काम करने में मुश्किल होती है। डॉ शेट्टी ने कहा कि कोविड के किसी भी आयु के 5 प्रतिशत रोगियों को आईसीयू बिस्तरों की आवश्यकता होती है। इसका सीधा अर्थ है कि आज देश में 80,000 आईसीयू बिस्तरों की प्रतिदिन मांग है। उन्होंने कोरोना महामारी से निपटने के लिए 5 लाख अतिरिक्त आईसीयू बेड बनाने, तत्काल 2 लाख नर्सों की भर्ती, पीजी प्रशिक्षण पूरा करने वाले चिकित्सकों को परीक्षा छोड़ आईसीयू में काम करने और टायर-II एवं टायर-III शहरों में अतिरिक्त डॉक्टर और नर्सों की नियुक्ति के सुझाव दिए।  

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वेतन या आर्थिक प्रोत्साहन की बात करें, तो जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, पश्चिम बंगाल जैसे कुछ राज्यों ने कहीं जूनियर डॉक्टरों और इंटर्न का वेतन बढ़ाया, तो कहीं एमबीबीएस छात्रों, संविदा डॉक्टरों, जूनियर या वरिष्ठ रेसिडेन्ट डॉक्टरों को जून के महीने तक आर्थिक प्रोत्साहन प्रदान करने की घोषणा की। गौरतलब हो कि इन घोषणाओं और योजनाओं से निजी अस्पतालों में काम कर रहे हजारों डॉक्टर और स्वास्थ्य कर्मचारी लाभ उठा पाएंगे या नहीं यह अब भी निश्चित नहीं है। केंद्र और राज्य सरकारों ने कोरोना महामारी में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे उन लाखों आशा कर्मचारी, एम्बुलेंस ड्राइवर और लैब में काम कर रहे टेकनीशियन एवं पैथोलॉजिस्ट जैसे फ्रन्टलाइन कर्मचारियों को भी अनदेखा किया है।

प्रधानमंत्री कार्यालय ने जानकारी दी कि कोरोना महामारी के दूसरी लहर से निपटने के लिए अब अंतिम वर्ष के एमबीबीएस छात्रों को अपनी फैकल्टी की देखरेख में टेलीकंसलटेशन और सामान्य कोविड मामलों की निगरानी जैसी सेवाएं प्रदान करने के लिए लगाया जाएगा। मेडिकल इंटर्न को भी उनके फैकल्टी की देखरेख में काम में लगाया जाएगा। सरकार ने बताया कि कोरोना के प्रबंध में न्यूनतम 100 दिनों के काम के लिए साइनअप करने और इस अवधि को सफलतापूर्वक पूरा करने वाले पेशेवर को प्रधानमंत्री का प्रतिष्ठित राष्ट्रीय सेवा सम्मान दिया जाएगा। हालांकि सरकार कोविड -19 से लड़ने में लगे स्वास्थ्य कर्मचारियों के लिए बीमा योजना के तहत कवर किए जाने की दोबारा बात की लेकिन ना ही इसमें राशि की पुष्टि की गई और ना मानदंड और प्रक्रिया की।

भारत में अब तक कोविड-19 से मरने वाले न कर्मचारियों की संख्या का कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं है लेकिन इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के अनुसार भारत में कोरोना महामारी की शुरुआत से अब तक कम से कम 739 एमबीबीएस डॉक्टरों की जान जा चुकी है। अप्रैल 2020 में कोरोना से लड़ने के लिए आपातकालीन प्रतिक्रिया और स्वास्थ्य प्रणाली की तैयारी के लिए सरकार ने 15000 करोड़ रुपए के पैकेज की घोषणा की थी। इसके बावजूद आज तक हम दवाइयों, ऑक्सिजन और बेड की कमी को दूर नहीं कर पाए हैं। ना ही पीएम केयर्स में लाखों सरकारी कर्मचारी, विभिन्न संस्थाओं और कंपनियों के दिए गए राशि पर सरकार पारदर्शी है। निश्चित ही कोरोना की तीसरी लहर की आशंका और बुनियादी जरूरतों की कमी आम जनता की तकलीफ को और बढ़ा रही है।

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तस्वीर साभार : BBC

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