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कोरोना महामारी की दूसरी लहर ने भारत को सबसे ज़्यादा संक्रमण की संख्या के साथ विश्व पटल पर पहले स्थान पर पहुँचा दिया। बीते कई हफ़्तों से लगातार कोरोना के बढ़ते संक्रमण ने शासन-प्रशासन की लचर व्यवस्था और नदारद योजना की पोल खोल दी। लेकिन इसी बीच दबे पाँव से कोरोना के संक्रमण की घटने की खबर भी सुर्ख़ियाँ बनने लगी है, जिसके हवाले से मौजूदा सरकार एक़बार फिर अच्छे दिन के नामपर अपनी पीठ थपथपाने में जुट रही है। पर उत्तर प्रदेश और बिहार राज्य में गंगा के किनारे उतराती लाशें कुछ और ही कहानी बयाँ कर रही है। हिंदी अख़बार अमर उजाला में बीते गुरुवार को खबर आयी कि ‘गाजीपुर जिले के करंडा थाना क्षेत्र के चोचकपुर शवदाह स्थल के पास 15 शव दिखने से गांव में हड़कंप मच गया। पुलिस ने आठ शवों को बाहर निकलवाया। जबकि सात शव गंगा की तेज धारा में बह गए। बृहस्पतिवार देर शाम गांव के कुछ लोग अंतिम संस्कार के लिए शव लेकर घाट पर गए थे। इसी दौरान उनकी नजर गंगा में किनारे उतराए शवों पर पड़ी। लोगों ने तत्काल इसकी जानकारी स्थानीय पुलिस को दी। बाद में पुलिस ने मजदूरों की मदद से आठ शवों को तो बाहर निकलवा लिया, लेकिन सात शव अधिक गहरे पानी में होने के कारण गंगा की धारा में बह गए। पुलिस ने चार शवों का बृहस्पतिवार और चार का अंतिम संस्कार शुक्रवार को कराया।‘

ज़ाहिर है अच्छे दिन के जुमलों से सात साल जनता को मूर्ख बनाती मौजूदा सरकार ने बेहद बारीकी से देश की बुनियादी व्यवस्थाओं (स्वास्थ्य, शिक्षा और रोज़गार) को खोखला कर दिया है, जिसका भयानक परिणाम हम लगातार कोरोना की दूसरी लहर में देख रहे है। सरकार अस्पतालों और अस्पतालों के बाहर तड़पते लोगों की जान बचाने में असफल रही। लगातार ऑक्सीज़न, ज़रूरी दवाओं और डॉक्टर की कमी के चलते कोरोना की बजाय लोग बुनियादी सुविधाओं के अभाव में लोगों को अपनी जान गँवानी पड़ी। इन लोगों में ग्रामीण क्षेत्रों के वे भी लोग शामिल रहे जिन तक कोरोना की जाँच तक सही समय पर नहीं पहुँच सकी और उनकी मौत रहस्यमी बनती गयी।

हर दिन गंगा घाट के किनारे लाशों के ढेर की खबरें और इसकी भयानक तस्वीरें सामने आ रही है और सरकार के पास कड़ी निंदा, आश्वासन और जुमलों के अलावा कुछ नहीं बचा। नदी के किनारे उतराती लाशों पर जलशक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने ट्वीट किया, जिसमें उन्होंने घटना को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए गंगा की निर्मलता और अविरलता के लिए मोदी सरकार की प्रतिबद्धता दोहरायी। इसके बाद, नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा (एनएमसीसी) के प्रमुख राजीव रंजन मिश्र ने गंगा पथ के सभी जिला कलेक्टरों को पत्र लिख दिया कि डीएम पक्का करें कि गंगा में लाशें ना फेंकी जाएं।

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मानवता की शर्मसार करती ये तस्वीरें सरकार की नाकामी का ज़िंदा उदाहरण है, जो जीते-जी तो क्या जनता को मरने के बाद भी बुनियादी सुविधाएँ, सम्मान और अधिकार देने में असमर्थ है। द प्रिंट में छपी एक खबर के अनुसार गंगा में फेंकी ज्यादातर लाशें ‘प्रशासन द्वारा’ डाली गई है, यह बात केंद्रीय मंत्री या उनके मातहत को नहीं पता, इस पर भरोसा करना थोड़ा कठिन है। बह रहे ज्यादातर शवों पर कोई कफन नहीं है, अगर गांव के लोग बड़ी संख्या में भी शव का जलप्रवाह कर रहे हैं तो भी बहाने से पूर्व संस्कार होता है और कफन पहनाया जाता है।वास्तव में अस्पताल में कोविड से होने वाली मौतों के अंतिम संस्कार का जिम्मा पुलिस का है, शव परिवार को नहीं सौंपा जाता उन्हें सिर्फ चेहरा दिखाया जाता है और कई बार तो चेहरा भी नहीं दिखाया जाता सिर्फ सूचना दी जाती है। स्थानीय पुलिस शवों के अंतिम संस्कार के लिए जिन एंबुलेंस वालों की सेवाएं लेती है, उन्हें इस काम की तय रकम मिलती है। तय रकम में पूरी क्रिया करने के बजाए उसे नदी में बहा देना ज्यादा आसान काम है। यूपी और बिहार में गंगा में जलप्रवाह की गई लाशें ‘अस्पतालों से सीधे लाई’ गई थी।

गंगा में लाशें बहने का दूसरा बड़ा कारण अंतरराष्ट्रीय शहर बनारस है। दो प्राचीन शवदाह घाट मणिकर्णिका और हरीशचंद्र घाट पर अत्यधिक भीड़ है। मणिकर्णिका घाट में लाशें जलने के विजुअल अंतरराष्ट्रीय मीडिया के ‘पसंदीदा’ विजुअल हैं। शवदाह की भीड़ बनारस के स्थानीय लोगों की ही है, शहर के आसपास वाले इलाके शव लेकर बनारस नहीं पहुंच रहे, एक तो उनके भीतर डर समाया हुआ है दूसरा पुलिस प्रशासन भी अंतिम संस्कार के लिए वाराणसी जाने से रोक रहा है ताकि स्थिती हाथ से ना निकले।

आपदा का ये सुअवसर शासन-प्रशासन के हिस्से में ही है और जनता के हिस्से में मरने के बाद ही सम्मान हिस्से में नहीं है।

शहर में शव लेकर घुसने पर लगी रोक का नतीजा यह हुआ कि जो सक्षम था वह मिर्जापुर या मुगलसराय या गाजीपुर चला गया। जो सक्षम नहीं था उसने शहर के बाहर ही गंगा किनारे अंतिम संस्कार करने की कोशिश की, अब हर जगह तो चिता के लिए लकड़ियां मिलती नहीं तो मछुआरे को पैसा देकर शवों को गंगा में बहा दिया गया। पिछले साल देश के प्रधानमंत्री ने ‘आपदा को अवसर में बदलने’ की बात कही थी। इसके साथ ही, ताली-थाली बजाने, दिया जलाने और पीएम केयर फंड जुटाने जैसे और भी कई प्रयोग किए गए थे। इसके बाद, जब कोरोना की दूसरी लहर से दुनियाभर के देश जूझ रहे थे तब भारत विश्वगुरु के सपने लिए अपनी तैयारी की बजाय वैक्सीन निर्यात में जुटा हुआ था, क्योंकि सरकार की भले ही कोई योजना और नीति न तैयार हो पर आपदा को अवसर में बदलने के लिए शासन-प्रशासन सब कमर केस हुए थे और अंत में हुआ भी यही।

बीबीसी हिंदी की खबर के अनुसार गंगा नदी के किनारे बसा बक्सर ज़िला, बिहार और उत्तर प्रदेश का सीमावर्ती ज़िला है। इसके उत्तर में यूपी का बलिया, दक्षिण में बिहार का रोहतास ज़िला, पश्चिम में यूपी का ग़ाज़ीपुर और बलिया ज़िले तथा पूरब में बिहार का भोजपुर ज़िला लगता है। बक्सर प्रशासन ने 10 मई तक 30 से 40 लाशें होने की बात कही थी। लेकिन चौसा श्मशान घाट पर मिली 71 लाशों का पोस्टमार्टम हुआ है। दैनिक भास्कर अख़बार के बक्सर संस्करण में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक़ श्मशान घाट पर 15 से 20 हज़ार ख़र्च हो रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक़ बक्सर के श्मशान घाटों पर एंबुलेंस से शव उतारने के लिए 2000, लकड़ी व अन्य सामान के लिए 12 हज़ार रुपए लग रहे हैं।

कोरोना की दूसरी लहर में बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव और कालाबाज़ारी के साथ-साथ अंतिम संस्कार के बढ़ते खर्च ने देश के गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार को तोड़ कर रख दिया है। आपदा को अवसर में बदलकर सभी अपनी जेब भरने में लगे हुए है और सरकार अपनी छवि चमकाने में। वाक़ई में आपदा का ये सुअवसर शासन-प्रशासन के हिस्से में ही है और जनता के हिस्से में मरने के बाद भी सम्मान हिस्से में नहीं है। नदियों में और नदी के किनारे उतराती लाशें ‘आपदा के अवसर’ की सच्चाई बयाँ कर रही है और ये बता रही है कि ये जनता के लिए तबाही और सत्ता के लिए अवसर है।  

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तस्वीर साभार : scmp.com

Swati lives in Varanasi and has completed her B.A. in Sociology and M.A in Mass Communication and Journalism from Banaras Hindu University. She has completed her Post-Graduate Diploma course in Human Rights from the Indian Institute of Human Rights, New Delhi. She has also written her first Hindi book named 'Control Z'. She likes reading books, writing and blogging.

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