हमेशा से ही भारत का इतिहास लिखनेवालों ने उत्तर पूर्व भारत के स्वतंत्रता सेनानियों और समाज सुधारकों को वह स्थान नहीं दिया है जिसके वे हकदार हैं। ठीक उसी प्रकार से उत्तर-पूर्व भारत की महिलाओं के योगदान को भी भारत के इतिहास की मुख्यधारा में वह पहचान नहीं मिली, जिसकी वे हक़दार थीं लेकिन फिर भी उत्तर – पूर्व की इन महिलाओं के योगदान को भूलकर भी इतिहास से नहीं मिटाया जा सकता है। आइए, जानते हैं उत्तर-पूर्व भारत से आने वाली पांच ऐसी ही महिलाओं के बारे में जिन्हें इतिहास की मुख्यधारा में शामिल नहीं किया गया।
1. सती जॉयमति

जॉयमति एक अहोम राजकुमारी थीं और बाद में वह राजा गदाधर (गदापानी/सुपातका) सिंघ की रानी बनी। असम के राजाओं को तो इतिहास में जगह मिली लेकिन जॉयमति की वीरता को हमेशा नज़रअंदाज़ किया गया। वह असम में अपने राज्य और अपने पति के लिए दिए गए बलिदान के लिए जानी जाती हैं। भ्रष्टाचार, उत्पीड़न से मुक्त राज्य स्थापित करने के लिए, उन्होंने लोरा राजा के हाथों अपना जीवन बलिदान कर दिया। राजगद्दी के लालच में जब जब लोरा राजा और उनके सिपाही जॉयमति के पति को पकड़ने आए तो उनके पति तो बचकर निकलने में सफल रहे लेकिन जॉयमति को बंधक बना लिया गया। एक कांटेदार पौधे से बांधे जाने के बाद उन्हें असम के शिवसागर जिले के जारेंग पत्थर में लगातार अमानवीय शारीरिक यातना का सामना करना पड़ा। उन्होंने अपनी अंतिम सांस तक अपने राज्य और पति की रक्षा की कोशिश की। वह जल्द ही बहादुरी की प्रतीक बन गईं। उनका निस्वार्थ बलिदान, साहस और सच्चाई उन्हें असम के इतिहास का एक नायक बनाता है। हर साल 27 मार्च को असम में सती जॉयोमति दिवस का आयोजन किया जाता है।
2. कनकलता बरुआ

कनकलता बरुआ भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल असमिया नेताओं में से एक थीं। वह भारत छोड़ो आंदोलन का हिस्सा थीं और उन्होंने निडरता से ब्रिटिश शासन के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी। मृत्यु बहिनी के सदस्य के रूप में उन्होंने अन्य नेताओं के साथ मिलकर ब्रिटिश शासन के खिलाफ़ गोहपुर पुलिस स्टेशन के शीर्ष पर भारतीय झंड़ा फहराने के लिए विरोध जुलूस का नेतृत्व किया था। 20 सितंबर, 1942 का वह दिन था जब उन्होंने महिला जुलूस का नेतृत्व किया और वह भारतीय ध्वज को हाथ में लिए पुलिस स्टेशन की ओर चल पड़ी। जब वह पुलिस स्टेशन की ओर बढ़ रही थीं तब पुलिस ने उन्हें गोली मार दी। कनकलता महज़ 17 साल की उम्र में ही शहीद हो गई थी। उन्होंने पांच साल की उम्र में ही अपनी मां और 13 की उम्र में पिता को खो दिया था। मरणोपरांत उन्हें ‘शहीद’ और ‘ बीरबाला’ की उपाधि दी गई थी। निस्संदेह ही कनकलता भारतीय महिलाओं के लिए एक प्ररेणास्त्रोत हैं।
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3. चंद्रप्रभा सैकियानी

एक लेखक से लेकर शिक्षक, एक समाज सुधारक और महिला अधिकार कार्यकर्ता के रूप में चंद्रप्रभा सैकियानी का योगदान अमूल्य है। उनका जन्म 16 मार्च 1901 में असम के कामरूप जिले में हुआ था। वह असम प्रादेशिक महिला समिति की संस्थापक थी। उन्होंने असम में पर्दा प्रथा को दूर करने में योगदान दिया था और मात्र 13 साल की उम्र में उन्होंने प्राइमरी स्कूल खोला। उन्होंने महिलाओं की शिक्षा पर जोर देने के साथ-साथ इसकी दिशा में भी काम भी किया। वह पहली महिला थी जिन्होंने प्रदेश भर में साइकिल पर यात्रा कर महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया था। चंद्रप्रभा ने कम उम्र में एक उम्रदराज व्यक्ति के साथ शादी के लिए मना कर दिया था। बाद में, उन्होंने लेखक दंडीनाथ कलिता से सागाई कर ली। हालांकि, दंडीनाथ कलिता ने दूसरी महिला से शादी कर ली थी। जिसके बाद चंद्रप्रभा ने अपने दम पर अपने बेटे की परवरिश की।
साल 1918 में असम छात्र सम्मेलन के असम सत्र के दौरान उन्होंने अफीम के दुष्प्रभावों के बारे में बात की और इसके प्रतिबंध की मांग की। वह जाति व्यवस्था की विरोधी थी और उन्होंने धार्मिक स्ठलों में भी महिलाओं के प्रवेश का समर्थन किया। साल 1925 में उन्होंने असम साहित्य सभा में नागांव अधिवेशन में लैंगिक समानता और न्याय पर भाषण दिया। साल 1930 में उन्होंने असहयोग आंदोलन में भाग लिया और जेल भी गई। साल 1947 तक वह कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ता के तौर पर कार्यरत रहीं और साल 1972 में उन्हें पद्मश्री से नवाज़ा गया।
4. मीना आगरवाला

मीना आगरवाला 50 से अधिक सालों तक तेजपुर महिला समिति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रही थीं। चंद्रप्रभा सैकियानी से प्रेरित होकर उन्होंने जीवनभर महिलाओं के अधिकारों के लिए काम किया। उन्हें प्यार से ‘मंबू’ कहा जाता था। वह साल 1950 के दशक में ज़िला समाज कल्याण बोर्ड की अध्यक्ष थी। उन्होंने तिब्बती शरणार्थियों का स्वागत करने के लिए महिलाओं को संगाठित किया और साल 1959 में चीन के अत्याचारों से बचने में उनकी मदद की। साल 1962 में उन्होंने और उनकी टीम ने चीन के आक्रमण के खिलाफ राष्ट्रीय रक्षा कोष के लिए फंड जुटाया। उन्होंने सिर्फ अपने ही समुदाय के लोगों के लिए काम नहीं किया बल्कि वह मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों और तीन तलाक, मेहर के खिलाफ खड़ी हुई। उन्होंने व्यापक रूप से महिलाओं की शिक्षा, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं की शिक्षा की वकालत की। मीना अग्रवाल का निधन 24 जुलाई 2014 को हुआ था।
5. सिल्वरिन स्वेर

सिल्वरिन स्वेर का जन्म खासी समुदाय में शिलांग में हुआ था। वह मेघालय राज्य की सामाजिक कार्यकर्ता थी। उन्होंने अपना पूरा जीवन उत्तर पूर्व भारत में महिलाओं और युवा लड़कियों के लिए सामाजिक कार्यों में लगा दिया। वह मेघालय राज्य की पहली शख्सियत थी जिन्हें पद्मश्री से नवाज़ा गया था। वह गर्ल्स गाइड मूवमेंट की प्रशिक्षक और सलाहकार बनने वाली पहली खासी महिला थीं। साल 1944 में उन्हें दूसरे विश्व युद्ध के दौरान राशन के सहायक नियंत्रक के रूप में नियुक्त किया गया था। शुरू में वह चांगलांग तिरप में शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान की सदस्य थी और बाद में वहां की प्रधानाचार्या के रूप में उन्होंने काम किया। उन्होंने मेघालय में आदिवासी महिलाओं के लिए काफी काम किया। सामाजिक कार्यों में उनके लंबे योगदान के बाद 103 साल की उम्र में 1 फरवरी 2014 को उनका निधन हो गया।
भले ही भारत की मुख्यधारा ने इन महिलाओं को भुला दिया हो, लेकिन उत्तर- पूर्व भारत में महिलाओं के लिए इनके काम और योगदान को नहीं भुलाया जा सकता है।
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