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आजकल अखबारों में कभी खबरें आ रही हैं कि सरकार ने कहा है, “ऑक्सिजन की कमी से कोरोना की दूसरी लहर में एक भी जान नहीं गई”, तो कभी राज कुंद्रा का केस मीडिया में छाया होता है। इस बीच मीडिया की सुर्ख़ियों से हर वह बुनियादी सवाल ग़ायब जिससे देश का गरीब और मध्यमवर्गीय तबका जूझने को मजबूर है। दबे पांव बढ़ती महंगाई पर कहीं कोई चर्चा नहीं, कोई प्रदर्शन नहीं क्योंकि मीडिया अभी भी बढ़ती महंगाई को विकास के लिए नागरिकों की क़ुर्बानी के रूप में ही दिखाने की कोशिश कर रही है।  

कोरोना महामारी की पहली लहर में बेरोज़गार होने के बाद हम लोगों को मुंबई से अपने परिवार सहित वापस अपने गांव आना पड़ा। उस दौरान कई परिवार हमलोगों के साथ प्रवासी मज़दूर के रूप में शहर से गांव की तरफ़ आए थे, जिसमें कुछ ही दोबारा शहर की तरफ़ रोज़गार के लिए लौट पाए। मीडिया में भी ये खबरें ख़ूब सुर्ख़ियों में आई। लॉकडाउन के दौरान हमलोगों का परिवार भयानक आर्थिक संकट से जूझ रहा था। दो वक्त की रोटी परिवार के लिए एक बड़ी समस्या बन चुकी थी। इसके बाद मेरे पति दोबारा मुंबई गए और वहां रिक्शा चलाने का काम शुरू किया लेकिन इस बार परिवार को साथ ले जाने की उनकी हिम्मत नहीं हुई, क्योंकि उन्हें मालूम था कि तंगी के इस दौर में शायद ही वह मुंबई में अपने परिवार को दो वक्त का खाना खिला पाए।

अभी परिवार पहली लहर के संकट से उबर भी नहीं पाया था कि दूसरी लहर का प्रकोप बढ़ने लगा और दूसरी लहर में सर्दी-जुकाम और एहतियात के नाम पर मास्क, सेनेटाइज़र जैसे अनेक उत्पादों ने एक़बार फिर बुरी तरह घर का बजट बिगाड़ दिया। कोरोना महामारी के साथ-साथ अब गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों में महंगाई एक बड़ी समस्या बनती जा रही है। आए दिन बढ़ते पेट्रोल-डीज़ल के दाम से सब्ज़ी, राशन और ज़रूरत का हर सामान महंगा होता जा रहा है। ये महंगाई आर्थिक तंगी से टूटे हम जैसे ग्रामीण क्षेत्रों के परिवारों के लिए किसी महामारी से कम नहीं है। पहले ही परिवार ने अपनी बुनियादी ज़रूरतों में काफ़ी कटौती कर ली, लेकिन लगातार बढ़ती महंगाई परिवार के भरण-पोषण को भी प्रभावित करने लगी है।  

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कुछ जानकार मानते हैं कि ग्रामीण इलाकों में महंगाई बढ़ने का असर कम ही देखने को मिला है। हालांकि, बीते 19 महीनों में जनवरी में पहली बार गांवों में महंगाई दर शहरी इलाकों की महंगाी दर के मुक़ाबले अधिक तेज़ी से बढ़ी है। ग्रामीण क्षेत्रों में महंगाई को लेकर विशेषज्ञों का अनुभव किन आधारों पर है इस पर कुछ भी कहना मुश्किल है। ये कहना एक तरह से सही भी है, क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले जिन गरीब परिवारों की रसोई में पौष्टिक राशन ने बरसों पहले आना छोड़ दिया हो तो वहां महंगाई से क्या ही असर पड़ेगा। कहीं न कहीं ग्रामीण क्षेत्रों में वंचित समुदायों के कई परिवार ऐसे हैं, जो ग़रीबी में ज़िंदगी बिताने को मजबूर हैं। मैं बनारस से दूर चित्रसेनपुर नाम के गांव में मुसहर समुदाय के बच्चों को पढ़ाने जाती हूं। महादलित कहे जाने वाली इस मुसहर जाति को आज भी जाति के वर्गों में सबसे निचले पायदान पर रखा गया है। चूंकि ये जाति व्यवस्था के सबसे निचले पायदान पर हैं तो ज़ाहिर है जातिवादी समाज ने इनकी प्रस्थिति भी हमेशा निम्न स्तर की बनाए रखी। गांव में अन्य जाति के लोग मुसहर बस्ती में जाने को बुरा काम समझते हैं क्योंकि जातिगत समीकरण में मुसहर बस्ती में जाना या उनके साथ रहना, उनके साथ समान व्यवहार करना उनकी शान के ख़िलाफ़ बताया गया है।  

दबे पांव बढ़ती महंगाई पर कहीं कोई चर्चा नहीं, कोई प्रदर्शन नहीं क्योंकि मीडिया अभी भी बढ़ती महंगाई को विकास के लिए नागरिकों की क़ुर्बानी के रूप में ही दिखाने की कोशिश कर रही है।  

इस गांव में मुसहर बस्ती के पास अन्य मुसहर समुदाय की ही तरह अपनी कोई ज़मीन नहीं है, इसलिए ये दूसरों के खेतों और ख़ासकर ईंट फ़ैक्ट्री में मज़दूरी का काम करते हैं। शिक्षा, रोज़गार तो क्या पोषण भी इन समुदाय के पास दुर्लभ-सा है। यहां सभी परिवारों की स्थिति रोज़ कुंआ खोदकर पानी पीने की है। ऐसा नहीं कि पूरे गांव की स्थिति यही है। गांव में शिक्षा, रोज़गार, राशन और विकास से जुड़ी तमाम सरकारी योजनाएं लोगों तक पहुंच रही है, लेकिन ये सब मुसहर समुदाय तक आते-आते ख़त्म हो जाती है या ये कहें कि जानबुझकर ख़त्म कर दी जाती हैं जिससे मुसहर बस्ती में मुख्यधारा के लोगों को जाना न पड़े।

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ध्यान देने वाली बात ये भी है कि गांव में मुसहर बस्ती की जो जगह है वह भी गांव से एकदम बाहर होती है, जिससे न चाहते हुए भी ये समुदाय मुख्यधारा से सीधे कट जाता हैं। ऐसे में जब हम महंगाई की बात करते हैं तो सत्रह साल की रानी (बदला हुआ नाम) की माँ बसुना कहती हैं, “हमलोग अभी भी दूसरे के खेत में फसलें कटने के बाद वहां खेत में पड़े आलू, गेहूं और चावल जैसी सामग्रियों से पेट भरते हैं। लोग हमलोगों को खेत में बीनने के लिए बुलाते हैं जिससे उनका खेत साफ़ हो जाए और हमलोग अपने पेट के लिए वहां जाते हैं। खेत से मिलने वाली चीजों से ही हम लोग अपना चूल्हा जलाते हैं। घर में कोई आमदनी का ज़रिया नहीं है इसलिए खाना ज़्यादातर बिना तेल के उबालकर ही बनाया जाता है और हमलोगों के घर में न तो मोबाइल फ़ोन है, न टीवी और न कोई गाड़ी इसलिए महंगाई का क्या फ़र्क़ पड़ेगा। बच्चे न तो कहीं पढ़ने जाते है न कोई सुख-सुविधा।”

बसुना जैसी इस बस्ती की सभी महिलाएं और उनके परिवार बिना किसी सुख-सुविधा के नमक रोटी या चावल-पानी खाकर अपना पेट पालते हैं। मुसहर समुदाय की ये स्थिति देखकर हमलोग ये कह सकते हैं कि महंगाई इस समुदाय में कोई समस्या नहीं है, क्योंकि वास्तव में इस समुदाय के लोग शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार जैसी बुनियादी अधिकारों से भी वंचित हैं। इनके पूर्वजों से लेकर ये ख़ुद अब तक मुख्यधारा से नहीं जुड़ पाए, जो अपने आप में एक बड़ी समस्या है।

अब अगर हम बात करें मुसहर के अलावा बाक़ी जाति-समुदायों के ग्रामीण परिवारों की तो वहां महंगाई का सीधा प्रभाव महिलाओं पर पड़ता है। ये हमारे समाज की सच्चाई है कि जेंडर के खांचों के अनुसार अभी भी महिलाओं के हिस्से घर और रसोई की ज़िम्मेदारी है और महंगाई जैसी समस्या से जूझने के लिए उन्हें ही परिवार और रसोई की गणित को संभालना पड़ता है जिसके चलते अधिकतर महिलाएं अपना पेट काटकर अपने परिवार का पेट भरने को वरीयता देती है। जैसे अगर घर में सब्ज़ी आती है तो पहले पति, बच्चे और परिवार के सदस्य को परोसी जाती है जिसके बाद महिलाओं के हिस्से अचार रोटी ही आती है। इतना ही नहीं, परिवार में लड़कियों की शिक्षा में रुकावट और जल्दी शादी की समस्याएं सीधेतौर पर महंगाई की समस्या से जुड़ी हुई हैं। महंगाई की बढ़ती समस्या और इसपर समाज की चुप्पी दोनों की बड़ी चिंता का विषय है, जिसे उजागर करना और इसपर लगातार चर्चा ज़रूरी है क्योंकि ये सिर्फ़ अधिकार का नहीं जीवन का सवाल है।

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तस्वीर साभार : Indian Express

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