इंटरसेक्शनलयौनिकता शादी के बाद बच्चे का दबाव और महिला यौनिकता के सवाल| नारीवादी चश्मा

शादी के बाद बच्चे का दबाव और महिला यौनिकता के सवाल| नारीवादी चश्मा

बच्चे कब पैदा करने और कब नहीं, ये सब इंसान का अपना निजी फ़ैसला है, जिसपर सिर्फ़ और सिर्फ़ उस इंसान का हक़ होता है।

विभिन्नता में एकता अपने भारत देश की पहचान है। यहाँ अलग-अलग धर्म, जाति और संस्कृति के लोग एकसाथ रहते है। इस एकता का मूल सिर्फ़ भारत देश ही नहीं बल्कि कुछ सामाजिक संस्थाएँ भी है, जो कहीं न कहीं अपने देश की पहचान भी है। इसमें से एक है – शादी और परिवार। धर्म, जाति या संस्कृति चाहे जो भी हो, शादी और परिवार मानों अपने भारतीय समाज की सच्चाई है। अब जब बात शादी और परिवार की होती है तो इसके मूल में होते – महिला और पुरुष। क्योंकि अपने पितृसत्तात्मक सामाजिक ढाँचे में सिर्फ़ महिला-पुरुष के जेंडर को ही शादी की संस्था में मान्यता दी गयी है। लेकिन जब हम पितृसत्ता की बात करते है तो यहाँ महिलाओं की स्थिति एक गंभीर विषय बन जाता है, क्योंकि ये महिलाओं के हर पहलुओं को प्रभावित करता है। उनपर हर तरीक़े से अपना शिकंजा कसने और मज़बूत करने की कोशिश करता है।

आज बात करते है, इसी शादी और परिवार के बीच महिलाओं की यौनिकता के मुद्दे पर। अपनी इस चर्चा को आगे बढ़ाने से पहले ये स्पष्ट करना ज़रूरी है कि – यौनिकता का मतलब सिर्फ़ योनि नहीं है, बल्कि यौनिकता का मतलब अपनी पसंद, सहमति और अवसरों से है। शिक्षा, स्वास्थ्य, अधिकार, पसंद, नापसंद या यों कहें कि अपने व्यक्तित्व को अपने अनुसार निखारने, संवारने और जीने की।

आज भी हमारे घर-समाज में शादी होते ही ‘परिवार’ बसाने का दबाव नव-दम्पति पर आ जाता है। ताज्जुब की बात है कि कहने को तो शादी के बाद से ही दो इंसानों के साथ परिवार की शुरुआत हो जाती है, लेकिन वास्तव में जब तक महिला-पुरुष की अपनी संतान नहीं हो जाती, उसे अपना समाज परिवार के रूप में स्वीकार नहीं करता है।

पितृसत्ता ने बेहद बारीकी से महिलाओं की यौनिकता पर शिकंजा कसने के लिए अपना ये तानाबाना तैयार किया है।

माही (बदला हुआ नाम) और नीरज ने चार से पहले अरेंज मैरिज की थी। माही अपनी पढ़ाई पूरा करना चाहती थी और नीरज अपने सेविंग को बढ़ाना चाहता था। दोनों ने आपसी सहमति से यह तय किया था कि जब तक वे आर्थिक और मानसिक रूप से बच्चे के तैयार नहीं होंगें तब तक वे बच्चे पैदा नहीं करेंगें। नीरज से कभी कोई बच्चे का सवाल नहीं करता था। लेकिन हमेशा माही को बच्चे पैदा करने के लिए ताने सुनने पड़ते। उसे कहा जाता –

‘अरे! कब तक मौज़ करोगी अब सीरियस होकर परिवार बढ़ाओ।‘

‘बच्चे पैदा करने की उम्र में किताब और करियर का नारा शोभा नहीं देता।‘

‘बच्चा कर लो तो ज़िंदगी में ठहराव आ जाएगा। सब सेट हो जाएगा अपने आप।‘

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मौज़ करना, शोभा देना और सेट होना, ये सारे शब्द अपने आप में पितृसत्ता की परतों को में लिपटे हुए है, जो हर बार महिलाओं के दायरे उन्हें याद दिलाने के लिए इस्तेमाल किए जाते है। ये कुछ ऐसी बातें जो कभी न कभी हर उस महिला ने सुना होगा जो शादी के तुरंत बाद बच्चे पैदा करने की बजाय ख़ुद को और अपने रिश्ते को समय देने पर विश्वास रखती है। लेकिन दुर्भाग्यवश बच्चे पैदा करने को हमेशा हमारा पितृसत्तात्मक समाज महिलाओं की यौनिकता में शिकंजा कसने के लिए इस्तेमाल करता है।

अजीब है पर अपने समाज की मान्यता यही होती है कि बच्चे पैदा होते ही महिलाएँ ख़ुद-ब-ख़ुद घर की चारहदिवारी में सीमित हो जाएँगीं। जब तक बच्चे बड़े नहीं होते तब तक वो अपने, अपने सपनों और करियर के बारे में सोच भी नहीं सकती, क्योंकि उनपर समाज हर समय ‘अच्छी माँ’ बनने का दबाव क़ायम रखते है। जब बच्चे के बड़े होने के बाद महिला जब अपने करियर के बारे में सोचती है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।वहीं दूसरी तरफ़, जब शादी के तुरंत बाद महिला बच्चे पैदा करने को तैयार नहीं होती तो उसे अजीब-अजीब ताने देकर बच्चे पैदा करने के लिए दबाव बनाया जाता है। इन तानों का मूल होता है, महिलाओं की यौनिकता पर शिकंजा कसना। वो यौनिकता जिसमें महिलाएँ अपने व्यक्तित्व को निखारने, संवारने और जीने की कोशिश कर रही होती है। ज़ाहिर है ये बात पितृसत्ता को तनिक भी नहीं भाती।

पितृसत्ता ने बेहद बारीकी से महिलाओं की यौनिकता पर शिकंजा कसने के लिए अपना ये तानाबाना तैयार किया है, जिसमें कई बार चाहते या न चाहते हुए भी महिलाएँ फंसने को मजबूर हो जाती है और ये दबाव कई बार महिला-हिंसा को बढ़ावा देने की वजह बन जाता है। साथ ही, हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि बच्चे एक बड़ी ज़िम्मेदारी है। जिन्हें सिर्फ़ पैदा करना काफ़ी नहीं, उन्हें स्वस्थ और बेहतर जीवन देना भी ज़रूरी है, जिसके लिए माता-पिता का मानसिक और आर्थिक रूप से तैयार होना ज़रूरी है।

इसलिए बदलते समय के साथ कुछ बातें बदल चुकी है और उनकी बदली बातों को गाँठ बांधना ज़रूरी है। अब हमें ये अच्छे गाँठ बांध लेना चाहिए कि – किसी को शादी करनी है या नहीं। बच्चे पैदा करने है या नहीं। बच्चे कब पैदा करने और कब नहीं, ये सब इंसान का अपना निजी फ़ैसला है, जिसपर सिर्फ़ और सिर्फ़ उस इंसान का हक़ होता है। उसपर दबाव बनाने का हक़ आपको क़तई नहीं है।

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तस्वीर: श्रेया टिंगल फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए

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