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सुप्रीम कोर्ट ने बीते 18 अगस्त को एक अभूतपूर्व फैसला सुनाया किया है। कोर्ट के इस फैसले के मुताबिक अब लड़कियां भी राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA) की परीक्षा में शामिल हो सकेंगी। कोर्ट के इस फैसले के चलते इसी पांच सितंबर को होने वाली एनडीए की परीक्षा में लड़कियां हिस्सा ले पाएंगी। अब ठीक बारहवीं के बाद ही NDA में प्रवेश लेकर तमाम लड़कियां फौज में शामिल हो सकेंगी। आज हम जब हर क्षेत्र में लड़कियों, महिलाओं के समान हिस्से के हक़ की बात करते हैं तो ऐसे में रक्षा का क्षेत्र क्यों अछूता रहे पर क्या यह फै़सला सही मायनों में बराबरी की वकालत करता है? गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला महज़ अंतरिम फैसला है और परीक्षा में बैठने के बाद लड़कियों का अकादमी में प्रवेश अदालत के अंतिम फैसले पर आधारित होगा।

क्या है सुप्रीम कोर्ट का फैसला ?

सालों से सेना में शामिल होने की इच्छा रखनेवाली लड़कियों और उनकी परिजनों की मांग थी कि लड़कियों को भी NDA परीक्षा लेने का हक़ मिले। याचिकाकर्ता कुश कालरा का दावा है कि सिर्फ लैंगिक भेदभाव के कारण ही लड़कियों को एनडीए अकादमी में शामिल होने की अनुमति नहीं है जो कि हमारे संविधान की अनुच्छेद 14 और 15 (समानता), 16 (अवसर की समानता) और 19 (रोज़गार चुनने की स्वतंत्रता) का स्पष्ट उल्लंघन है। लड़कियों को इस प्रकार के अवसर से वंचित रखना रोज़गार और मानवीय मौलिक समानता के अधिकार में स्पष्ट तौर पर भेदभाव है।

वेबसाइट द लाइव लॉ के मुताबिक फैसले पर सुनवाई के दौरान जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस हृषिकेश रॉय ने केंद्र सरकार को फटकार लगाते हुए कहा कि लड़कियों का एनडीए की परीक्षा में शामिल न हो पाना अन्याय है और पिछड़ी सोच का सूचक है। कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि क्या कोर्ट के आदेशों के बगैर आर्मी खुद कोई फैसला नहीं ले सकती? सरकार के सभी तर्कों को नकार कर सुप्रीम कोर्ट ने लड़कियों के लिए NDA मैं प्रवेश के लिए रास्ते खोल दिए हैं और संघ लोक सेवा आयोग को इस फैसले को तुरंत लागू करने के लिए आदेश दिए हैं।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के मुताबिक अब लड़किया भी राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA) की परीक्षा में शामिल हो सकेंगी। इस फैसले के चलते इसी पांच सितंबर को होने वाली एनडीए की परीक्षा में लड़कियां हिस्सा ले पाएंगी।

वेबसाइट लाइव मिंट के मुताबिक कोर्ट में सरकार का पक्ष रखने वाली अडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने दलील दी कि आर्मी में शामिल होने के तीन रास्ते हैं, NDA (नेशनल डिफेंस अकादमी, पुणे), IMA (इंडियन मिलिट्री अकादमी, देहरादून) OTA (ऑफिसर्स ट्रेनिंग अकादमी, चेन्नई), जिसमें से IMA और OTA के ज़रिए महिलाएं आर्मी में शामिल हो सकती हैं। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब महिलाओं के लिए तीन में से दो रास्ते खुल हैं, ऐसे में एक रास्ते को बंद रखना न सिर्फ लैंगिक भेदभाव बल्कि पुरुष और महिला को समान अवसर दिलाने में भी भेद करता है।

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अन्य देशों की फौज में औरतों की क्या स्थिति है ?

साल 2018 के आंकड़ों के मुताबिक भारतीय सेना, एयरफोर्स और नेवी को मिलाकर सिर्फ 3,653 महिलाएं ही हैं। जहां हम महिलाओं को हर क्षेत्र में बराबर देखना चाहते हैं, यह आंकड़ा कुछ अटपटा-सा लगता है। आइए जानते हैं कि दुनिया में कुछ अन्य देशों में फौज में महिलाओं की क्या स्थिति है। बात अगर अमेरिका की करें तो यहां की फौज में 16% महिलाओं की भागीदारी है। अमेरिकी सेना में साल 2013 से महिलाएं आर्मी के कॉम्बैट रोल में भी कार्यरत हैं। कनाडा, डेनमार्क औए इज़रायल जैसे देशों में भी हर कॉम्बैट रोल में भी महिलाओं की भर्ती होती है। नॉर्वे में साल 1938 से महिलाएं फौज में कार्यरत हैं। उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध में भी हिस्सा लिया। साल 1985 में नॉर्वे पहला NATO देश बना जिसमें महिलाएं हर कॉम्बैट रोल में भाग ले सकती हैं। रूस की आर्मी में 10% महिलाएं हैं।

नैशनल जियोग्रफ़ी के मुताबिक साल 2018 में यूके की मिलिट्री ने महिलाओं के कॉम्बैट ग्राउंड रोल्स से प्रतिबंध हटाया था। साल 1989 में कनाडा ने सबमरीन वायरफेयर के अलावा सभी कॉम्बैट रोल्स में महिलाओं के शामिल होने की इजाज़त दे दी थी। साल 2000 में कनाडा में सबमरीन में भी महिलाओं की तैनाती को हरी झंडी दे दी गई। डेनमार्क में साल 1998 से ही महिलाएं सभी कॉम्बैट रोल्स में शामिल हैं। साल 1975 में पहली बार जर्मनी में महिलाओं का दाखिला हुआ मेडिकल यूनिट में। साल 2001 से जर्मनी ने महिलाओं के लिए हर कॉम्बैट यूनिट भी खोल दी। अब जर्मनी की फौज में महिलाएं फाइटर जेट उड़ाती हैं, सबमरीन चलती हैं और पैराट्रूप्स में भी शामिल होती हैं।

श्रुति पोखरियाल, देहरादून से CDS की आकांक्षी का कहना है कि हमारा देश बदल रहा है। वह कहती हैं, “इस फैसले का काफी इंतज़ार था। यह फैसला लैंगिक समानता के लिए एक उदाहरण खड़ा करता है। यह लड़कियों के दृढ़ निश्चय से मुमकिम हो सका है। जहां पहले लड़कियाँ फौज में शामिल नहीं हो सकतीं थीं, वहीं अब वे NDA जैसी प्रतिष्ठित अकादमी का हिस्सा बन पाएंगी। वाकई, छोरी छोरों से कहां कम हैं?” एनडीए की परीक्षा में लड़कियों की भागीदारी को अनुमति देता सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला लैंगिक समानता के लिए एक उदाहरण पेश करता है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट द्वारा ही आर्मी में महिलाओं को स्थायी कमिशन देने का फैसला लिया गया था। लैंगिक समानता की ओर यह एक छोटी सी शुरुआत है जिसमें अभी और भी बाधाएं हैं, मानसिक, सामाजिक, पितृसत्तात्मक जिन्हें हमें लांघना है।

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तस्वीर साभार : DNA

सुचेता चौरसिया टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान (TISS) मुंम्बई में मीडिया एंड कल्चरल स्टडीज़ की छात्रा हैं। अपने लेखन के ज़रिए वह समाज के हर भाग के लोगों में समरसता का भाव लाना चाहती हैं। वह पर्यावरण, लैंगिक समानता, फ़िल्म व साहित्य से जुड़े मुद्दों में रुचि रखती हैं। किताबें पढ़ना, बैडमिंटन खेलना, फोटोज़ खींचना उनके अन्य शौक हैं।

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