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वंदना (बदला हुआ नाम) ने लॉकडाउन लगने के बाद जब अपनी ऑनलाइन क्लास के लिए घर में मोबाइल फ़ोन की मांग की तो घरवालों ने चरित्र का हवाला देते हुए कहा, “मोबाइल से लड़कियां बिगड़ जाती हैं। कल को कुछ कर लेगी तो परिवार की इज़्ज़त चली जाएगी। इसलिए ऐसी पढ़ाई की कोई ज़रूरत नहीं है।” वंदना को ‘इज़्ज़त’ की दुहाई देकर मोबाइल फ़ोन नहीं दिया गया। वहीं, वंदना के भाई के एक़ बार कहने पर उसे मोबाइल फ़ोन तीन साल पहले ही दिलवा दिया गया। वहीं, ममता ने जब अपने पिता से ऑनलाइन क्लास के लिए उनका मोबाइल मांगा तो उसके साथ मारपीट की गई और ममता की पढ़ाई रोक दी गई। ममता के स्कूल में ऑनलाइन क्लास तो चलती रही लेकिन उसकी पढ़ाई काफ़ी पहले छूट गई। कोरोना काल में जब ऑनलाइन क्लास का दौर चला तब गांव में हर दूसरे-तीसरे घर से ऐसी घटनाएं सुनाई देनी लगीं। नतीजतन लड़कियों की पढ़ाई छूटती चली गई।  

आधुनिक दौर में डिजिटल माध्यम का महत्व बढ़ा है। इसमें डिजिटल इंडिया को विकास के प्रमुख साधन के रूप में स्वीकार किया गया। बेशक तकनीक और विज्ञान के इन माध्यमों के विस्तार में बीते कई सालों में ख़ूब ज़ोर दिया। इसकी क्वालिटी और क्वांटिटी में कम्पनियों के साथ-साथ सरकार ने भी अपने स्तर पर ख़ूब काम किया। पर दुर्भाग्यवश विज्ञान और तकनीक से लैस इन डिजिटल माध्यमों से लैंगिक भेदभाव और हिंसा को दूर नहीं किया जा सका बल्कि कई मायनों ने इन डिजिटल माध्यमों ने इसे बढ़ावा दिया है।

मौजूदा समय में मोबाइल फ़ोन, कम्प्यूटर और इंटरनेट जैसे सभी डिजिटल माध्यम किसी विशेषाधिकार से कम नहीं है। इसकी मुख्य वजह से अधिकतर सुविधाओं का डिजिटल माध्यमों से जुड़ाव, फिर बात चाहे शिक्षा की हो या रोज़गार, मनोरंजन की या सरकारी योजनाओं के लाभ की। ये सभी डिजिटल माध्यमों से इस कदर जुड़ चुके है कि इन तक पहुंच बिना डिजिटल माध्यम के संभव नहीं है और इस कोरोना काल ने इन डिजिटल माध्यमों की ज़रूरत को और भी ज़्यादा बढ़ा दिया है। ज़ाहिर है जब डिजिटल चीजें किसी विशेषाधिकार जैसी है तो इन तक पहुंच भी सत्ताधारियों की होगी यानी कि पितृसत्ता की।

हमारे देश में महिलाएं ओलंपिक गेम में देश का नाम विश्व स्तर पर ऊंचा कर रही हैं, लेकिन वहीं दूसरी तरफ़ गांव में लड़कियां अपनी शिक्षा को जारी रखने के लिए हिंसा का शिकार हो रही हैं।

वंदना और ममता जैसी ढ़ेरों लड़कियां आज इसी पितृसत्ता का सामना कर रही हैं। ऐसा नहीं है कि ये हाल सिर्फ़ हमारे समाज का है, बल्कि महिला अधिकारों को सुरक्षित करने के लिए ज़िम्मेदार लोगों भी ऐसी ही सोच को बढ़ावा देते है। बीते दिनों उत्तर प्रदेश की राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष मीना कुमारी ने भी एक बयान दिया था कि लड़कियों को मोबाइल फोन देना ही नहीं चाहिए। उन्होंने कहा कि लड़कियां मोबाइल पर बात करती रहती हैं और जब मैटर वहां तक पहुंच जाता है तो वह शादी के लिए उनके साथ भाग निकलती है जिसके बाद दुष्कर्म जैसी घटनाएं सामने आती है। यह बयान उन्होंने अलीगढ़ में पत्रकारों से बात करते हुए दिया है। मीना कुमारी का कहना है कि ‘अपराध रोकने के लिए सख्ती तो खूब हो रही है हम लोगों के साथ समाज को भी खुद देखना होगा। लड़कियां घंटों मोबाइल पर लड़कों से बात करती हैं और बात करते-करते उनके साथ भाग जाती हैं। आजकल की लड़कियां, लड़कों के साथ उठती बैठती हैं मोबाइल रखती हैं। घरवालों को उनके बारे में पता भी नहीं होता। लड़कियों के मोबाइल भी चेक नहीं किए जाते। एक दिन आता है है जब वे घर छोड़कर भाग जाती हैं। इसलिए बेटियों को मोबाइल नहीं देना चाहिए। इतनी ही नहीं मीना कुमारी ने तो यह भी कहा कि लड़की अगर बिगड़ गईं है इसके लिए पूरी तरह मां ही जिम्मेदार है।‘

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अपना भारतीय पितृसत्तात्मक समाज भी महिलाओं को अपनी ज़रूरत के अनुसार विशेषाधिकार देने का पैरोकार है। यहां सिर्फ़ उनकी अधिकारों को सहजता से महिलाओं को उपलब्ध करवाया जाता है, जो पितृसत्ता को पोसने और बढ़ावा देने में मदद करे। लेकिन जैसे ही महिलाएं इन माध्यमों का इस्तेमाल अपने विकास के लिए करना चाहती है, पितृसत्ता उन पर लगाम लगाना शुरू कर देती है।

कोरोना महामारी के दौर में जब शिक्षा को ऑनलाइन किया जा रहा है, ऐसे में ग्रामीण क्षेत्रों में एक बड़े स्तर पर लड़कियां शिक्षा के विशेषाधिकार से वंचित हो रही है। ऐसा नहीं कि मोबाइल की उपलब्धता न होना या ग़रीबी इसका कारण है, बल्कि इसका बड़ा कारण है परिवार और समाज की लैंगिक भेदभावपूर्ण सोच। जैसा कि हम जानते हैं ‘चरित्र’ एक ऐसा शब्द है जिसे हमारे समाज में हथियार की तरह हमेशा महिलाओं को नीचा दिखाने और उन्हें उनके अधिकारों से दूर रखने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। सदियों से हमारे पितृसत्तात्मक समाज में इज़्ज़त और चरित्र के नामपर महिलाओं के दमन का इतिहास रचा जाता रहा है, जिसका क्रम आज भी जारी है। महिलाओं के दमन के लिए इज़्ज़त शब्द का इस्तेमाल हम आज डिजिटल युग में होते देख रहे हैं।

बहुत अफ़सोस की बात है कि एक तरफ़ तो हमारे देश में महिलाएं ओलंपिक गेम में देश का नाम विश्वस्तर पर ऊंचा कर रही हैं, लेकिन वहीं दूसरी तरफ़ गांव में लड़कियां अपनी शिक्षा को जारी रखने के लिए हिंसा का सामना कर रही हैं। समाज की इस दोहरी नीति से कहीं न कहीं शहर और गांव के बीच दूरी भी बढ़ रही है। ग़रीबी, इज़्ज़त जैसे ढ़ेरों बहानों से महिलाओं को इन डिजिटल चीजों से दूर रखा जाता है, लेकिन वहीं छोटी उम्र में परिवार क़र्ज़ लेकर भी अपने बेटों को मनचाहा मोबाइल, इंटरनेट और कम्प्यूटर उपलब्ध करवाता है। ये हिंसा के ऐसे रूप है, जिन्हें हमलोग आए दिन गाँव में और अपने आसपास होता देख रहे है। ये हिंसा और भेदभाव लड़कियों को मानसिक रूप से भी प्रभावित करने का काम कर रही है। अब सवाल ये है कि डिजिटल युग के साथ बढ़ती इन हिंसा और भेदभाव को किन तकनीकों से दूर किया जा सकता है?

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तस्वीर साभार : omidyarnetwork

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