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गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने आईआईटी गुवाहाटी के एक छात्र जिस पर एक साथी छात्रा के बलात्कार का आरोप था, उसे ज़मानत देते हुए कहा कि आरोपी और साथ ही सर्वाइवर दोनों राज्य की भविष्य की संपत्ति और प्रतिभाशाली हैं। बीते 13 अगस्त को एक ज़मानत याचिका की सुनवाई पर गुवाहाटी हाई कोर्ट के जज अजीत बोरठाकुर ने ज़मानत देते हुए यह अजीब बात कही। जस्टिस अजीत ने बलात्कार के आरोपी उत्सव कदम को प्रतिभाशाली छात्र कहते हुए ज़मानत दे दी। इस मामले में अदालत ने यह नोट किया कि आरोपी कदम के खिलाफ “स्पष्ट प्रथम दृष्टया” मामला है, इस तथ्य के बावजूद यह ज़मानत आदेश जस्टिस अजीत द्वारा पारित किया गया। 

केस से जुड़े तथ्य 

इस मामले में दर्ज की गई एफआईआर केस के तथ्यों के साथ-साथ अन्य आरोपों का खुलासा करती है। वेबसाइट लाइव लॉ द्वारा अपडेट की गई फ़ैसले की कॉपी के मुताबिक बीते 28 मार्च को रात लगभग 9 बजे आरोपी छात्र अपनी साथी छात्रा से कहा कि उसे आईआईटी गुवाहाटी के छात्रों के वित्त और आर्थिक क्लब के संयुक्त सचिव के रूप में छात्रा की ज़िम्मेदारियों के बारे में चर्चा करनी है। यह कहकर वह सर्वाइवर को अक्षरा स्कूल परिसर में ले गया। वहां उसने सर्वाइवर को जबरन शराब पिलाकर बेहोश किया और उसके बाद उसका बलात्कार किया। सर्वाइर को अगली सुबह लगभग 5 बजे के क़रीब होश आया। गुवाहाटी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल (जी.एम.सी.एच.), गुवाहाटी में उसका इलाज और फोरेंसिक जांच आदि की गई। बाद में आरोपी छात्र को 3 अप्रैल को गिरफ्तार किया गया। गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि मामले की जांच पूरी हो चुकी है और सूचना देने वाली सर्वाइवर और आरोपी दोनों ही राज्य की भावी संपत्ति हैं, जो आईआईटी गुवाहाटी में पढ़ रहे प्रतिभाशाली छात्र हैं, अगर आरोप तय कर लिए गए हैं तो आरोपी को हिरासत में रखना ज़रूरी नहीं हैं।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक गुवाहाटी मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल के एक डॉक्टर ने उन्हें बताया कि सर्वाइवर बेहद गंभीर हालत में उनके पास पहुंची थी और यह यौन हिंसा का एक गंभीर मामला नज़र आ रहा था। वहीं, आईआईटी गुवाहाटी द्वारा 2 अप्रैल को जारी किए गए बयान के मुताबिक एक फैक्ट फाइंडिंग कमिटी बनाई जा चुकी है।

गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने आईआईटी गुवाहाटी के एक छात्र जिस पर एक साथी छात्रा के बलात्कार का आरोप था, उसे ज़मानत देते हुए कहा कि आरोपी और साथ ही सर्वाइवर दोनों राज्य की भविष्य की संपत्ति, और प्रतिभाशाली हैं।

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फ़ैसले को देखकर लगता है कि इस मामले में आईआईटी गुवाहाटी और वहां की पुलिस का सर्वाइवर के प्रति रुख कोई अच्छा नहीं रहा। घटना के दो महीने बाद तक उसे कोई न्याय नहीं मिल पाया था। वेबसाइट ईस्ट मोजो की रिपोर्ट बताती है कि घटना की जांच बहुत धीमी रफ़्तार से आगे बढ़ रही थी। मजबूरन सर्वाइवर को लगभग दो महीने बाद 18 मई को गुवाहाटी उच्च न्यायालय की तरफ रुख़ करना पड़ा। 28 मई को गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने मामले की जांच के लिए एक महिला पुलिस अधिकारी सहित तीन अनुभवी अधिकारियों की एक नई जाँच टीम गठित करने का आदेश जारी किया था।

गुवाहाटी उच्च न्यायालय का यह नवीनतम फैसला जिसने बलात्कार के आरोपी को जमानत दी है लैंगिक न्याय के मौलिक आधार को चुनौती देता है। इससे पहले भी हमारे न्यायालय समय-समय पर यह ऐसे फै़सले देते रहते हैं। भारतीय न्यायालयों का रुख कई बार सर्वाइवर के पक्ष में जाने की जगह आरोपी की झोली में चला जाता है। पहले भी भारतीय अदालतें महिलाओं के खिलाफ यौन उत्पीड़न के आरोपियों के साथ ‘नरम न्याय’ कर चुकी है। 

कब-कब कोर्ट ने दिए ऐसे फ़ैसले

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर पीठ ने यौन उत्पीड़न के एक आरोपी को इस शर्त पर जमानत दी कि वह रक्षाबंधन के दिन शिकायतकर्ता के पास मिठाई का डिब्बा लेकर जाएगा और उसके हाथ पर राखी बांधने का अनुरोध करेगा और साथ ही वह उसकी रक्षा करने का वादा करेगा। न्यायालय ने यह भी आदेश दिया कि, अभियुक्त रिवाज के के रूप में सर्वाइवर को उपहार में 11,000 रुपये की राशि भी दे। हालांकि इस फैसले को आगे चुनौती दी गई और सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के इस फ़ैसले को खारिज कर दिया।

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कई बार तो ऐसा लगता है कि न्याय केवल काग़ज़ों और कथनों तक सीमित हो कर रह गया है। एक यौन उत्पीड़न की सर्वाइवर जो पहले से ही शारीरिक और मानसिक यातनाएं झेल चुकी हैं वह न्यायालय के इन कथनों के बाद भी अधिक प्रभावित होती है।

कर्नाटक हाई कोर्ट का एक फैसला इस बारे में मानक बहस से आगे निकल गया कि आखिर एक बलात्कार सर्वाइवर को बलात्कार के बाद कैसे ‘व्यवहार’ करना चाहिए? दरअसल, इस मामले में बलात्कार के बाद सर्वाइवर थक गई और सो गई थी, इसीलिए न्यायालय द्वारा इसे ‘एक भारतीय महिला के लिए अशोभनीय’ माना गया। न्यायालय द्वारा इस विवादास्पद टिप्पणी को बाद में जनता के हंगामे के बाद आदेश से हटा दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने साल 2016 में सामूहिक बलात्कार के दोषियों को बरी कर दिया और सर्वाइवर महिला के कथन पर विश्वास नहीं किया क्योंकि न्यायालय को यह लगा कि कथित घटना के दौरान सर्वाइवर का आचरण भी ‘जबरन बलात्कार की सर्वाइवर या धोखे से बनाए जाने वाले संबंध’ के विपरीत हैं और कुछ हद तक विनम्र और सहमतिपूर्ण स्वभाव का मालूम पड़ता है। 

15 जुलाई, 2020 को, बिहार के अररिया जिले में एक सिविल कोर्ट ने अदालती कार्यवाही में बाधा डालने के आधार पर एक सामूहिक बलात्कार सर्वाइर को जेल भेज दिया था। उसका एकमात्र अपराध भावनात्मक विस्फोट और नर्वस ब्रेकडाउन था जो उसके आघात को बार-बार दोहराने के अनुरोध से निकला था। यह किसी भी यौन हिंसा सर्वाइवर की एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया होती है लेकिन उसे सिविल कोर्ट ने ‘अदालत की अवमानना’ के रूप में गलत समझा। 

इन मामलों के आलावा भी और बहुत से केस हैं जिनमें भारतीय न्यायालय सर्वाइवर को न्याय देने की जगह विक्टिम ब्लेमिंग और पितृसत्तात्मक सोच का परिचय देते हैं। कई बार तो ऐसा लगता है कि न्याय केवल काग़ज़ों और कथनों तक सीमित हो कर रह गया है। एक यौन उत्पीड़न की सर्वाइवर जो पहले से ही शारीरिक और मानसिक यातनाएं झेल चुकी हैं वह न्यायालय के इन कथनों के बाद भी अधिक प्रभावित होती है। न्यायालयों की आरोपियों के प्रति ‘नरम न्याय’ की विचारधारा अन्य सर्वाइवर्स की भी न्याय की आस को तोड़ती है। भारतीय न्यायपालिका के इन फैसलों और टिप्पणियों में उस पितृसत्तात्मक समाज की झलक और उसकी दकियानूसी सोच भी झलकती है जो लड़कियों को रात को घर से बाहर न निकलने की सलाह देती है, मोबाइल का उपयोग न करना को कहती है, जींस न पहनने पर ज़ोर देती है और बलात्कार कम कपड़े पहनने के कारण होता है, बताती है।

यह कहना गलत नहीं होगा कि भारतीय न्यायपालिका पितृसत्तात्मक सोच से ग्रसित है। बलात्कार के मामलों में, विशेष रूप से, यौन उत्पीड़न की सर्वाइवर महिलाओं के प्रति न्यायपालिका की प्रतिक्रिया संवेदनशील और विचारशील से लेकर सेक्सिस्ट और स्त्री विरोधी के बीच उतार-चढ़ाव वाली लगती है। हालांकि, भारतीय न्यायपालिका के कई निर्णय ऐसे भी हैं जो यौन हिंसा सर्वाइवर्स के लिए उम्मीद लेकर आते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने दीपक गुलाटी बनाम हरियाणा राज्य के मामलें में कहा था कि बलात्कार सबसे जघन्य अपराध है, न केवल सर्वाइवर के खिलाफ बल्कि पूरे समाज के खिलाफ। यह सर्वाइवर को मनोवैज्ञानिक और शारीरिक नुकसान पहुंचाता है और अपने अमिट निशान छोड़ता है। यह उसके जीवन के मूल को हिला देता है। 

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तस्वीर: सुनिधि कोठारी फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए

दिल्ली विश्वविद्यालय से लॉ की डिग्री ली फिर जामिया से LLM किया। एक ऐसे मुस्लिम समाज से हूं, जहां लड़कियों की शिक्षा को अधिक महत्त्व नहीं दिया जाता था लेकिन अब लोग बदल रहे हैं। हालांकि, वे शिक्षा तो दिला रहे हैं, मगर सोच वहीं है। कई मामलों में कट्टर पितृसत्तात्मक समाज वाली सोच। बस इसी सोच को बदलने के लिए लॉ किया और महिलाओं और पिछड़े लोगों को उनके अधिकार दिलाने की ठानी। समय-समय पर महिलाओं को उनके अधिकारों से अवगत कराती रहती हूं। स्वतंत्र शोधकर्ता हूं, वकील हूं, समाज-सेवी हूं। सबसे बड़ी बात, मैं एक मुस्लिम हूं।

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