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दुनिया में कई ऐसे देश हैं जहां वैवाहिक बलात्कार यानी कि मैरिटल रेप को लेकर कोई कानून नहीं है। यहां तक कि कानून व्यवस्था मैरिटल रेप को आपराधिक घटना मानने से इनकार करती है। भारत भी उन देशों में से एक है यानी कि अगर पति ज़बरन पत्नी के साथ शारीरिक संबंध स्थापित करता है, यह घटना अपराधिक नहीं मानी जाती है, इसे रेप यानी बलात्कार नहीं माना जाएगा। क़ानून की नज़र से भारत में सेक्स और रेप के बीच अंतर करने के लिए, महिला की सहमति यानी कंसेंट और इनकार को रेप की परिभाषा समझने के लिए अहम माना गया है। जैसे, महिला की मर्ज़ी से सेक्स हो लेकिन इसकी सहमति देते वक्त महिला की मानसिक स्थिति ठीक नहीं हो या फिर उस पर किसी नशीले पदार्थ का प्रभाव हो और सहमति देने के नतीजों को समझने की स्थिति में न हो, तो उसे बलात्कार की श्रेणी में रखा जाता है।

वहीं, एक अपवाद यह है कि आईपीसी की धारा 375 के मुताबिक़ कोई व्यक्ति अगर किसी महिला के साथ शारीरिक संबंध बना रहा हो और महिला 15 साल की उम्र से बड़ी हो और वह पुरुष उसका पति हो तो महिला की सहमति को लेकर कोई बातचीत नहीं है। पति द्वारा किया गया महिला की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ सेक्स मैरिटल रेप नहीं माना जाता है। आईपीसी यानी भारतीय दंड संहिता में मैरिटल रेप के ख़िलाफ़ कोई कानून नहीं है। महिला द्वारा यौन संबंध में अपना कंसेंट यानी सहमति देने की उम्र क़ानून द्वारा 18 साल निर्धारित की गई है।

यह मामला बड़ा ही पेचीदा और प्रॉब्लेमैटिक दिखता है। एक विवाहित स्त्री, 15 साल से ज्यादा की हो तो पति को उसकी मर्ज़ी जानने की जरूरत भी नहीं है। इन क़ानूनों के हवाले से सेक्स करना उसका वैवाहिक अधिकार जैसा प्रतीत होता है। जबकि दोनों पक्षों की सहमति किसी भी तरह के यौन संबंध, यौन क्रिया के हर स्टेप पर अहम है। फिर विवाह में 15 साल से बड़ी महिला की सहमति हमेशा होगी, होनी चाहिए यह पूर्वाग्रह बनाकर क़ानून द्वारा रेप को परिभाषित करना वैवाहिक संबंध में पितृसत्ता को स्थापित करता है।

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मैरिटल रेप पर केरल उच्च न्यायालय ने क्या कहा है?

हाल ही में एक फैसले में केरल उच्च न्यायालय ने कहा है कि पत्नी के शरीर को पति द्वारा अपनी संपत्ति समझना और उसकी इच्छा के विरुद्ध यौन संबंध बनाना वैवाहिक बलात्कार है यानि केरल उच्च न्यायालय ने मैरिटल रेप को कानूनी तौर पर अपराध माना है। न्यायमूर्ति ए. मोहम्मद मुस्ताक और न्यायमूर्ति कौसर एडप्पागथ की खंडपीठ ने कहा, ‘दंडात्मक कानून के तहत वैवाहिक बलात्कार को कानून मान्यता नहीं देता, केवल यह कारण अदालत को तलाक देने के आधार के तौर पर इसे क्रूरता मानने से नहीं रोकता है। इसलिए, हमारा विचार है कि वैवाहिक बलात्कार तलाक का दावा करने का ठोस आधार है।’ इस दम्पति का विवाह साल 1995 में हुआ था। पत्नी के अनुसार वह लंबे समय तक उत्पीड़न सहती रही, लेकिन अंत में तंग आकर उसे तलाक़ के लिए याचिका दायर करनी पड़ी। पत्नी के अनुसार कई बार पति ने उस के साथ ज़बरन शारीरिक संबंध बनाए हैं। 

केरल कोर्ट ने इस ऐतिहासिक सुनवाई में यह कहा है कि मैरिटल रेप को अपराध भले ही न माना जाए, लेकिन अगर पत्नी चाहे तो इसे तलाक का आधार माना जा सकता है। केरल उच्च न्यायालय का यह फैसला बुनियादी सुधार के लिए पर्याप्त तो नहीं है क्योंकि मैरिटल रेप आज भी रेप की श्रेणी से बाहर है, इसलिए दोषी पति बलात्कारियों को मिलने वाली सजा के दायरे से बाहर होता है। लेकिन इसे तलाक़ के लिए एक अहम कारण मानना, इसलिए एक ज़रूरी फैसला है क्योंकि यह महिला को शादी से बाहर आने का क़ानूनी रास्ता देता है। हालांकि यह न्याय अधूरा है क्योंकि महिला द्वारा सहन किए यौन उत्पीड़न के बावजूद पति को सज़ा नहीं मिल रही है।

केरल कोर्ट ने इस ऐतिहासिक सुनवाई में यह कहा है कि मैरिटल रेप को अपराध भले ही न माना जाए, लेकिन अगर पत्नी चाहे तो इसे तलाक का आधार माना जा सकता है।

वैवाहिक बलात्कार अपवाद अधिनियम 1860 में भारतीय दंड संहिता के साथ ही लागू किया गया था। 18वीं शताब्दी के ब्रिटिश न्यायवादी सर मैथ्यू हैले ने लिखा था, ‘एक पत्नी ने खुद को अपने पति को इस तरह सौंप दिया है कि वह खुद को वापस नहीं ले सकती है।’ इसी मानसिकता पर आज भी यह अपवाद आईपीसी में मौजूद है। यह नज़रिया परिवार को ‘जोड़े रखने’ के लिए महिलाओं के मूलभूत मानवाधिकार का हनन करती है, न्याय व्यवस्था में समाज के पितृसत्तात्मक ढांचे की पुनः पुष्टि यानी उसे रीअफ़र्म करती है। बीते कुछ समय में में मैरिटल रेप को लेकर कई प्रभावशाली व्यक्तियों ने प्रोब्लेमेटिक बयान दिए हैं। साल 2016 में भारतीय जनता पार्टी की सांसद मेनका गांधी ने कहा था, ‘जिस तरह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मैरिटल रेप का कानून समझा जा रहा है, उसे भारत में वैसे ही लागू करना संभव नहीं है।’ साल 2015 में मंत्री हरिभाई चौधरी ने विवाह भारत में पवित्र माना जाता है इसलिए यहां मैरिटल रेप लागू नहीं होता। ये नेता भारत की संस्कृति, परिवार व्यवस्था, परिवार की मान्यता, धार्मिक और सांस्कृतिक कारणों का हवाला देकर इसे रेप की श्रेणी में लाना मुश्किल बताते हैं।

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मैरिटल रेप महिलाओं के लिए कितनी गंभीर समस्या है यह बात आंकड़ों से पता पड़ता है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के मुताबिक 99.1 फ़ीसद यौन हिंसा की घटनाएं वे होती हैं जिन्हें रिपोर्ट ही नहीं किया जाता। औसत भारतीय महिला पर पति यौन हिंसा करता हो इसकी सम्भावनाएं किसी अन्य व्यक्ति द्वारा हिंसा की जाने से 17 गुना अधिक हैं। घरेलू हिंसा के कानून में सुधार करने की बात करते हुए जब महिला को उसके घर में सेफ़ स्पेस सुनिश्चित करने की बात होती है, घरेलू हिंसा और बने क़ानून में भी कहीं मैरिटल रेप या यौन हिंसा है ज़िक्र नहीं मिलता।

अगर हम इतिहास उठाकर देखें तो दुनिया के सारे नियम अलग-अलग देशों में वहां के पुरुषों ने तय किया है। फिर बात विज्ञान द्वारा शरीर को समझने की हो, या समाजशास्त्र द्वारा जेंडर रोल्स बांटने की। महिलाओं का नज़रिया, उनके जिये अनुभवों को इस मुख्यधारा में जगह नहीं मिली। फीमेल गेज़ से परिस्थितियों को समझा नहीं गया। विवाह के बाद महिला पति की हो जाती है इसलिए पति को किसी भी बात, जिसमें सेक्स भी शामिल है उसके लिए पत्नी की अनुमति लेना परिवार को कमज़ोर करता है। इसके पीछे की सच्चाई यह है कि पितृसत्तात्मक समाज डरता है कि महिलाओं अपने शरीर पर अपना हक़ आज़माने की बात करने लगेंगी तो उनकी असहमति का तार्किक जवाब ढूंढना मुश्किल होगा। इसलिए वे उन्हें ऐसा कर पाने से दूर रखने में हर संस्था का इतेमाल करते हैं। परिवार की संस्था और इस संस्था की मान्यताओं का भी। नारीवादी चश्मे से क़ानून को देखने और दोबारा गढ़ने की ज़रूरत है। देखा जाना चाहिए कि साल 2013 तक आईपीसी की धारा 375 के तहत यौन हिंसा रेप तभी माना जाता था अगर योनि में पेनिट्रेशन पुरूष लिंग यानी पीनस द्वारा किया गया हो, किसी अन्य वस्तु या उंगली से किया गया पेनिट्रेशन रेप की श्रेणी में नहीं माना जाता था, उसके लिए सज़ा वैसी नहीं थी जैसी बलात्कार के मामले में होते थे। मैरिटल रेप पर क़ानून का ढीला रवैया महिला के यौनिकता पर उसके पति का एकाधिकार बताने जैसा है, जो सरासर महिला का अपने शरीर और यौनिकता पर स्वायत्तता का हनन है। 

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तस्वीर : रितिका बनर्जी फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए

मेरा नाम ऐश्वर्य अमृत विजय राज है, मिरांडा हाउस से 2021 में दर्शनशास्त्र से स्नातक है। जन्म और शुरुआती पढ़ाई लिखाई बिहार में हुई। इसलिए बिहार के कस्बों और गांव का अनुभव रहा है। दिल्ली आने के बाद समझ आया कि महानगर से मेरे लोग मीलों नहीं बल्कि सालों पीछे हैं। नारीवाद को ख़ासकर भारतीय संदर्भ में उसकी बारीकियों के साथ थ्योरी में और ज़मीनी स्तर पर समझना, जाति और वर्ग के दख़ल के साथ समझना व्यक्तिगत रुचि और संघर्ष दोनों ही है। मुझे आसपास की घटनाएं डॉक्यूमेंट करना पसंद है, कविताओं या विज़ुअल के माध्यम से। लेकिन कभी कभी/हमेशा लगता है "I am too tired to exist".

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