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अफ़ग़ानिस्तान में पिछले कई दिनों से हो रहे तमाम घटनाओं में एक आम मुद्दा महिलाओं की सुरक्षा और आज़ादी का रहा है। अफ़ग़ानिस्तान महिलाओं, विशेष रूप से शिक्षित, सशक्त और मुखर महिलाओं के लिए आसान जगह नहीं रहा है। बीबीसी पश्तो रेडियो के साथ एक विशेष साक्षात्कार में कतर में तालिबान के राजनीतिक कार्यालय के वर्तमान प्रमुख शेर मोहम्मद अब्बास स्टानिकजई ने कहा कि उनकी सरकार में महिलाओं को शामिल किया जाएगा। देश की मौजूदा परिस्थिति में महिलाओं की आज़ादी और सुरक्षा आने वाले दिनों में कितनी सुरक्षित रहेगी यह अब भी अनिश्चित है। अफ़ग़ानिस्तान के जटिल और संघर्षपूर्ण स्थिति के बीच कुछ अफगान महिलाएं लगातार रूढ़िवादी और पितृसत्तात्मक समाज के नियमों को अपने काम के माध्यम से चुनौती दे रही हैं। ये महिलाएं नारी सशक्तिकरण की मिसाल बनकर उभरी हैं। आज हम ऐसी ही कुछ महिलाओं से परिचित होंगे।

शम्सिया हसानी

तस्वीर साभार : hindi.news18

अप्रैल 1988 में जन्मी, शम्सिया हसानी अफ़ग़ानिस्तान की पहली महिला ग्राफिटी या भित्तिचित्र कलाकार हैं। शम्सिया फ़ाइन आर्ट्स लेक्चरर और काबुल विश्वविद्यालय में ड्राइंग और एनाटॉमी ड्राइंग की एसोसिएट प्रोफेसर हैं। अफ़गानिस्तान के युद्ध के वर्षों के बारे में जागरूकता लाने के लिए शम्सिया ने विशेष रूप से काबुल में ग्राफिटी बनाए। उन्होंने काबुल की गलियों में ‘स्ट्रीट आर्ट’ को लोकप्रिय बनाया। भारत, ईरान, जर्मनी, अमेरिका, स्विट्जरलैंड, वियतनाम, नॉर्वे,  डेनमार्क, तुर्की, इटली और कनाडा सहित कई देशों में उन्होंने अपनी कला का प्रदर्शन किया है। शम्सिया ने अपनी कलाकृतियों के माध्यम से एक पुरुष प्रधान समाज में अफगान महिलाओं को चित्रित किया है। उनकी कला अफगान महिलाओं को वहाँ की परिस्थिति से बिलकुल हटकर एक अलग चेहरा देती है। वह दिखाती हैं कि अफगान की महिलाएं महत्वाकांक्षी हैं। उनमें अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने की इच्छा और शक्ति है। उनकी कलाकृतियों ने दुनिया भर में हजारों महिलाओं को प्रेरित किया और अफ़ग़ानिस्तान में महिला कलाकारों को एक नई उम्मीद दी है। उन्होंने दुनिया भर के विभिन्न देशों में अपने ग्राफिटी उत्सव और प्रदर्शनियों के माध्यम से सैकड़ों अफगानों को अपनी रचनात्मकता दिखाने के लिए प्रेरित किया है। मुख्य रूप से काबुल में ग्राफिटी करते हए, विदेश में उनकी अंतिम ग्राफिटी कैलिफोर्निया में सैक्रामेंटो की वाइड ओपन वॉल्स और ओरेगन में 20×21 यूजीन की ग्राफिटी परियोजना रही है। विभिन्न पुरस्कारों से नवाज़ी गई शम्सिया साल 2013 में काबुल की पहली राष्ट्रीय ग्राफिटी महोत्सव की संस्थापक रह चुकी हैं। साल 2014 में, फॉरेन पॉलिसी पत्रिका के 100 शीर्ष वैश्विक विचारकों में उनका नाम नामित किया गया था।

साहरा करीमी

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21 मई 1983 को जन्मी साहरा करीमी अफगान फिल्म निर्देशक और अफगान फिल्म संगठन की पहली महिला अध्यक्ष हैं। अगस्त 2021 में अफ़ग़ानिस्तान छोड़ने से पहले वह सिनेमा और फिल्म निर्माण में पीएचडी करने वाली देश की पहली और एकमात्र महिला थी। पुरस्कार के लिए नामांकित साल 2019 की फिल्म ‘हावा मरियम आयशा’ की निदेशक करीमी ने 13 अगस्त को अपने सोश्ल मीडिया पर एक पत्र जारी किया था। इस पत्र में उन्होंने अंतरराष्ट्रीय फिल्म समुदाय से फिल्म निर्माताओं और अन्य सांस्कृतिक रचनाकारों की तालिबान हिंसा से रक्षा के लिए आह्वान किया था। जर्मनी के अंतरराष्ट्रीय प्रसारक डीडब्ल्यू के कला और संस्कृति टीवी समाचार कार्यक्रम पर प्रसारित रॉयटर्स के साथ हुए साक्षात्कार में उन्होंने बयान दिया कि वह क्षण जब वह अफ़ग़ानिस्तान से बाहर जाने के लिए हवाई जहाज लेने से चूक गईं, वह उनके जीवन का सबसे दुखद क्षण था क्योंकि उन्होंने सोचा कि वे अब नहीं जा पाएँगी। लेकिन वे रुकीं  और दोबारा प्रयास की क्योंकि वह कभी हार नहीं मानने वाली व्यक्ति हैं। अपने पत्र में वह आने वाले दिनों में अफ़ग़ानिस्तान के हालात के बारे में अपनी फिक्र जाहिर करते हुए लिखती हैं कि अफगान महिलाओं, बच्चों, कलाकारों और फिल्म निर्माताओं को दुनिया के समर्थन की जरूरत है। यह पत्र तालिबन के देश में आने से पहले की थी जिसमें वह सभी से तालिबान के सत्ता में आने से पहले मदद करने की गुहार करती हैं। उनकी पहली डॉक्युमेंट्री ‘सर्चिंग फॉर ड्रीम’ साल 2006 में ढाका अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में प्रदर्शित की गयी थी। उनके अन्य उल्लेखनीय फिल्मों में ‘अफगान वीमेन बिहाइंड द व्हील’ शामिल है, जिसे स्लोवाकिया में अकादमी पुरस्कार सहित प्रमुख फिल्म समारोहों में लगभग 20 अलग-अलग पुरस्कार दिए गए। इस फिल्म को 13वें ढाका अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह में सर्वश्रेष्ठ डॉक्युमेंट्री का पुरस्कार भी दिया गया।

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ज़रीफ़ा गफ़ारी

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अफगान सेना के कर्नल और कमांडर अब्दुल वासी गफ़ारी के घर साल 1992 में जन्मी ज़रीफ़ा गफ़ारी अफगान कार्यकर्ता और राजनीतिज्ञ हैं। नवंबर 2019 में, वह अफ़ग़ानिस्तान के वरदक प्रांत की राजधानी शहर, मैदान शहर की मेयर बनीं। 26 साल की उम्र में नियुक्त होने वाली ज़रीफ़ा अफ़ग़ानिस्तान की चुनिंदा महिला मेयरों में से एक हैं। जबकि अफ़ग़ानिस्तान में अन्य महिला मेयर रही हैं, आमतौर पर उनका कार्य क्षेत्र सांस्कृतिक रूप से अधिक सहिष्णु माना जाता था। लेकिन पारंपरिक रूप से रूढ़िवादी प्रांत माना जाना वाला वरदक में गफ़ारी को शुरुआत से ही अस्थिरता का सामना करना पड़ा है। पूर्व राष्ट्रपति अशरफ गनी द्वारा नियुक्त किए जाने के बाद साल 2018 में उनके कार्यालय में पहले ही दिन कुछ पुरुषों ने कार्यालय को घेर लिया था। नौ महीनों के बाद लौटी गफ़ारी वापस अपना पद ग्रहण कीं और सार्वजनिक निर्माण परियोजनाओं को लागू करने के साथ-साथ शहर की सफाई अभियान की शुरुआत की। मीडिया में आई खबरों के मुताबिक वह कई बार हत्या के प्रयासों से बची हैं। वह अफ़ग़ानिस्तान में महिलाओं के अधिकारों को आगे बढ़ाने के अपने प्रयासों के लिए जानी जाती हैं। साल 2020 में ज़रीफ़ा को अमेरिकी राज्य सचिव द्वारा ‘इंटरनेशनल वुमेन ऑफ कॉरेज’ के रूप में चुना गया था।

पश्ताना ज़लमई ख़ान दुर्रानी

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पश्ताना ज़लमई ख़ान दुर्रानी ने अफ़ग़ानिस्तान में लड़कियों की शिक्षा की वकालत तब शुरू की जब वह महज सात साल की थीं। अपनी मेहनत, सक्रियता और दृढ़ निश्चय से उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान जैसे देश में गैर सरकारी संस्था ‘लर्न’ का निर्माण किया ताकि युवा अफगान लड़कियां शिक्षित होकर स्वतंत्र और जिम्मेदार बन सके। पश्ताना ने अपनी संस्था लर्न के माध्यम से हज़ारों अफगान महिलाओं को शिक्षित करने में मदद की। कोरोना महामारी के दौरान उन्हें व्यक्तिगत हानि से भी गुजरना पड़ा। कोरोना महामारी के बाद, अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस के अवसर पर संयुक्त राष्ट्र ने युवा मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के जीवन, काम और उनके संस्थाओं पर हुए महामारी के प्रभाव पर एक खास संकलन जारी किया जिसमें पश्ताना को भी शामिल किया गया।

अफ़ग़ानिस्तान के जटिल और संघर्षपूर्ण स्थिति के बीच कुछ अफगान महिलाएं लगातार रूढ़िवादी और पितृसत्तात्मक समाज के नियमों को अपने काम के माध्यम से चुनौती दे रही हैं।

शबाना बासिज-राशिख

शबाना बासिज-राशिख अफगान शिक्षिका, मानवतावादी और महिला अधिकार कार्यकर्ता हैं। बासिज-राशिख का जन्म और पालन-पोषण काबुल में तालिबान शासन के अधीन हुआ। इसलिए उन्हें लड़कों के तरह कपड़े पहनकर गुप्त रूप में स्कूल जाना पड़ता था क्योंकि उस वक़्त महिलाओं को पढ़ने-लिखने की मनाही थी। उन्होंने साल 2009 में अफगान महिलाओं की शिक्षा के लिए संस्था हेला, आईएनसी और स्कूल ऑफ लीडरशिप अफ़ग़ानिस्तान (सोला) की स्थापना  की। उन्हें अपने काम के लिए दुनिया भर में मान्यता प्राप्त है। साल 2010 में ग्लैमर मैगज़ीन की कॉलेज की शीर्ष दस महिलाओं में उन्हें नामित किया गया था। साल 2012 में उन्होंने ‘डेयर टू एजुकेट अफगान गर्ल्स’ शीर्षक से TEDx टॉक दिया। साल 2014 में, उन्हें नेशनल ज्योग्राफिक द्वारा ‘इमर्जिंग एक्सप्लोरर’ के लिए नामित किया गया। लड़कियों की शिक्षा का समर्थन करने के लिए गैर-लाभकारी संस्थाओं, निगमों, समाज सेवियों, नीति निर्माताओं, विश्व के विभिन्न प्रभावशाली व्यक्तियों और जमीनी स्तर पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं को जोड़ने वाले एक वैश्विक आंदोलन 10×10 में वह ग्लोबल अंबासडर के रूप में शामिल हुई हैं। हाल ही में उन्होंने अपने ट्विटर अकाउंट पर अपने स्कूल के छात्रों के रिकॉर्ड को जलाते हुए एक विडियो जारी किया था। इस विडियो में वह बताती हैं कि उन्हें ऐसा छात्रों और उनके परिवारों को तालिबान से बचाने के लिए करना पड़ रहा है।

नेगिन खपलवाक

तस्वीर साभार : zaroorat.in

साल 1997 में कुनार, अफ़ग़ानिस्तान में पैदा हुई नेगिन खपलवाक एक महिला कंडक्टर हैं, जो अफ़ग़ानिस्तान में नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर म्यूजिक की पहली महिला ऑर्केस्ट्रा ‘ज़ोहरा’ का नेतृत्व करती हैं। युवा खपलवाक का संगीत के प्रति अद्भुत जुनून था। हालाँकि, तालिबान शासन के दौरान महिलाओं का संगीत से जुड़ना पूरी तरह से प्रतिबंधित था, लेकिन उन्होंने अपने सपने को नहीं छोड़ा। उन्हें काबुल के अफगान चाइल्ड एजुकेशन एंड केयर ऑर्गनाइजेशन नामक एक अनाथालय में भेजा गया जहाँ वह नौ साल की उम्र में शिक्षा प्राप्त कर सकती थीं। 13 साल की उम्र में उन्हें संगीतज्ञ अहमद नासेर सरमस्त के संस्था अफ़ग़ानिस्तान नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर म्यूज़िक के लिए चुना गया। साल 2017 में उन्होंने पहली बार अफ़ग़ानिस्तान के बाहर स्विट्जरलैंड के दावोस में वर्ल्ड इकनॉमिक फॉरम में प्रदर्शन किया। इसके बाद उन्होंने स्विट्जरलैंड और जर्मनी का भी दौरा किया था।  

सबा सहर

तस्वीर साभार : etvbharat

28 अगस्त 1975 को जन्मी सबा सहर एक अफगान अभिनेत्री और देश की पहली महिला फिल्म निर्देशक, निर्माता और पुलिस अधिकारी हैं। 25 अगस्त 2020 को  काबुल में अपने अंगरक्षक और ड्राइवर के साथ यात्रा करते समय एक अज्ञात बंदूकधारी ने सहर को गोली मार दी थी। माना जाता है कि उनपर यह हमला अफ़ग़ानिस्तान में महिलाओं के अधिकारों के लिए उनके प्रयासों के कारण हुआ था। साल 2004 में उनकी बनाई पहली फिल्म ‘द लॉ’ को बड़ी सफलता मिली थी। इसके अलावा उन्होंने ‘कमिश्नर अमनुल्लाह’, ‘पासिंग द रेनबो’ और ‘काबुल ड्रीम फैक्ट्री’ जैसी कई फिल्में बनाई और अभिनय भी कीं।  

हालांकि तालिबान ने दावा किया है कि वह इस्लामी कानून के सख्त व्याख्या के ढांचे के भीतर महिलाओं के अधिकारों का सम्मान करेगा। लेकिन पिछले कुछ दिनों में मीडिया में महिलाओं को काम पर जाने या करने से रोकने की खबरें लगातार सामने आई हैं। पिछले तालिबान शासन पर गौर करें, तो लड़कियों को स्कूल से प्रतिबंधित कर दिया जाता था। महिलाओं को काम से प्रतिबंधित किया जाता था और नियम तोड़ने वालों को कठोर सजा दी जाती थी। कला और संस्कृति के क्षेत्र में जाने के लिए महिलाओं पर विशेष रूप से पाबंदी थी। ऐसे में, तत्कालीन परिस्थिति को मद्देनज़र सिर्फ यह उम्मीद की जा सकती है कि इतिहास खुद को न दोहराए। सड़कों पर उतरी अफ़ग़ानिस्तान की आम महिलाओं का मौजूदा स्थिति पर विरोध प्रदर्शन दुखद ही सही लेकिन आने वाले दिनों के लिए उम्मीद की वजह बनाए हुए है।

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कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से हिंदी में बी ए और पंजाब टेक्निकल यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद बतौर पत्रकार और शिक्षिका मैंने लम्बे समय तक काम किया है। बिहार और बंगाल के विभिन्न क्षेत्र में पले-बढ़े होने के कारण सामाजिक रूढ़िवाद, धार्मिक कट्टरपन्त, अंधविश्वास, लैंगिक और शैक्षिक असमानता जैसे कई मुद्दों को बारीकी से जान पायी हूँ। समावेशी नारीवादी विचारधारा की समर्थक, लैंगिक एवं शैक्षिक समानता ऐसे मुद्दें हैं जिनके लिए मैं निरंतर प्रयासरत हूँ।

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