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बचपन से लड़कियों को परियों की कहानी के नाम पर ऐसी चमत्कारी और खुशनुमा दुनिया की कहानियां सुनाई जाती हैं जिनका वास्तविकता से कोई नाता नहीं होता। इसके विपरीत मार्गरेट अटवुड द्वारा लिखे गए उपन्यास ‘द हैंडमेड्स टेल’ पर आधारित टीवी सिरीज़ एक ऐसे समाज की कहानी उजागर करती है, जहां धर्म और धार्मिक रूढ़िवादियों के नाम पर महिलाओं से उनके सारे अधिकार छीन लिए जाते हैं। उनकी ज़िंदगी का संचालन पुरुषों द्वारा बनाए गए क्रूर नियमों अनुसार किया जाता है। चार सीज़न में बंटी यह कहानी एक तरीके से पूरे समाज को चेतावनी देती है और स्त्रियों को आगाह करती है कि अगर इस समय आवाज़ नहीं उठाई तो हैंडमेड्स टेल का सच्चाई में बदल जाना दूर नहीं, जिसके लक्षण अभी से प्रत्यक्ष रूप से दिखने शुरू हो गए हैं। 

एमी ख़िताब से नवाजित इस सीरीज़ में औरतों को गिलियड राज्य की जागीर समझ लिया जाता है और उन्हें ज़बरदस्ती यौनिक गुलामी करने को मजबूर किया जाता है। कहानी में एक रूढ़िवादी समाज में स्त्रियों की स्थिति को परिदर्शित किया गया है। ऑफ़रेड (जून ओसबोर्न) की भूमिका निभाती एलिज़ाबेथ मोस इस सीरीज़ की मुख्य किरदार हैं। यह एक मज़बूत पात्र हैं जो सत्तावादी ताकतों द्वारा किए जा रहे अत्याचारों से पीड़ित हैं, जिसे अन्य औरतों की तरह ही बंधी बनाकर उन्हें उच्च वर्ग के लोगों की दासी बना दिया जाता है। कहानी की भूमिका में यह दिखाया गया है कि पर्यायवरण में फेर-बदल के कारण महिलाओं की प्रजनन शक्ति में  गिराव आया और उस देश में अब चंद महिलाएँ ही हैं जो गर्भधारण कर सकती हैं। सत्ता में बैठे लोग ऐसी हर औरत को अपनी जागीर मानकर हर महीने पारंपरिक तौर पर, अपनी बीवी की उपस्थिति में उनका रेप करते हैं ताकि वह उनके लिए बच्चा जन सकें।

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ऑफ़रेड भी ऐसी ही एक हैंडमेड है जो समाज की जकड़न में बंधी है पर अपने पति और बच्ची से मिलने की चाहत उसके जज़्बे को नहीं तोड़ती। इस कहानी का सबसे आकर्षित कर देने वाला पहलू हैंडमेड्स की पोशाक है। सारी हैंडमेड्स लाल लंबा गाउन पहन कर रखती हैं और सिर पर सफ़ेद फ्लैप, जो उनकी दृष्टि को बाधित करता है। यह औरतों को सीमाबद्ध रखने का प्रतीक है। हमारे यहाँ भले ही हमारे सिर पर लंबे फ्लैप नहीं लगे हैं लेकिन जिस तरीके से हमें पाला-पोसा जाता है और कंडीशन किया जाता है, वह हमें बाधित करने की कोई कसर नहीं छोड़ते। कोई भी हैंडमेड किसी और से उजूल-फ़िज़ूल की बात नहीं कर सकती, कहीं आ-जा नहीं सकती, अपनी पसंद के कपड़े नहीं पहन सकती और सबसे बड़ी बात, कुछ पढ़ भी नहीं सकती क्योंकि स्त्रियाँ अगर पढ़ लेंगीं तो वह समाज में अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होंगीं, जागरूक होंगीं तो अपनी परिस्थिति की तुलना अन्य देशों की ‘आज़ाद’ स्त्रियों से करेंगीं और फिर होगा विरोध। विरोध एकमात्र ऐसी चीज़ है जिससे सत्ता डरती है और विरोध दमन के लिए यह कुछ भी कर सकते हैं। यह दमनकारी नीतियाँ सारी सीरीज़ में उदाहरण के तौर पर हैं। सवाल करने पर औरतों को या तो करंट दिया जाता है या उन्हें सबके सामने फाँसी पर चढ़ाने की धमकी। 

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चार सीज़न में बंटी यह कहानी एक तरीके से पूरे समाज को चेतावनी देती है और स्त्रियों को आगाह करती है कि अगर इस समय आवाज़ नहीं उठाई तो हैंडमेड्स टेल का सच्चाई में बदल जाना दूर नहीं, जिसके लक्षण अभी से प्रत्यक्ष रूप से दिखने शुरू हो गए हैं। 

जून अपने ऑफ़रेड बनने से पहले के दिनों को याद करती है जब उसके पास अच्छी नौकरी थी, बच्ची थी, एक पति था और वह अच्छी-खासी ज़िंदगी बिता रहे थे। फिर अचानक विरोध प्रदर्शन शुरू हुए किन्तु पहले-पहल सबने नज़रंदाज़ किया। ख़तरे की घण्टी तब बजी जब सभी कामकाजी संस्थानों से औरतों को निकाल दिया गया। उनसे उनकी आर्थिक आज़ादी छीन ली गई।  यह घटनाएँ जैसे-जैसे घट रही थी, वैसे ही एक-एक करके हमारे सामने हमारे मन में बसे डर की परतें खुलती जा रही थी।

हैंडमेड टेल्स का एक सीन, तस्वीर: Hulu

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गिलियड में अन्य औरतें भी हैं जिनकी ज़िंदगियाँ भी वहाँ के पुरुषों के हाथ में टिकी हैं। उच्च वर्ग की औरतें जो बच्चा पैदा नहीं कर सकतीं, उनका अपनी आंखों के सामने अपने पति द्वारा किसी दूसरी औरत का रेप होते देखना आसान नहीं है। लेकिन वह अपनी धर्म कट्टरता के बोझ तले बंधी हैं और इस तरह की ज़िंदगी जीने को मजबूर हैं। ऐसी ही एक औरत का प्रतिनिधित्व करती सेरेना वॉटरफोर्ड का कैरेक्टर भी बहुत प्रभावित करता है। सेरेना शुरुआत में स्वयं इस तरह की ज़िंदगी का संदेश देती थीं और एक अच्छी वक्ता थीं, लेकिन बाद में यह दिखाया गया है कि औरत होने के नाते वह अपने ही जाल में फंसती चली गई। कहानी में एक दफ़ा जब वह अपने और सभी औरतों के हक़ की आवाज़ उठाती हैं तो उनके ही पति द्वारा उनका हाथ काट दिया जाता है। कहानी में एक अन्य स्त्री हैं आँट लीडिया। उनका दायित्व सभी हैंडमेड्स को ट्रेन करना और उन्हें पितृसत्तात्मक और रूढ़िवादी समाज के अनुसार फिर बनाना था। वह स्वयं भी इन्हीं रूढ़ नियमों का शिकार हैं और अब यही आगे अन्य औरतों को सिखा रही हैं। इसके अलावा हर घर में ‘मार्था’ रहती हैं जो घर का सारा काम करती हैं और सबकी सेवा करती हैं। वह भी अपनी मजबूरियों के कारण चुप रहती हैं। 

गिलियड में अत्याचारों का दृश्य इतना भयावह दिखाया गया है कि कोई इंसान सोच भी नहीं सकता कि इससे बुरा भी और कुछ हो सकता है। पर कहानी में एक दफ़ा जब वॉटरफोर्ड और ऑफ़रेड वाशिंगटन जाते हैं और जून वहाँ की हैंडमेड से मिलती है तो वह दृश्य देख कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। ताकि वहाँ की औरतें विरोध दर्ज़ न कर पाएं, उनके मुँह को स्टेपल पिन जैसी किसी चीज़ से बंद किया जाता है। इस कहानी के सभी दृश्य इतने प्रभावशाली तरीके से दर्शाए गए हैं कि स्वयं अटवुड भी इससे इंकार नहीं करतीं। तीसरे सीज़न के अंत तक ऑफ़रेड एक योजना बनाकर, अनन्त संघर्ष करके, बहुत सारे फँसे बच्चों को गिलियड से बाहर भेजती हैं। इस काम में उसकी मदद सभी ‘मार्था’ करती हैं। सभी औरतें एक साथ मिलकर, जान जोखिम में डालकर यह कार्य करती हैं और सफ़ल होती हैं। 

यह कहानी इतनी अच्छे तरीके से गढ़ी गई है कि प्रोटेस्ट साइट पर अक्सर हम औरतों को हैंडमेड जैसे कपड़े पहनकर विरोध करते हुए देख सकते हैं। यह औरतों को औरतों से जोड़ने का प्रतीक बन गई है। स्त्रियों का शोषित वर्ग स्वयं को इसके माध्यम से कनेक्टेड महसूस करता है। यह एक ऐसी फेमिनिस्ट सीरीज़ है जो हर इंसान को देखनी चाहिए। आज 21वीं सदी में, जहाँ स्त्रियों को अपने प्रजनन का अधिकार अपनी मर्ज़ी नहीं है, अबोर्शन का अधिकार नहीं है, पर्यायवरण की स्थिति बद से बद्तर होती जा रही है, वहाँ यह कहानी एक चेतावनी के रूप में खड़ी नज़र आती है। भविष्य में यदि हम चाहते हैं कि ऐसी स्थिति न आए, तो इसके कारणों को ध्यान में रखकर हमें कदम उठाने होंगे, आवाज़ उठानी होगी, विरोध दर्ज़ करवाना होगा और पढ़-लिख कर जागरूक होना होगा।

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तस्वीर साभार : thehollywoodgossip

प्रेरणा हिंदी साहित्य की विद्यार्थी हैं। यह दिल्ली यूनिवर्सिटी से अपनी स्नातकोत्तर की पढ़ाई कर रही हैं। इन्होंने अनुवाद में डिप्लोमा किया है। अनुवाद और लेखन कार्यों में रुचि रखने के इलावा इन्हें चित्रकारी भी पसंद है। नारीवाद, समलैंगिकता, भाषा, साहित्य और राजनैतिक मुद्दों में इनकी विशेष रुचि है।

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