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सिनेमा से अधिकतर हम बॉलीवुड या ज़्यादा से ज़्यादा हॉलीवुड और कोलीवुड की फिल्मों को ही फिल्में समझते हैं लेकिन आज हम आपको बताने जा रहे हैं सामाजिक मुद्दों पर बनी कुछ डॉक्यूमेंट्री फिल्मों के बारे में। लेकिन उससे पहले जान लेते हैं आखिर ये डॉक्यूमेंट्री फिल्में क्या और कैसी होती हैं। डॉक्यूमेंट्री शब्द डॉक्यूमेंट से आया है यानी संलेख करना। जो जैसा है उसे वैसा दस्तावेज के रूप में संजोए रखना। एक घटना, व्यक्ति, आदि के बारे में एक तथ्यात्मक फिल्म जो तथ्यों को बहुत कम या बिना कल्पना के प्रस्तुत करता है उसे डॉक्यूमेंट्री फिल्म कहते हैं। चलिए जानते हैं सामाजिक मुद्दों पर बनीं हिंदी बेल्ट की वे पांच डॉक्यूमेंट्री फिल्में जो आपको देखनी चाहिए।

1- इज्जतनगरी की असभ्य बेटियां

‘इज्जतनगरी की असभ्य बेटियां’ फिल्म मेकर नकुल सिंह साहनी द्वारा निर्देशित है। फिल्म का नाम भर यह बता रहा है कि तथाकथित इज़्ज़त को बनाने, बचाने में डूबा ये समाज अपनी इज़्ज़त जिन बेटियों, औरतों को कंट्रोल कर कर संरक्षित करता है वहां कुछ बेटियां ऐसी बनीं जिन्होंने इनके फरमान नहीं माने जो इनके कानून ना मानें वे असभ्य हो गईं, इनकी इज़्ज़त की नींव पर रचाई बनाई गई सभ्यता को नकार दिया। ये फिल्म ऐसी ही पांच लड़कियों के जीवन को दिखाती है जिन्होंने प्रेम से नफ़रत करते पितृसत्तात्मक समाज को उन्हीं के बनाए उसूलों के खिलाफ जाकर अपनी प्रेम की राह चुनी। हरियाणा में चलती खाप पंचायतों के महिला विरोधी, प्रेम विरोधी, जातिवादी नियमों को, उनके नफरती रवैए को नकुल साहनी ने बहुत बारीकी और ईमानदारी से फिल्म में डॉक्यूमेंट किया है।

हमारे समाज में ऑनर किलिंग एक आम बात हो चुकी है, ऑनर किलिंग यानी अपने तथाकथित सम्मान को बचाने के लिए एक दूसरे से प्रेम करते युवाओं को जान से मार देना। और ऐसा इसीलिए करना ताकि उनका जातीय दंभ, खानदानी इज्जत, पितृसत्ता बची रहे, वे जिन औरतों को हमेशा दबाकर किसी गुलाम की तरह रखना चाहते हैं, वे वैसी ही बनी रहें। खाप चलाना, ऑनर किलिंग करना असंवैधानिक है लेकिन ये बहुत बड़ी विडम्बना है कि भारतीय संविधान  इस देश में जातीय दंभ, पितृसत्ता से हमेशा नीचे रखा गया है जिसका डर तक लोगों को छूता नहीं है। अगर आपको खाप पंचायत की फंक्शनिंग, पितृसत्ता और जातीय दंभ का सीधा-सीधा विज़ुअल देखना है और ये भी कि कैसे प्रेमी युवाओं ने इसे चुनौती देकर अपना आगे का जीवन अपने आप चुना है जहां कोई कानून खाप को नहीं डरा सका वहां युवाओं का एक दूसरे से प्रेम करना और चुनौती देना डरा गया है तो आपको नकुल सिंह साहनी की ये फिल्म ज़रूर देखनी चाहिए। यह फिल्म यू ट्यूब पर उपलब्ध है।

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2- लकीर के इस तरफ

आज़ाद भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने डैम यानी जहां नदी का पानी संरक्षित करके रखा जाता है उन्हें आधुनिक भारत के मंदिर कह संबोधित किया था। लेकिन इस इन आधुनिक भारत के मंदिरों ने कैसे उस इलाके के लोगों को, उनके जीवन को प्रभावित किया उसका ज़िक्र कोई नहीं करना चाहता है। ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ पर्यावरण संरक्षण का एक बड़ा आंदोलन था जिसमें नर्मदा पर बनाए जा रहे सरदार सरोवर डैम से लोगों के विस्थापन और एक अच्छे खासे वन भूमि जाने की समस्या को लेकर शुरू हुआ था। लोगों, नेताओं ने सरदार सरोवर प्रोजेक्ट को विकास का एक बहुत बड़ा प्रोजेक्ट कहा था लेकिन वहां रह रहे करीबन 240 गांवों के लोगों की ज़मीन, घर खेत खलिहान सब डूब रहे थे जो किसी के लिए भी चिंता का सबब नहीं था। शिल्पा बल्लाल की यह डॉक्यूमेंट्री फिल्म उस प्रोजेक्ट के बाद वहां के आदिवासी लोगों के जीवन में हुए बदलाव, संघर्ष को उन्हीं के नजरिए से डॉक्युमेंट कर रही है। किस तरह से लोगों ने अपनी जमीनें खो दीं, खेत-खलिहान चले गए जो भूमंडलीकरण के दौर में उनकी आजीविका का सहारा थे और आज इतने सालों बाद उनका जीवन कैसा चल रहा है। लकीर के इस तरफ यानी लोगों का एक वो जत्था जिन्होंने सरदार सरोवर प्रोजेक्ट से विकास समझा और दूसरी तरफ वे लोग जिनका जीवन बुरी तरह आहत हुआ। इसीलिए ये फिल्म बुरी तरह आहत हुए तमाम लोगों के जीवन को दिखाती है। किसी भी बड़े प्रोजेक्ट का काम किसी दूसरे वर्ग के शोषण की नींव पर कैसे रखा जाता है उस स्थिति को शिल्पा बल्लाल ने ईमानदारी से डॉक्यूमेंट किया है। फिल्म यू ट्यूब पर उपलब्ध है।

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3- जय भीम कॉमरेड

जय भीम कॉमरेड मशहूर डॉक्यूमेंट्री फिल्ममेकर आनंद पटवर्धन की फिल्म है। फिल्म में आनंद ने मुंबई, महाराष्ट्र में 1997 में घटित रमाबाई किलिंग्स को डॉक्यूमेंट किया है। 11 जुलाई 1997 में मुंबई की रमाबाई कॉलोनी में डॉक्टर आंबेडकर की प्रतिमा पर जूतों की माला डाल दी गई थी जिसका विरोध स्थानीय दलितों ने किया। विरोध शांतिपूर्ण था लेकिन स्पेशल रिजर्व पुलिस ने गोलीबारी की जिसमें करीबन दस लोगों की जान गई इसके बाद भी बाकी दिन के विरोध-प्रदर्शन में पुलिस ने हिंसा की। लोगों का कहना था कि ये जातीय पक्षपात का नतीजा था। पुलिस का मुख्य इंस्पेक्टर पहले से ही दलितों पर अमानवीय व्यवहार के लिए जाना जाता रहा था। आनंद ने हिंसा में मारे लोगों के घरवालों का इंटरव्यू किया है। दलितों के जीवन, संघर्ष को दिखाया है। फिल्म के दूसरे भाग में खैरलांजी हत्याकांड और कबीर कला मंच की प्रस्तुतियों सहित बाद में उन पर नक्सली होने का दावा करते हुए कार्रवाई को भी दिखाया गया है। आनंद को इस फिल्म को बनाने में करीबन ग्यारह साल लगे। अगर आपको लगता है कि जातीय हिंसा, जाति व्यवस्था ब्रिटिश काल की कोई बात है जिसका ब्रिटिशर्स से पहले और बाद में कोई अस्तित्व नहीं है तो आनन्द पटवर्धन की जय भीम कॉमरेड देखिए। फिल्म यूट्यूब पर उपलब्ध है।

4- चिल्ड्रेन ऑफ पायर

फ़िल्म का नाम अंग्रेजी में है लेकिन फिल्म में संपूर्ण संवाद हिंदी में है। 2008 में रिलीज़ हुई फ़िल्म मेकर राजेश जाला की डॉक्यूमेंट्री फिल्म चिल्ड्रेन ऑफ पायर देश के सबसे व्यस्त शमशान घाटों में शामिल बनारस के मणिकर्णिका घाट पर सात दलित बच्चों द्वारा लाशें जलाने की पूरी प्रक्रिया, उनके संघर्ष, शोषण का ज़िंदा दस्तावेज है। मणिकर्णिका घाट को तमाम साहित्यकारों से लेकर वहां घूमने जाते टूरिस्ट अपने फेसबुक पोस्ट से लेकर यात्रा वृतांत में जितना हो सके उतना रोमेंटाइसाइज कर लिखते हुए नजर आते हैं। लेकिन वहां मुर्दों को जलाते लोग उनके समुदाय उनके बच्चों पर किसी का ध्यान नहीं जाता। जिन सात बच्चों का जीवन राजेश जाला दिखा रहे हैं उनमें से एक बच्चे ने महज पंद्रह वर्ष की उम्र में हज़ार से ज़्यादा लाशें अपने हाथों से जलाई हैं। उनके जीवन यापन का यही एक साधन है और इस काम में महज एक ही समुदाय शामिल है और वह है दलित समुदाय जिसकी जाति भिन्न-भिन्न प्रदेशों, इलाकों में भिन्न हो सकती है। फिल्म जिन पर है वे डोम जाति से हैं। इसीलिए आपकी कल्पनाओं में जो राख भभूत लग रही है वह किसी के शोषण का सबब है जिसे रोज़ गालियां मिलती हैं, मारे जाने की धमकियां मिलती हैं और जिल्लत भरा बचपन। हक़ीक़त में विश्वास रखने वाले व्यक्ति हैं तो आपको यह फिल्म ज़रूर देखनी चाहिए।

5- लेडीज़ फर्स्ट

अंग्रेजी नाम से यह फिल्म हिंदी में है और आपको जानकर शायद खुशी हो कि हाल ही में पेरिस में हुए आर्चरी चैंपियनशिप में जिस दीपिका कुमारी ने तीन तीन स्वर्ण पदक भारत के नाम किए हैं ये उन्हीं आर्चर दीपिका कुमारी पर बनी डॉक्यूमेंट्री फिल्म है। झारखंड के रोतू से आनेवाली दीपिका का जीवनयापन गरीबी में हुआ। गरीबी में रहते हुए टाटा आर्चरी एकेडमी में दाखिले से लेकर तमाम अंतरराष्ट्री. टूर्नामेंट खेल उनकी इस डॉक्यूमेंटरी ने संजोए हैं। इसीलिए जिस दीपिका पर आज हमें गर्व है हमें उनकी जीवन संघर्ष यात्रा भी जाननी चाहिए और ये समझना चाहिए कि इस देश ने अपने सामाजिक आर्थिक ढांचे की वजह से ना जाने कितने होनहार को गंवा दिया होगा। और जिन्हें लगता है लड़कियां स्पोर्ट्स में भाग नहीं ले सकती, उन्हें अपना भ्रम तोड़ने के लिए यह फिल्म देखनी चाहिए। फिल्म नेटफ्लिक्स पर उपलब्ध है।

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मेरा नाम आशिका शिवाँगी सिंह है, फिलहाल मिरांडा हाउस कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातक कर रही हूँ। मैं उस साहित्य और राजनीति की पक्षधर हूँ जो शोषितों की पक्षधर है। रोज़मर्रा के जीवन में सवाल करना, नई-नई आर्ट सीखना, व्यक्तित्व में लर्निंग-अनलर्निंग के स्पेस को बढ़ाना पसंद है।

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