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ज्योति (बदला हुआ नाम) बनारस ज़िले के सेवापुरी ब्लॉक के चित्रसेनपुर गाँव की रहने वाली है। मुसहर बस्ती से ताल्लुक़ रखने वाली ज्योति के सात बच्चे है। ज्योति आठवाँ बच्चा नहीं चाहती थी, जिसके लिए वह गर्भसमापन करवाने गाँव के एक छोटे अस्पताल पहुँची। वहाँ उनका असुरक्षित गर्भसमापन हुआ, जिससे वह बीमार रहने लगी। ज्योति की बीमारी को लेकर पूरे गाँव में अफ़वाह फैल गयी कि उसने अपने गर्भ में पलने वाले भ्रूण को ख़त्म करने की कोशिश की इसलिए ईश्वर ने उसे सजा दी और वो बीमार रहने लगी।

मेरे गाँव देईपुर में रहने वाली प्रिया (बदला हुआ नाम) दो बच्चों के बाद तीसरा बच्चा नहीं चाहती थी। इसलिए वो गर्भसमापन करवाना चाहती थी। पर गाँव में गर्भसमापन की सुविधा नहीं होने की वजह से प्रिया को बनारस शहर के एक प्राइवेट अस्पताल में जाना पड़ा। वहाँ उसे गर्भसमापन के लिए काफ़ी ज़्यादा पैसे भी देने पड़े।  

अगर हम बात करें गाँव की मुसहर बस्ती की तो यहाँ अक्सर महिला स्वास्थ्य से जुड़ी सुविधाएँ पहुँचने से पहले ही ख़त्म हो ज़ाया करती है, जिसका ख़ामियाज़ा महिलाओं को परिवार-नियोजन की सुविधाओं के अभाव में अनचाहे गर्भ की समस्या का सामना करना पड़ता है और वहीं दूसरी तरफ़ ग्रामीण क्षेत्रों में गर्भसमापन को लेकर अलग-अलग मिथ्य वाली बातें अक्सर सुनने को भी मिलती है। गाँव में गर्भसमापन को बच्चा गिरवाना या सफ़ाई करवाना के नाम से भी जाना जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में गर्भसमापन को लेकर ढ़ेरों मिथ्य सुनने को मिलते है, जो इसे पाप बताने का काम करते है। गर्भसमापन को लेकर ये मिथ्य महिलाओं पर एक अलग तरह का दबाव बनाते है, जिसकी वजह से कई बार महिलाएँ न चाहते हुए भी अनचाहे गर्भ को जन्म देने के लिए मजबूर हो जाती है।

भारत में हर दिन क़रीब तेरह महिलाएँ असुरक्षित गर्भसमापन की वजह से अपनी जान गँवाती है।

इंडिया टुडे में प्रकाशित खबर के अनुसार भारत में हर दिन क़रीब तेरह महिलाएँ असुरक्षित गर्भसमापन की वजह से अपनी जान गँवाती है। वहीं करीब 6.4 मिलियन महिलाएँ भारत में हर साल गर्भसमापन करवाती है। साथ ही, भारत में हर साल मात्रि मृत्यु की वजहों में आठ प्रतिशत मौत असुरक्षित गर्भसमापन की वजह से होती है।

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ये आँकड़े बताते है कि हमारे देश में असुरक्षित गर्भसमापन एक बड़ी समस्या है। लेकिन ताज्जुब की बात ये है कि जब गर्भसमापन को हमारे क़ानून ने हमें क़ानूनी अधिकार के रूप में दिया है तो फिर ये आँकड़े ऐसे क्यों है? एक रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार 80 प्रतिशत महिलाओं को ये जानकारी ही नहीं है कि गर्भसमापन अपने भारत में वैध है। गर्भसमापन को लेकर ये क़ानूनी अधिकार के प्रति जागरूकता के अभाव में अधिकतर महिलाएँ इस क़ानून के लाभ से अछूती रह जाती है। महिलाओं की इस जागरूकता के अभाव को कई बार प्राइवेट अस्पताल में गर्भसमापन को ग़ैर-क़ानूनी बता कर डराने और मनमाने तरीक़े से पैसे की लूट की जाती है। बता दें कि हमारे भारतीय संविधान में मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी ऐक्ट 1971 के तहत भारत में गर्भसमापन कानूनी रूप से वैध है। साल 2021 में, इस क़ानून  में संशोधन किया गया जिसमें विशेष मामलों में  प्रेगनेंसी के 24 हफ्तों तक अबॉर्शन को वैधता दी गई। गर्भसमापन एक  मेडिकल प्रकिया है जिसमें दवा और सर्जरी के माध्यम से प्रेगनेंसी को रोका जा सकता है। 

‘द लैंसेट ग्लोबल हेल्थ सर्वे’ की रिपोर्ट के अनुसार भारत में साल 2015 में कुल 15.6 मिलियन गर्भसमापन कराए गए थे। साथ ही, लैंसेट के ही साल 2018 में हुए एक और शोध से पता चलता है कि 15-49 आयुवर्ग की महिलाओं में हर 1000 में से 47 महिलाओं का गर्भसमापन हुआ है। इन आँकड़ों से पता चलता है कि गर्भसमापन महिलाओं की ज़रूरत है और उनका अधिकार भी।

गर्भसमापन हर महिला का अधिकार है। पर जागरूकता के अभाव में अधिकतर क़ानूनी अधिकारों की तरह महिलाएँ इससे दूर होती जा रही है। इसके साथ ही, हमें ये भी देखना ज़रूरी है कि सरकार की तरफ़ से महिलाओं तक सुरक्षित गर्भसमापन की सुविधा पहुँचाने के लिए जो केंद्र बनाए गए है उनकी संख्या बहुत सीमित है और जो केंद्र है भी उनके बारे में ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता न के बराबर है। इसलिए ज़रूरी है कि ग्रामीण महिलाओं की इन केंद्रों तक पहुँचाने की दिशा में काम किया जाए। इसके साथ ही, जातिगत भेदभाव के चलते अभी भी गाँव में मुसहर जैसे कई दलित-वंचित तबकों तक महिला स्वास्थ्य से जुड़ी सेवाओं को पहुँचाने का काम बेहद ज़रूरी है, क्योंकि बिना सरोकार के हम लाख सशक्तिकरण की बात करें लेकिन ये सशक्तिकरण अधूरा है।  

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तस्वीर साभार : www.ippf.org

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