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बीते 17 मार्च 2021 को भारतीय संसद के उच्च सदन ने ‘मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (अमेंडमेंट) बिल’ 2020 पास कर दिया। इस एक्ट के ज़रिये उस समय-सीमा को बढ़ा दिया है, जिसके भीतर गर्भसमापन कराया जा सकता है। यह संशोधन निचले सदन यानी लोकसभा द्वारा पिछले साल के मार्च महीने में पारित किया गया था। बताते चलें कि ‘द लैंसेट ग्लोबल हेल्थ सर्वे’ की रिपोर्ट के अनुसार भारत में साल 2015 में कुल 15.6 मिलियन गर्भसमापन कराए गए थे। साथ ही, लैंसेट के ही साल 2018 में हुए एक और शोध से पता चलता है कि 15-49 आयुवर्ग की महिलाओं में हर 1000 में से 47 महिलाओं का गर्भसमापन हुआ है। ऐसे आंकड़ों को देखते हुए यह जानना ज़रूरी हो जाता है कि मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (संशोधन) एक्ट, 2020 में क्या बदलाव किए गए हैं, जिससे इन सभी समस्याओं का समाधान हो सके। साथ ही, ऐसे दौर में जब वैश्विक पटल पर प्रजनन और गर्भसमापन के मुद्दे को लेकर अलग से बहस छिड़ी है और इन अधिकारों को मानवाधिकार की श्रेणी में रखा जाने लगा है। ऐसे में क्या यह एक्ट औरतों को उनके शरीर और गर्भ संबंधी मुद्दों पर अपनी इच्छा और चयन को आगे रखने का पर्याप्त अवसर देता है अथवा उनकी बुनिवादी स्वतंत्रता को ही सीमित करता है, यह समझना महत्वपूर्ण हो जाता है।

क्या है ‘मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी’ ?

‘मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी’ मूलतः अवांछित गर्भ को ख़त्म करने की प्रक्रिया है। भारत में गर्भसमापन के संबंध में ज़रूरी सेवाओं की उपलब्धता को कानूनी ढांचे के भीतर रखने के लिए मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ़ प्रेग्नेंसी एक्ट,1971 में पास किया गया था। उस कानून के तहत, गर्भसमापन कराने के लिए कुछ प्रावधान तय किए गए थे, जो निम्नलिखित हैं :

1. अगर गर्भ से महिला की जान को जोख़िम हो या वह उसके शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य के लिए खतरा हो।

2. इस बात की बड़ी संभावना हो कि वह बच्चा बड़ा होकर शारीरिक व मानसिक रूप से असामान्य हो।

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3. जब बलात्कार के कारण महिला गर्भवती हो। 

4. जब गर्भनिरोधक के विफ़ल होने से गर्भ ठहर जाए।

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एमटीपी कानून यह भी तय करता है कि गर्भसमापन कहां कराए जाएंगे। किस समय-सीमा के भीतर गर्भसमापन करवाए जा सकते हैं और साथ ही, कौन गर्भसमापन की प्रक्रिया में महिला का निर्देशन और परीक्षण कर सकता है। गर्भसमापन के लिए महिला की राय सबसे महत्वपूर्ण है। यह प्रक्रिया किसी भी सरकारी अस्पताल में राज्य मेडिकल रजिस्टर में नामांकित मेडिकल प्रैक्टिशनर द्वारा करवाई जा सकती है। 12 से 20 हफ़्ते की समय अवधि के गर्भ को दिए गए कारणों में से एक होने के आधार पर ख़त्म करवाया जा सकता है। इस कानून में समय-समय पर संशोधन और बदलाव होते रहे हैं, जैसे 2002 और 2003 का संशोधन, जिसके तहत वैध गर्भसमापन की प्रक्रिया को सहज और सुगम बनाने के लिए निजी स्वास्थ्य क्षेत्रों को भी शामिल किया गया। हालांकि, इस कानून में तमाम समस्याएं थीं, जिनको लेकर स्टेकहोल्डर लगातार सवाल उठाते रहे हैं। जैसे, समयावधि के भीतर गर्भसमापन कराने के लिए भी दो पंजीकृत मेडिकल प्रैक्टिशनर की अनुमति लेनी पड़ती थी। इसके अतिरिक्त आईपीसी की धारा 312 के तहत गर्भसमापन एक कानूनी अपराध है। यदि इस संदर्भ में दिए गए कारण एमटीपी के ढांचे के तहत नहीं हुए तो गर्भसमापन कराने वाले व्यक्ति को तीन साल और गर्भवती महिला को सात साल की उम्रकैद की सज़ा हो सकती है।

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क्या है मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (अमेंडमेंट) एक्ट 2020 ?

1. यह एक्ट प्रस्ताव रखता है कि गर्भसमापन के लिए तय की गई गर्भावधि 20 से बढ़ाकर 24 हफ़्ते कर दी जाए।

2. 20 हफ़्ते से पहले गर्भसमापन के लिए महिला को केवल एक पंजीकृत मेडिकल प्रैक्टिशनर की सहमति लेनी पड़े।

3. 20 से 24 हफ़्ते के गर्भ को खत्म करने के लिए दो पंजीकृत मेडिकल प्रैक्टिशनर की सहमति हो।

4. 24 हफ़्ते से अधिक के गर्भ को ख़त्म करने के लिए मेडिकल बोर्ड से मंजूरी ली जाए। इस मेडिकल बोर्ड में तीन विशिष्टता प्राप्त डॉक्टर और राज्य के कुछ प्रतिनिधि शामिल होंगे।

मार्च, 2020 की लोकसभा में बहुत अधिक गहन विमर्श और चिंतन किए बिना ही इस एक्ट को पारित कर दिया गया। हालांकि नारीवादी, मानवाधिकार के समर्थकों ने इसकी आलोचना करते हुए कहा कि यह गर्भसमापन को स्त्री-अधिकार के दृष्टिकोण में नहीं देखता। दरअसल, महिलाएं तमाम समस्याओं से जूझ रही होती हैं, अवसरों की उपलब्धता से लेकर संसाधनों और सुविधाओं तक पहुंच जैसे अनेक मुद्दे हैं, जिनको जुटाने के लिए महिलाओं को अतिरिक्त प्रयास करने होते हैं, ऐसे में गर्भसमापन व प्रजनन संबंधी निर्णय बाहर से थोपे हुए नहीं बल्कि पूरी तरह से उनके अपने चयन पर आधारित होने चाहिए।

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एक्ट की व्यापक आलोचना का क्यों ?

मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी संशोधन एक्ट 2020 के लोकसभा में बिना किसी व्यापक परिचर्चा के पास हो जाने के बाद से इसकी रूपरेखा को लेकर लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं। महिला नेताओं सहित नारीवादी चिंतक और अन्य कामकाजी महिलाएं इसे उनके निजी अधिकार क्षेत्र में बाहरी हस्तक्षेप की तरह देख रहे हैं। इस संबंध में शिवसेना की प्रियंका चतुर्वेदी कहती हैं, ”लोग इसे ‘अधिकार-सबंधी दृष्टिकोण’ मानकर चल रहे हैं, जबकि यह ‘आवश्यक्ता-संबंधी दृष्टिकोण’ है क्योंकि किसी भी गर्भवती महिला के लिए अपने भीतर पल रही जान को खत्म करने का निर्णय शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से बहुत चुनौती भरा होता है और इस एक्ट के तहत जिन मेडिकल बोर्ड के बनाने की बात की जा रही है, गर्भवती महिला का उन तक पहुंचना, तीन डॉक्टरों और अधिकारियों से बातचीत करना सीधेतौर पर उसका अपमान है, साथ ही यह उसकी निजता व चयन के अधिकारों का अतिक्रमण भी है।” 

तमाम लोग इस कानून की आलोचना करते हुए देश की मौजूदा स्वास्थ्य व्यवस्था की जर्जर हालत पर बात करते हुए कहते हैं कि असल में देखा जाए तो भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए प्रत्येक राज्य और यूनियन टेरीटरीज़ में मेडिकल बोर्ड की स्थापना और क्रियान्वयन के लिए न तो पर्याप्त वित्तीय निवेश है और न ही आधारभूत संरचना। ऐसे में व्यवहारिक तौर पर यह लगभग असंभव योजना ही है। अगर इनकी स्थापना हो भी जाती है, तब भी ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाली गर्भवती महिलाओं के लिए उनतक पहुंचना चुनौतीपूर्ण है। साथ ही, उन लोगों के लिए, जो अपना गर्भसमापन करवाना चाहते हैं। लगातार बाहरी आक्षेप और कारण बताने की प्रक्रिया बहुत ही अधिक शोषणकारी होगी। इसके साथ ही, ब्यूरोक्रेसी यानी अधिकारियों के काम करने की शैली और भारतीय शासन व्यवस्था पर काम के दबाव को देखते हुए यह अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है कि कैसे यह योजना सुरक्षित व स्वस्थ गर्भसमापन की प्रक्रिया से लिए अवरोधक होगी।

यह एक्ट विशेष रूप से केवल ‘गर्भवती महिलाओं’ को चिन्हित करता है, इसमें ट्रांस, नॉन-बाईनरी, इंटरसेक्स लोगों को शामिल नहीं किया गया है। साथ ही इसमें एक और बात समझने वाली है कि किस परिस्थिति में 20 से 24 हफ़्ते का समय मिला है। दरअसल, यह कानून उन महिलाओं की एक विशेष श्रेणी बनाता है, जो अत्यधिक जोख़िम सहने की स्थिति में हैं, जैसे बलात्कार सर्वाइवर, नाबालिग या शारीरिक रूप से विकलांग। इस प्रकार, ‘वल्नरेबल महिलाओं’ को ही 20 से 24 हफ़्ते की अवधि मिली है, जिसमें उन्हें मेडिकल बोर्ड को अपनी स्थिति समझानी होगी और तब ही वे गर्भपात करा सकती हैं। यह अपने आप में कितनी असंवेदनशील बात है कि एक ओर तो उनकी समस्याएं अधिक हैं, इस बात को सरकार समझ रही है, लेकिन बावजूद उसके उन्हें मेडिकल बोर्ड तक जाने, जहां इस बात की बड़ी सम्भावना है कि पुरूष बहुसंख्या होगी (विश्व स्वास्थ्य संगठन- WHO की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत में पुरुष-महिला डॉक्टर का अनुपात 5:1 है), के पुरुषों से इस बात की मंजूरी लेनी होगी कि वे गर्भपात करा सकती हैं।

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स्वास्थ्य के क्षेत्र में भारत की स्थिति

स्वास्थ्य के क्षेत्र में भारत का सार्वजनिक निवेश दुनियाभर में लगभग सबसे कम है। 2019-20 कि आंकड़ों के हिसाब से यह कुल जीडीपी का मात्र 1.6 फ़ीसद है, जो कि सभी की बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं को भी पूरा नहीं कर सकता। इसका मतलब है कि स्वास्थ्य पर होने वाला अधिकतर खर्च मरीज़ और उसके परिवार द्वारा वहन किया जाता है। 2016-17 के राष्ट्रीय स्वास्थ्य गणना (नेशनल हेल्थ अकाउंट) के आंकड़ों को देखें तो पता चलता है कि स्वास्थ्य पर आउट ऑफ पॉकेट-OOP यानी मरीजों द्वारा किया गया कुल खर्च 58.7 फ़ीसद था। इसी के साथ ही, एक आंकड़ा यह भी बताता है कि मुंबई के स्लम में रहने वाली क़रीब 17.4 फ़ीसद महिलाएं बच्चा पैदा करने के बाद की देख-रेख के खर्च के लिए कर्ज लेती हैं। ग्रामीण और अशांत इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए लोगों को अपने घर-बार, ज़मीन बेचना पड़ता है। ऐसी स्थितियों में सरकार समस्याओं को समझने के बावजूद उसे और अधिक जटिल बना रही है। 

पिछले कुछ समय में यह ख़तरा और अधिक बढ़ता जा रहा है क्योंकि केंद्रीय सरकारें स्वास्थ्य के क्षेत्र में निजी भागीदारी को बढ़ावा दे रही हैं। अब स्वास्थ्य एक बुनियादी अधिकार से हटकर ‘उपभोक्ता-वस्तु’ हो गया है और अस्पताल इसको बेचने वाले उद्योग। ऐसे में, अनपढ़ आदमी आदमी, औरतें इस जटिल प्रक्रिया में उलझकर रह जाएंगी। इस योजना की आलोचना इसलिए भी हो रही है क्योंकि भारतीय स्वास्थ्य क्षेत्र में पर्याप्त सुविधाओं सहित योग्य-पेशेवर स्वास्थ्यकर्मियों की बड़ी कमी है। 2017 के नेशनल हेल्थ प्रोफाइल के अनुसार, 10,200 व्यक्तियों पर सार्वजनिक क्षेत्र में केवल एक डॉक्टर उपलब्ध है। जिंदल स्कूल के सेंटर ऑफ जस्टिस, लॉ एंड सोसायटी द्वारा किए गए सर्वे की रिपोर्ट के मुताबिक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में उन डॉक्टरों की लगभग 80 फ़ीसद कमी है, जो सुचारू रूप से गर्भसमापन करा सकें। इन सभी आंकड़ों को देखकर साफ़ तौर पर पता चलता है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य सुनिश्चित करने में सरकारें विफ़ल रही हैं। देश की सार्वजनिक स्वास्थ्य संरचना की ख़राब स्थिति होने के कारण अधिकतर गर्भसमापन निजी क्षेत्रों और घरों में करवाए जाते हैं, जो कि महिलाओं के लिए आर्थिक-मानसिक और शारीरिक तौर पर अधिक शोषणकारी होते हैं। यह सब देखते हुए भी, मेडिकल बोर्ड की स्थापना करना और एक तय समय-सीमा गढ़कर उनके शरीर व जीवन में हस्तक्षेप करने की प्रवृत्ति राज्य के मूल स्वरूप व उसकी अंतर्निहित व्यवहार को दर्शाता है।

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तस्वीर साभार : Mint

गायत्री हिंदू कॉलेज से इतिहास विषय में ऑनर्स की पढ़ाई कर रही हैं। मूलत: उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र के एक छोटे से गांव से दिल्ली जाने वाली पहली महिला के रूप में उनके पास सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य से जुड़े बहुत सारे अनुभव हैं, जो इंटरसेक्शनल नारीवाद की ओर उनके झुकाव के प्रमुख कारक हैं। उनकी दिलचस्पी के विषयों में नारीवाद को गांवों तक पहुंचाना और ग्रामीण मुद्दों को मुख्यधारा में ले आना शामिल हैं।

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