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बाल विवाह की बेड़ियों से खुद को आज़ाद करने के साथ-साथ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में देश को आज़ाद कराने तक का सफर तय करने वाली और महिला शिक्षा में एक अहम भूमिका निभानेवाली ‘दुर्गाबाई देशमुख’ संविधान सभा की पंद्रह महिला सदस्यों में से एक थीं। दुर्गाबाई का पूरा जीवन प्ररेणा स्रोत है। भारत के आंध्र प्रदेश राज्य से भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने वाली दुर्गाबाई देशमुख का जन्म राजमाहेंद्री ज़िले में 15 जुलाई 1909 को हुआ था। उनके पिता बीवीएन रामाराव सामाजिक कार्यकर्ता थे। उनकी मां का नाम कृष्णवेनम्मा था। अपने पिता के द्वारा निस्वार्थ भाव से की गई सेवा का दुर्गाबाई के ऊपर बहुत ज्यादा प्रभाव पड़ा। उनकी माँ जिला कांग्रेस कमेटी की सचिव थीं। यही वजह रही की दुर्गाबाई देशमुख का बचपन से ही राजनीति और सामाजिक कार्यों की ओर रूझान रहा।

महज़ 8 साल की छोटी सी उम्र में ही उनका विवाह कर दिया गया था। लेकिन 15 साल की उम्र में उन्होंने गृहस्थ जीवन अपनाने से पहले ही अपने विवाह को तोड़ दिया। बाल विवाह की बेड़ियों से खुद को आजाद कर उन्होंने अपने जीवन की मजबूत नींव रखी। उम्र के जिस पड़ाव पर बच्चे दुनियादारी से अंजान होते हैं, 10 साल की उस उम्र से ही दुर्गाबाई देशमुख अपने गाँव में महिलाओं को पढ़ाने के लिए पाठशाला जाती थीं। वहां वह अपनी माँ के साथ 500 से अधिक महिलाओं को हिन्दी की शिक्षा दिया करती थीं। 12 वर्ष की आयु में उन्होंने शिक्षा के माध्यम के रूप में अंग्रेजी को थोपने का विरोध करने के लिए स्कूल छोड़ दिया था। 

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एक दफा उनकी पाठशाला में महात्मा गांधी, कस्तूरबा गांधी और दीनबंधु (सीएफ एंड्रूयूज) का आना हुआ। दुर्गाबाई के कामों से वे काफी प्रभावित हुए। इसके बाद दुर्गाबाई महात्मा गांधी के संपर्क में आईं और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेना शुरू कर दिया। 20 साल की उम्र तक उनकी प्रसिद्धी पूरे भारत में फैल चुकी थी। उनके भाषण देने की कला का हर कोई कायल था। अपने तार्किक बहस के लिए दुर्गाबाई का नाम बेहद मशहूर था।

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बाल विवाह की बेड़ियों से खुद को आज़ाद करने के साथ-साथ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में देश को आज़ाद कराने तक का सफर तय करने वाली और महिला शिक्षा में एक अहम भूमिका निभानेवाली ‘दुर्गाबाई देशमुख’ संविधान सभा की पंद्रह महिला सदस्यों में से एक थीं।

साल 1930 में जब महात्मा गांधी ने नमक सत्याग्रह आंदोलन की शुरुआत की तब दुर्गाबाई ने इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी भूमिका अहम थी। साल 1930 से 1933 तक वह तीन बार जेल गईं। लेकिन कोई भी वार-अत्याचार उनकी हिम्मत तोड़ने में सफल ना हो सका। नमक सत्याग्रह के दौरान वह एक बड़ी नेत्री के रूप में ऊभरकर सामने आईं।

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जेल से आने के बाद भी उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी। साल 1942 में उन्होंने मद्रास विश्वविद्यालय से अपनी मास्टर्स डिग्री में कानून का अध्ययन किया और मद्रास हाई कोर्ट में एक वकील के रूप में अभ्यास किया। आपराधिक मुकदमों की वकालत करने वाली वह पहली महिला वकील में से एक थीं। शिक्षा के लिए उनके प्रयास अतुलनीय हैं। मास्टर्स के दौरान जब कुलपति ने उन्हें कॉलेज में छात्रावास न होने के कारण दाखिला देने में आनाकानी की तब दुर्गाबाई ने अखबार में विज्ञापन निकाला कि जो लड़कियां छात्रावास के अभाव में शिक्षा ग्रहण नहीं कर पा रही हैं वे उनसे संपर्क करें। कुछ लड़कियों ने उनसे संपर्क किया और उन्होंने शिक्षा के लिए खुद हॉस्टल शुरू कर दिया।

दुर्गाबाई पर जारी किया गया डाक टिकट

साल 1946 में जब कैबिनेट मिशन भारत आया और भारत में संविधान निर्माण की प्रक्रिया चली तब दुर्गाबाई का संविधान बनाने की प्रक्रिया में मद्रास प्रांत से परिषद के सदस्य के रूप में चुनाव हुआ। वह संविधान सभा में अध्यक्षों के पैनल में अकेली महिला थीं। आज़ादी के बाद संविधान लागू होने के बाद भी वह राजनीति में काफी सक्रिय रहीं। साल 1952 में उन्हें योजना आयोग का सदस्य बनाया गया। बाद में वह समाज कल्याण बोर्ड की अध्यक्ष चुनी गईं। साल 1958 में भारत सरकार द्वारा स्थापित राष्ट्रीय नारी शिक्षा परिषद की पहली अध्यक्ष बनीं। 44 वर्ष की उम्र में साल 1953 में उन्होंने भूतपूर्व वित्तमंत्री चिंतामन देशमुख से शादी की जिसके गवाह खुद भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू बने थे।

चिंतामन देशमुख से शादी के दौरान की तस्वीर, तस्वीर साभार: The Hindu

महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों की शिक्षा उत्थान के लिए देशमुख ने अपना पूरा जीवन लगा दिया। शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए इन्हें नेहरू साक्षरता पुरस्कार, पॉल जी हॉफमन अवार्ड, युनेस्को अवार्ड और साल 1975 में भारत सरकार द्वारा पद्म विभूषण से पुरस्कृत किया गया। लंबी बीमारी के चलते साल 1981 में 71 वर्ष की आयु में इनका निधन हो गया। उनकी याद में दिल्ली मेट्रो की पिंक लाईन में साउथ कैंपस मैट्रो स्टेशन का नाम दुर्गाबाई देशमुख रखा गया है। अपने बचपन से ही उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में जो काम किए और योजना आयोग की सदस्य के तौर पर उन्हें आगे बढ़ाया, उसने भारत में महिला शिक्षा की स्थिति को बेहतर किया।

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I am Monika Pundir, a student of journalism. A feminist, poet and a social activist who is giving her best for an inclusive world.

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