इतिहास भानु अथैयाः भारत की पहली ऑस्कर विजेता

भानु अथैयाः भारत की पहली ऑस्कर विजेता

2012 में भानु अथैया ने ऑस्कर अवार्ड लौटाने का प्रस्ताव रखा। वह चाहती थीं कि उनके जाने के बाद ऑस्कर ट्राफी को सुरक्षित स्थान पर रखा जाए। अवॉर्ड की सुरक्षा के लिहाज से उन्होंने यह बात कही थी। भानू को लगा था कि उनकी मौत के बाद उनके परिवार वाले उनके सम्मान का सही तरीके से ध्यान नहीं रख पाएंगे।

सिनेमा जगत कपड़ों के फैशन के नये ट्रेंड के लिए जाना जाता है। पर्दे पर फिल्मी सितारों के द्वारा पहने गए कपड़ो से प्रेरणा लेकर लोग उनकी स्टाइल को फॉलो करते हैं। फिल्म जगत में सितारों के कपड़े तय करनेवाले को कॉस्ट्यूम या ड्रेस डिजाइनर कहते हैं। भारत की सबसे प्रसिद्ध और विश्व विख्यात कॉस्ट्यूम डिजाइनर हैं भानु अथैया। भानु अथैया का फिल्म इंडस्ट्री में एक बेहद शानदार करियर रहा है। उन्होंने बॉलीवुड से लेकर हॉलीवुड तक के दिग्गज निर्देशकों के साथ काम किया है। वह पहली ऐसी भारतीय महिला हैं जिन्हें ऑस्कर पुरस्कार मिला था।

शुरूआती जीवन

भानु अथैया का जन्म 28 अप्रैल 1929 को महाराष्ट्र के कोल्हापुर में हुआ था। इनके पिता का नाम अन्नासाहेब और माता का नाम शांताबाई था। इनके पिता पेशे से एक चित्रकार थे। सात भाई-बहनों में ये तीसरे नंबर की थीं। जब अथैया नौ साल की थीं इनके पिता का निधन हो गया था। सत्रह वर्ष की उम्र में औपचारिक शिक्षा पूरी करने के बाद भानु बॉम्बे (मुम्बई) चली गईं। उन्होंने जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट, मुंबई से स्नातक की डिग्री प्राप्त की थी और वह अपने बैच की गोल्ड मेडलिस्ट थीं। भानु को बाद में फ्रांस सरकार की ओर से कला, संस्कृति और सिनेमा की पढ़ाई के लिए स्कॉलरशिप मिली। भानु को स्केचिंग और कला का बहुत शौक था।

भानु ने अपने करियर की शुरुआत साल 1940 में फैशन इलस्ट्रेटर के रूप में एक मैंगजीन ‘ईव्स वीकली’ के साथ की। मैगजीन के संपादक ने बाद में एक बुटीक खोला और भानु को वहां काम करने का प्रस्ताव दिया। यहां उन्होंने अपने ड्रेस डिजाइनिंग के हुनर की खोज की और वहां अपने डिजाइन बनाने शुरू कर दिए। हालांकि उन्होंने कभी किसी फैशन स्कूल से कोई शिक्षा नहीं ली थी। यहीं से उनका ध्यान फिल्म इंडस्ट्री में ड्रेस डिजाइनिंग की ओर गया। साल 1950 में इन्होंने फिल्मों में ड्रेस डिजाइनिंग के लिए काम करना शुरू किया। इनका विवाह सतेन्द्र अथैया के साथ हुआ था। वह एक गीतकार और कवि थे।

भानु ऑस्कर अवॉर्ड से सम्मानित होने वाली पहली भारतीय बनीं। फिल्म ‘गांधी’ के लिए इन्हें ब्रिटिश डिजाइनर जॉन मोलो के साथ संयुक्त रूप से ऑस्कर मिला था।

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फिल्मी सफर की शुरुआत

भानु अथैया अपने फिल्मी जीवन में बहुत सी बेहतरीन फिल्मों का हिस्सा बनीं। उन्होंने लगभग सौ से भी ज्यादा फिल्मों में बतौर ड्रेस डिजाइनर काम किया था। अपने करियर की शुरुआत 1956 में फिल्म सीआईडी से गुरु दत्त जैसे बड़े कलाकार के साथ की थी। पहली फिल्म के बाद ही वह गुरु दत्त की टीम का एक हिस्सा बन गई थीं। इसके बाद उन्होंने गुरु दत्त की प्यासा, चौहदवीं का चांद, और साहिब बीबी और गुलाम जैसी सफल फिल्मों के लिए काम किया। पचास के दशक से सक्रिय भानु अथैया ने गुरु दत्त, राज कपूर, बीआर चोपड़ा, यशराज चोपड़ा, विजय आनंद, राज खोसला और आशुतोष गोवारिकर जैसे निर्देशकों के साथ काम किया था।

तस्वीर साभार: Inuth

भानु अथैया ने अपने काम के लिए बहुत प्रशंसा हासिल की थी। फिल्म ‘आमप्राली’ की विजयमाला हो या फिर फिल्म ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ की ज़ीनत अमान, इन सभी किरदारों ने जो कपड़े फिल्म में पहने उसने दर्शकों का ध्यान खींचा। इसके पहले महशूर फिल्म ‘गाइड’ के लिए वहीदा रहमान के किरदार को भी इन्होंने ही सजाया था। भानु अथैया ने पीरियड कहानियों और समकालीन फिल्मों के लिए काम किया। भानु अथैया लगातार अपने दौर की सफल फिल्मों का हिस्सा रहीं। इन्होंने गांधी, डॉ भीमराव आंबेडकर, लेकिन, लगान और स्वदेश जैसी अलग-अलग तरह की फिल्मों के किरदारों की पोशाक बनाई।

2012 में भानु अथैया ने ऑस्कर अवार्ड लौटाने का प्रस्ताव रखा। वह चाहती थीं कि उनके जाने के बाद ऑस्कर ट्राफी को सुरक्षित स्थान पर रखा जाए। अवॉर्ड की सुरक्षा के लिहाज से उन्होंने यह बात कही थी। भानू को लगा था कि उनकी मौत के बाद उनके परिवार वाले उनके सम्मान का सही तरीके से ध्यान नहीं रख पाएंगे।

फिल्म गांधी का मिलना

1982 में उनके जीवन में वह समय आया जब उन्हें हॉलीवुड के निर्देशक रिचर्ड एटनबरो के साथ काम करने का मौका मिला। इस फिल्म के लिए उनका चयन मील का पत्थर साबित हुआ। न्यूयार्क टाइम्स में प्रकाशित एक लेख के अनुसार, “रिचर्ड एक गंभीर फिल्म बना रहे थे और उन्हें किसी ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता थी जो भारत को बहुत गहराई से जानता हो।” रिचर्ड एटनबरो से भानु अथैया की मुलाकात के बाद वह फिल्म में अपना योगदान देने के लिए तैयार हो गई थी। बाद में फिल्म गांधी के लिए इनको एकेडमी अवॉर्ड फॉर बेस्ट कॉस्ट्यूम डिजाइन मिला। भानु ऑस्कर अवॉर्ड से सम्मानित होने वाली पहली भारतीय बनीं। फिल्म ‘गांधी’ के लिए इन्हें ब्रिटिश डिजाइनर जॉन मोलो के साथ संयुक्त रूप से ऑस्कर मिला था। भारत की ओर से यह उपलब्धि प्राप्त करने वाली वह पहली भारतीय महिला थीं।

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भानु अथैय्या ने अपने काम के ज]रिये न केवल भारत बल्कि दुनिया में नाम कमाया था। ऑस्कर के अलावा भी उन्होंने बहुत उपलब्धियां अपने नाम की हुई थीं। 1983 में ऑस्कर अवार्ड जीतने के साथ ही फिल्म गांधी के लिए ही बाफ्टा अवॉर्ड के लिए भी इनका नाम नॉमिनेट किया गया था। इसके अलावा यह दो बार भारतीय राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से भी सम्मानित की गऊं। 1991 में फिल्म ‘लेकिन’ और 2002 में फिल्म ‘लगान’ के लिए बेस्ट ड्रेस डिजाइनर के पुरस्कार से नवाजीं गई थीं। 2005 में साउथ एशियन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल की ओर से लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित किया गया। 2009 में भारत फिल्म फेयर लाइफटाइम अचीवमेंट से सम्मानित हुई। इसके साथ साल 2013 में लाडली लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से भी सम्मानित किया गया।

ऑस्कर लौटाने की इच्छा जताई

2012 में भानु अथैया ने ऑस्कर अवार्ड लौटाने का प्रस्ताव रखा। वह चाहती थीं कि उनके जाने के बाद ऑस्कर ट्राफी को सुरक्षित स्थान पर रखा जाए। अवॉर्ड की सुरक्षा के लिहाज से उन्होंने यह बात कही थी। भानू को लगा था कि उनकी मौत के बाद उनके परिवार वाले उनके सम्मान का सही तरीके से ध्यान नहीं रख पाएंगे। 2012 से इनका अवॉर्ड एकेडमी ऑफ मोशन पिक्चर आर्टस् एंड साइंस में रखा है। इससे पहले दुनिया में कुछ ऑस्कर विजेता ऐसा कर चुके हैं जिन्होंने मरने से पहले अपनी ट्राफी ऑस्कर ऑफिस में रखवा दी थी। दुनिया को अलविदा कहने से पहले भानु अथैया हर तरह से अपने काम व अनुभव को लोगों में बांटती रही। कॉस्ट्यूम डिजाइन के ऊपर उन्होंने ‘आर्ट ऑफ कॉस्ट्यूम डिजाइन’ के नाम से एक किताब भी लिखी थी। 15 अक्टूबर 2020 को ब्रेन ट्यूमर से इनकी मौत हो गई थी।

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तस्वीर साभारः scroll.in

About the author(s)

मैं पूजा राठी पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली हूँ। अपने आसपास के माहौल मे फ़िट नहीं बैठती हूँ।सामाजिक रूढ़िवाद, जाति-धर्मभेद, असमानता और लैंगिक भेद में गहरी रूचि है। नारीवाद व समावेशी विचारों की पक्षधर हूँ। खुद को एक नौसिखिया मानती हूँ, इसलिए सीखने की प्रक्रिया हमेशा जारी रखती हूँ।

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