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सुरैया उर्फ सुरैया जमाल शेख़ का नाम तो सुना होगा आपने। यह लेख आपको उनकी ज़िंदगी के कुछ हिस्सों से रूबरू कराने की एक कोशिश है। सुरैया एक अदाकारा होने के साथ-साथ हिंदी सिनेमा जगत की एक जानी-पहचानी गायिका थीं। वह 1940 के मध्य से अंत तक के दशक की सबसे लोकप्रिय और सबसे अत्यधिक भुगतान पाने वाली अभिनेत्री थीं। उनकी काबिलियत का अंदाज़ा इन्हीं बातों से लगाया जा सकता है कि लोग उन्हें उनके सुनहरे दिनों में मलिका-ए-हुस्न, मलिका-ए-तरन्नुम और मलिका-ए-अदाकारी के रूप में जानते थे। अगर बात करें उनकी शुरुआती ज़िंदगी की तो उन्होंने आठ साल की उम्र में ही हिंदी फिल्म जगत में अपना पहला कदम रखा। साल 1936 में जद्दन बाई की फिल्म ‘मैडम फैशन’ में सुरैया ने एक बाल कलाकार के रूप में अपनी शुरुआत की। इसके तुरंत बाद, उन्होंने न केवल नानूभाई वकील की फिल्म ‘ताज महल’ में छोटी मुमताज़ का किरदार निभाया, बल्कि पार्श्व गायन में भी शामिल हो गईं। 13 साल की सुरैया जब ऑल इंडिया रेडियो (बॉम्बे) में गाया करती थीं, तब उनकी आवाज़ संगीत निर्देशक नौशाद अली ने सुनी और उन्होंने सुरैया को अब्दुल राशिद कारदार की फिल्म ‘शारदा’  में मेहताब के लिए गाना गाने के लिए चुना। यहीं से उनके संगीत का सफर शुरू हुआ और धीरे- धीरे सुरैया के गानों का दौर आता गया।

संगीत के दौर के साथ- साथ उनकी अदाकारी ने जैसे फिल्म जगत में चार चांद लगा दिए थे। ‘स्टेशन मास्टर ‘, ‘तमन्ना ‘, ‘परवाना ‘, ‘यतीम ‘,  ‘हमारी बात ‘ और ‘फूल‘ जैसी फिल्मों में उन्होंने भले ही सह-कलाकार की भूमिका निभाई थी, लेकिन वह दर्शकों का पर्याप्त ध्यान अपनी अदाकारी की और आकर्षित करने में सक्षम रहीं। सुरैया फिल्म ‘अनमोल घड़ी’ में नूरजहां के साथ सह-कलाकार के रूप में और नौशाद के साथ संगीत निर्देशक के रूप में दिखाई दीं। पुराने समय के लोग बताते हैं कि मुख्य भूमिका में नूरजहां ने अपने गाने ‘आवाज़ दे कहां है ‘ से सबको मंत्रमुग्ध कर दिया था, इसके बावजूद, सुरैया ने अपने अभिनय और गायन के साथ एक शानदार प्रभाव डाला जिससे न केवल फिल्म बल्कि वह भी एक मिसाल बन गई। वहीं, नौशाद के संगीत के साथ और कारदार के निर्देशन में बनी संगीतमय फिल्म ‘दिललगी’ (1949) सिलवर जुबली हिट बन गई जिसमें सुरैया अपने गीतों और अभिनय के बलबूते राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हो गईं।

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इसमें कोई शक नहीं है कि सुरैया के गायन कौशल ने उनकी फिल्मों को बॉक्स ऑफिस पर सफलता दिलाई। एक गायक के साथ-साथ उन्होंने खुद को एक बेहतरीन कलाकार के रूप में भी स्थापित किया। ऐसा लगता है कि निजी जीवन के अनुभवों ने एक अभिनेत्री के रूप में उनके व्यक्तित्व में योगदान दिया। देव आनंद के साथ उनके रोमांस को उनकी नानी ने भले ही नकार दिया, लेकिन इसके गंभीर घावों ने उनकी संवेदनशीलता को बढ़ा दिया। उनकी शख़्सियत में वह स्थिरता और जुबां में वह घुली हुई मिठास उनकी अदाकारी में जैसे जान डाल देती। जैसा कि उनकी फिल्में ‘मिर्ज़ा गालिब‘, ‘शमा ‘, ‘वारिस‘ आदि उनके अद्भुत चित्रण को स्पष्ट करती हैं। सुरैया की फिल्म ‘मिर्जा ग़ालिब’  ने भारत में सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म के लिए 1954 में राष्ट्रीय पुरस्कार जीता। इसमें कोई दो राय नहीं है कि सुरैया ने एक अभिनेत्री के रूप में और एक गायिका के रूप में गालिब के ऊपर बनी इस फिल्म में चार चांद लगा दिए थे। जैसे की पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने फिल्म देखने के बाद टिप्पणी की थी, “तुमने मिर्ज़ा गालिब की रूह को जिंदा कर दिया।”

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सुरैया एक अदाकारा होने के साथ- साथ हिंदी सिनेमा जगत की एक जानी-पहचानी गायिका थीं। वह 1940 के मध्य से अंत तक के दशक की सबसे लोकप्रिय और सबसे अत्यधिक भुगतान पाने वाली अभिनेत्री थीं।

वहीं, सुरैया ने अपनी इस प्रशंसा को ऑस्कर से अधिक योग्य समझा। सुरैया के संगीत का सफर शुरू हुआ एक बाल गायिका के रूप में जिसमें उन्होंने फिल्म ‘नई दुनिया’ के ‘बूट करूं में पोलिश बाबू’ गाना गया। उनकी आवाज को आप ध्यान से सुनें और आप महसूस करेंगे कि सुरैया की सम्मोहक, विशिष्ट और शक्तिशाली आवाज़  संगीत के दृश्य को बदल सकती थी। ‘ये कैसी अजब दास्तां हो गई है’, ‘धड़कते दिल की तमन्ना’, ‘वो पास रहें या दूर रहें’, ‘मस्त’, आंखों में शरारत’, ‘तेरा ख्याल दिल से भुलाया ना जाएगा’ और ‘तेरे नैनों ने चोरी किया मेरा छोटा सा जिया’ जैसे गाने उनकी बेहतरीन गायिकी के प्रमाण हैं। वहीं, मिर्ज़ा ग़ालिब फिल्म से ‘दिल ए नादान तुझे हुआ क्या है’, ‘नुक्ता चीन है ग़म दिल’ और ‘ये ना थी हमारी किस्मत’ गाने सुनें ताकि आप यह महसूस कर सके कि पंडित नेहरू गलत नहीं थे। यहां तक ​​कि मोहम्मद रफी के साथ ‘बेकरार है कोई आ ज़रा’, ‘ये सावन रुत और हम तुम’, या श्याम के साथ ‘तू मेरा चांद मैं तेरी चांदनी’ जैसे गीत भी बेमिसाल हैं जो न केवल हमारी यादों में ताज़ा रहते हैं बल्कि अपने साथ एक युग लिए चलते हैं।

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उनके बेहतरीन गानों और फिल्मों की लंबी लिस्ट आपके सामने रखना तो उचित नहीं होगा, लेकिन आप उनके काम का अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि उन्होंने 1936 से 1963 तक के करियर में 67 फिल्मों में अभिनय किया और 338 गाने गाए। वहीं, हिंदी फिल्म जगत में सुरैया बेगम के शानदार योगदान के लिए, उनको कईं पुरस्कार से नवाज़ा गया जिसमें साल 1996 में स्क्रीन लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड भी शामिल है। साल 2003 में सुरैया को दादा साहेब फाल्के अकादमी और स्क्रीन वर्ल्ड पब्लिकेशन द्वारा दादा फाल्के की 134वीं जयंती पर एक विशेष समारोह में स्मृति चिन्ह से सम्मानित किया गया। वहीं, 2013 में ‘भारतीय सिनेमा के 100 साल’ पूरे होने के अवसर पर उन्हें सम्मानित करने के लिए इंडिया पोस्ट द्वारा विभिन्न भूमिकाओं में उनकी छवि वाला एक डाक टिकट भी जारी किया गया था। सुरैया की जिंदगी और करियर की जितनी बात करें उतनी ही कम होंगी। हिंदी फिल्मों के जगत में जो ठहराव, सुरैया के युग में था आज शायद उस स्थिरता को ढूंढना हमारे लिए मुश्किल होगा। वहीं, सुरैया की अदाकारी और गायन का मुकाबला शायद ही आज के युग में कोई कर पाएगा।

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तस्वीर : फेमिनिज़म इन इंडिया

मेरा नाम वांशिक पाल है| दिल्ली विश्वविद्यालय के गार्गी कॉलेज की छात्रा हूँ| दिल्ली में ही हमेशा से रही हूँ, तो दिल्ली की गलियों को ही देखा है, लेकिन ताज्जुब की बात तो यह है की अभी तक पूरी दिल्ली नहीं देखी| बात करें मेरे बारें में तो अभी तक मुझे इतना ही पता है, जितना मेरे आधार कार्ड पर फिट हो सकें| अपने बारें में कभी इतनी गहराई में सोचनें का मौका ही नहीं मिला, क्योंकि अभी तक के सारे फैसले घरवालों ने लिए है| अब सोचती हूँ, तो लगता है जैसे अभी तक तो कुछ किया ही नहीं है| बाकी पेंटिंग करना, गाने सुनना, किताबें पढ़ना और छोटे बाल रखना मेरे कुछ शौक है| हर जगह गलतियाँ करना जैसे मेरा एक मात्र काम है| बाकी ज़िंदगी में कुछ नया सीखने की कोशिश में लगी रहती हूँ, लेकिन उनसे बोर भी बहुत जल्दी हो जाती हूँ| सिनेमा देखना, गानों के साथ गाने गाना और आस पास की कहानियों को अपने फोन में रखना जैसे एक मात्र प्यार है| बाकी हर एक बात पर "क्यों?" पूछना पसंद करती हूँ|

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