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लोकसभा में दो साल पहले सरोगेसी (रेगुलेश्न) बिल को पारित करने के बाद सरकार ने अब असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी रेगुलेश्न बिल को पारित किया है। असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी रेगुलेश्न बिल 2020, देश में असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (एआरटी) सेवाओं को सुरक्षित और नैतिक तरीके से करने का प्रावधान करता है। यह बिल डोनर्स, एआरटी के माध्यम से बच्चा पैदा करने की चाह रखने वाले दंपत्ति और इससे पैदा हुए बच्चों के अधिकारों की रक्षा का प्रावधान करता है। इससे पहले महिलाओं के प्रजनन अधिकारों की रक्षा के लिए एक और महत्वपूर्ण सरोगेसी (रेगुलेश्न) बिल साल 2019 में लोकसभा में पारित किया गया था। इसके बाद इसे एक स्थायी समिति को भेजा गया था, जिसके सुझाव अनुसार एआरटी बिल को पहले लाया जाना जरूरी था ताकि सरोगेसी (रेगुलेश्न) बिल, 2019 के सभी तकनीकी और चिकित्सकीय पहलुओं को संबोधित किया जा सके। एआरटी बिल एआरटी क्लीनिकों और बैंकों को नियमित करने और इन पर निगरानी रखने में मददगार होगा। साथ ही, यह एआरटी सुविधाओं के दुरुपयोग को रोकने का प्रयास भी करेगा।

क्या है असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी रेगुलेश्न बिल ?

एआरटी बिल इस क्षेत्र के सभी क्लीनिकों, चिकित्सकीय पेशेवरों और एग/स्पर्म बैंक के लिए राष्ट्रीय स्तर पर रजिस्ट्रेश्न और पंजीकरण अधिकारियों का प्रस्ताव करता है। हालांकि पंजीकरण कुछ निर्धारित मानकों को पूरा करने के बाद ही हो सकेगा। यह बिल सेक्स सेल (गैमीट) डोनर्स के पात्रता और मानदंड को निर्दिष्ट करता है कि वे कितनी बार और किन शर्तों के तहत दान कर सकते हैं। एआरटी बिल प्रजनन क्लीनिक और स्पर्म बैंकों के लिए भी मानक और नियम निर्धारित करेगा। बिल के तहत लिंग चयन का प्रावधान देते ऐसे क्लीनिक, एआरटी के माध्यम से पैदा हुए बच्चों को छोड़ देना या उनका शोषण करना आपराधिक होगा। इसके अलावा, मानव भ्रूण की खरीद, बिक्री और आयात या किसी भी रूप में संबंधित जोड़े या दान दाताओं के शोषण को आपराधिक माना जाएगा। लाइव लॉ में छपी खबर अनुसार इन नियमों के उल्लंघन करने वालों को 8 से 12 साल तक की जेल की सजा और 5 लाख रुपए से 20 लाख रुपए तक जुर्माने का प्रावधान किया गया है।

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एआरटी बिल के कुछ प्रमुख प्रस्ताव निम्नलिखित हैं :

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  • एआरटी सेवाओं को विनियमित करना, महिलाओं और बच्चों को शोषण से बचाना।
  • एग डोनर्स के लिए बीमा कवर और मल्टिपल एंब्रायो ईंप्लांटेश्न यानि एकाधिक भ्रूण आरोपण से होने वाले स्वास्थ्य जोखिमों से मां और बच्चे को सुरक्षा प्रदान करना।
  • एआरटी पद्धति से पैदा हुए बच्चों को जैविक रूप से पैदा हुए बच्चों के समान अधिकार प्रदान करना।
  • एआरटी बैंकों के माध्यम से स्पर्म, अंडे और भ्रूण के क्रायोप्रिजर्वेशन (कोल्ड स्टोरेज) को विनियमित करना।
  • सहायक प्रजनन तकनीक के माध्यम से पैदा हुए बच्चों के लाभ के लिए प्री इंप्लांटेश्न जेनेटिक टेस्टिंग को अनिवार्य बनाना।
  • एआरटी क्लीनिकों और बैंकों का उचित पंजीकरण सुनिश्चित करना।

द इंडियन एक्स्प्रेस की एक खबर मुताबिक पिछले 20 सालों में भारत में एआरटी क्लीनिकों की वृद्धि दुनिया में सबसे अधिक हुई है। इससे पहले देश में ऐसे क्लीनिकों के लिए कोई मानक या नियम मौजूद नहीं था। इनके नैतिकता, चिकित्सकीय और कानूनी पहलुओं को बनाए रखने के लिए यह बिल पारित किया गया है। राज्यसभा की स्थायी समिति ने अपने रिपोर्ट में पूरे देश में विभिन्न प्रजनन प्रक्रियाओं और सेवाओं के लिए ‘समान खर्च’ और विश्व की तुलना में ‘गुणवत्ता मानकों’ को सुनिश्चित करने की बात पर ज़ोर दिया है। इसके लिए कमिटी के अनुसार एआरटी के संचालन प्रक्रियाओं के मानक को तैयार किया जाना ज़रूरी था। ऐसे क्लीनिकों और बैंकों का एक केंद्रीय डेटाबेस बनाया जाएगा। साल 2008 में भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) ने फर्टिलिटी चिकित्सा उद्योग को नियमित करने के लिए बिल का पहला प्रारूप तैयार किया था। एआरटी क्लीनिक स्पर्म डोनेशन, इंट्रायूटेराइन इंसेमिनेश्न, इन-विट्रो-फर्टिलाइज़ेश्न, इंट्रासाइटोप्लाज़्मिक स्पर्म इंजेक्शन और प्री-इंप्लांटेशन जेनेटिक डायागनोस्टिक जैसी पद्धतियों की सुविधा प्रदान करते हैं।

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एआरटी के अनुसार सिर्फ ऐसी महिलाएं ही डोनर बन सकती हैं, जो पहले से माँ बन चुकी हो। हमारे पितृसत्तात्मक समाज में आज भी ऐसी महिलाओं का माँ बनना उनके चरित्र पर सवाल खड़ा कर देता है जिनकी शादी न हुई हो। जहां ऐसे बिल आधुनिक मेडिकल और वैज्ञानिक दुनिया की ओर बढ़ने के लिए महत्वपूर्ण है, वहीं ऐसी शर्तें नीति निर्माताओं के उसी दक़ियानूसी सोच को दर्शाती हैं जहां औरतों का महत्व केवल जन्म देने में ही है।

सरोगेसी (रेगुलेश्न) बिल और एआरटी रेगुलेश्न बिल में अंतर

सरोगेसी रेगुलेश्न बिल सरोगेसी से संबंधित है जहां कोई तीसरा व्यक्ति यानि सेरोगेट महिला मां बनती है। सरोगेसी (रेगुलेश्न) बिल केंद्रीय और राज्य स्तर पर राष्ट्रीय और राज्य बोर्डों की आधिकारिक स्थापना करके भारत में सरोगेसी को विनियमित करने का प्रस्ताव करता है। इस अधिनियम के अंतर्गत देश में सरोगेसी सेवाओं को कानूनी दायरे में लाकर व्यवस्थित किया जा सकेगा। हालांकि व्यावसायिक तौर पर मानव भ्रूण और सेक्स सेल्स (गैमीट) की बिक्री और खरीद प्रतिबंधित होगी, लेकिन नैतिकता के मानदंडों पर सरोगेसी की अनुमति दी जाएगी। इसमें भारतीय विवाहित दंपति, भारतीय मूल के विवाहित दंपति और भारतीय एकल महिला (विधवा या तलाकशुदा) को कुछ शर्तों को पूरा कर सरोगेसी करने की अनुमति दी गई है। सरकार के मुताबिक इससे अनैतिक रूप से सरोगेसी का इस्तेमाल या सरोगेसी के व्यवसायीकरण को रोका और नियंत्रित किया जा सकेगा। इस तरह सरोगेसी के माध्यम से पैदा होने वाले बच्चों और सरोगेट मांओं के संभावित शोषण को भी रोका जा सकता है।

वहीं, एआरटी में ऐसे दंपतियां जो जैविक कारणों से बच्चे पैदा नहीं कर सकते, वे अनिवार्य रूप से किसी तीसरे व्यक्ति की मदद लिए बिना माता-पिता बन सकते हैं। सरोगेसी बिल के प्रावधानों से भिन्न एआरटी प्रक्रियाओं की सुविधाएं विवाहित जोड़े, लिव-इन पार्टनर्स, एकल महिलाएं और विदेशियों के लिए भी उपलब्ध होगी। विदेशी चिकित्सकीय पर्यटन के तहत भारत आकर एआरटी सेवाओं का लाभ उठा सकते हैं। एआरटी के मुताबिक ओहसाइट्स (डिंब) डोनर कोई ऐसी विवाहित महिला हो सकती है, जिसके पास कम से कम 3 वर्ष के आयु का अपना जीवित बच्चा हो।

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क्यों हुआ एआरटी 2020 का विरोध

लोकसभा में एआरटी बिल पर बहस करते हुए तमिलनाडु के कांग्रेस सांसद केपी चिदंबरम ने इस बात पर ज़ोर दिया कि क्या यह बिल LGBTQ समुदाय, लिव-इन जोड़ों और एकल पुरुषों को एआरटी की सुविधाएं प्रदान करेगा। लाइव लॉ में छपी खबर मुताबिक विपक्ष के इस अहम मुद्दे को उठाए जाने पर सरकार ने स्पष्ट किया है कि अडॉप्शन रेगुलेशन्स 2017 के अनुसार कोई भी एकल पुरुष किसी लड़की को गोद नहीं ले सकते। चूंकि लिंग निर्धारण कानूनी रूप से वैध्य नहीं है, इसलिए किसी एकल पुरुष के लिए एआरटी का लाभ उठा पाना संभव नहीं होगा। हालांकि माता-पिता बनने के लिए कोई एकल महिला एआरटी का लाभ उठा सकती है। ऐसे में, यह LGBTQ व्यक्तियों को भी अपने दायरे में लेता है। चिदंबरम ने ‘डोनर’ के गोपनियता पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि इस पद्धति में डोनर के आधार कार्ड की मांग की जा रही है, तो ऐसे में डोनर के डेटा लीक होने की संभावना है। गौरतलब हो कि एआरटी बिल के नियमावली में डोनर का ‘नाम, पता और पहचान’ लेने की बात कही गई है।          

साथ ही, एआरटी बिल के तहत राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर सरोगेसी बोर्ड बनाने की बात कही गई है, जिसके लिए पहले सरोगेसी रेगुलेश्न बिल को लागू करने की जरूरत होगी। इसके अलावा, एआरटी के अनुसार सिर्फ ऐसी महिलाएं ही डोनर बन सकती हैं, जो पहले से मां बन चुकी हो। हमारे पितृसत्तात्मक समाज में आज भी ऐसी महिलाओं का मां बनना उनके चरित्र पर सवाल खड़ा कर देता है जिनकी शादी न हुई हो। जहां ऐसे बिल आधुनिक मेडिकल और वैज्ञानिक दुनिया की ओर बढ़ने के लिए महत्वपूर्ण है, वहीं ऐसी शर्तें नीति निर्माताओं के उसी दक़ियानूसी सोच को दर्शाती हैं जहां औरतों का महत्व केवल जन्म देने में ही है। महिला सशक्तिकरण और लैंगिक समानता की दौड़ में हम आगे तभी बढ़ सकते हैं जब पितृसत्ता और रूढ़िवाद को दरकिनार कर ऐसे बिल प्रस्तावित किए जाए।

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तस्वीर साभार : DNA India

कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से हिंदी में बी ए और पंजाब टेक्निकल यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद बतौर पत्रकार और शिक्षिका मैंने लम्बे समय तक काम किया है। बिहार और बंगाल के विभिन्न क्षेत्र में पले-बढ़े होने के कारण सामाजिक रूढ़िवाद, धार्मिक कट्टरपन्त, अंधविश्वास, लैंगिक और शैक्षिक असमानता जैसे कई मुद्दों को बारीकी से जान पायी हूँ। समावेशी नारीवादी विचारधारा की समर्थक, लैंगिक एवं शैक्षिक समानता ऐसे मुद्दें हैं जिनके लिए मैं निरंतर प्रयासरत हूँ।

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