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अबॉर्शन शब्द सुनते ही हमारा समाज सबसे पहले किसी व्यक्ति के निजी जीवन, कामकाज और तौर तरीकों के बारे में गलत धारणा गढ़ लेता है। सदियों से औरतों के शरीर को केवल प्रजनन से जोड़कर हमें यह पाठ पढ़ाया गया है कि उसका महत्व जन्म देने में ही है। इसलिए प्रजनन स्वास्थ्य को लोगों के अधिकार के रूप में अपनाना पितृसत्तात्मक समाज को मंज़ूर नहीं। ऐसे में, सेल्फ मैनेज्ड मेडिकल अबॉर्शन या सेल्फ इंदुस्ड मेडिकल अबॉर्शन पितृसत्तात्मक समाज के लिए एक ‘अनैतिक और गैर- जरूरी प्रक्रिया’ बनकर रह जाती है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अभाव में अबॉर्शन के साथ कई मिथक जुड़ गए हैं। हमारा पितृसत्तात्मक समाज लोगों को अपनी इच्छा से अबॉर्शन का विकल्प चुनने की इजाज़त नहीं देता।

वहीं, दूसरी तरफ, आम तौर पर विवाहित लोगों विशेषकर महिलाओं को यौन और प्रजनन स्वास्थ्य से जुड़ी उनकी इच्छा, सहमति या जरूरतों के अनुसार फैसले करने का अधिकार नहीं दिया जाता। इसलिए, जब कभी भी लोग अपनी जरूरत या इच्छा से अबॉर्शन की बात करते हैं तो उन्हें चरित्रहीन, गैर-जिम्मेदार और ममताहीन घोषित कर दिया जाता है। सेल्फ मैनेज्ड मेडिकल अबॉर्शन से जुड़ी सोच के कारण समाज में निंदा और बहिष्कार होने के शर्म और डर से लोगों को इससे बचने, छिपाने और नतीजन अबॉर्शन के असुरक्षित तरीके अपनाने पड़ते हैं।

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हालांकि, भारत सहित दुनियाभर के कई देशों में एक निश्चित समय सीमा तक, शर्तों के साथ अबॉर्शन की मंजूरी दी गई है लेकिन आज भी इसे मानवाधिकार के रूप में हर जगह स्वीकृति नहीं मिली है। यह गौर करने वाली बात है कि जहां हमारा समाज अबॉर्शन को नकारता है, वहीं विश्व स्वास्थ्य संगठन जन स्वास्थ्य और कल्याण को बढ़ावा देने के लिए, खुद के देखभाल और बचाव के दिशानिर्देश में सेल्फ टेस्टिंग, सेल्फ मैनेजमेंट और सेल्फ अवेरनेस पर ज़ोर देता है। इसमें यौन और प्रजनन स्वास्थ्य के तहत असुरक्षित अबॉर्शन से बचने के लिए, गर्भावस्था के पहले तिमाही में सेल्फ मैनेज्ड मेडिकल अबॉर्शन प्रक्रिया का सुझाव मौजूद है। इसके अलावा सेल्फ मैनेज्ड मेडिकल अबॉर्शन की प्रक्रिया में इस्तेमाल की जाने वाली दवाएं डब्ल्यूएचओ की आवश्यक दवाओं की सूची में हैं।

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डब्ल्यूएचओ के अनुसार, ऐसे सभी व्यक्ति जो गर्भवती हो सकते हैं; मसलन महिलाएं, लड़कियां, ट्रांस व नॉन बाईनरी समुदाय के लोग जो मेडिकल अबॉर्शन और देखभाल चाहते हैं, उन्हें अपने स्वास्थ्य और मानवाधिकार से संबंधित सभी ज़रूरी जानकारी दी जानी चाहिए। यह लैंगिक समानता को बढ़ावा देगा और भेदभाव को कम करने में मदद करेगा। इस जानकारी के साथ, व्यक्ति स्वतंत्रता और जिम्मेदारी से अपने बच्चों की संख्या, दूरी या समय तय कर सकते हैं। डबल्यूएचओ के अनुसार चाहे किसी व्यक्ति की कोई भी वैवाहिक स्थिति क्यों न हो, उसे वैज्ञानिक प्रगति और इसके प्रयोगों के लाभों का इस्तेमाल करने का पूरा अधिकार है।

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जब कभी भी लोग अपनी जरूरत या इच्छा से अबॉर्शन की बात करते हैं तो उन्हें चरित्रहीन, गैर-जिम्मेदार और ममताहीन घोषित कर दिया जाता है। सेल्फ मैनेज्ड मेडिकल अबॉर्शन से जुड़ी सोच के कारण समाज में निंदा और बहिष्कार होने के शर्म और डर से लोगों को इससे बचने, छिपाने और नतीजन अबॉर्शन के असुरक्षित तरीके अपनाने पड़ते हैं।

अबॉर्शन से क्यों जुड़े हैं मिथक और पूर्वाग्रह

अबॉर्शन या सेल्फ मैनेज्ड मेडिकल अबॉर्शन से जुड़े मिथकों के कारण लोगों को अबॉर्शन से जुड़ी सही जानकारी, सेवाएं, दिशा-निर्देश, दवाएं या अबॉर्शन के बाद देखभाल की कमी होती है। अबॉर्शन से जुड़ी दक़ियानूसी सोच से केवल आम जनता ही नहीं, कई बार चिकित्सक खुद भी प्रभावित होते हैं। इसके साथ-साथ लोगों का अबॉर्शन को लेकर खुलकर अपने निर्णय न बता पाना, उनपर आर्थिक बोझ का कारण भी बन सकता है।  

अबॉर्शन से मिथक और सामाजिक पूर्वाग्रह के जुड़े होने का अहम कारण लोगों से हमेशा मातृत्व की आशा और उनकी शादी से पहले यौन संबंध को गलत मानने की प्रथा है। इस रूढ़िवादी विचार से न सिर्फ वे बल्कि उसके आस-पास के लोग जैसे परिवार, दोस्त या रिश्तेदार, स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान करने वाला और मेडिकल सुविधाएं या दवाएं मुहैया कराने वाला भी प्रभावित होते हैं। इसलिए भारत में अमूमन अगर जागरूक लोग अबॉर्शन की दवाइयां मेडिकल दुकान पर लेने जाते भी हैं तो उन्हें हीन नज़र से देखा जाता है। कई बार दुकानों में सिर्फ इसलिए दवाएं मौजूद नहीं होती कि ऐसा करना दुकानदार की नैतिकता या समझदारी के विपरीत होती है। अजन्मे भ्रूण को एक जीते-जागते इंसान की तरह देखना और उससे जुड़ाव की पृष्ठभूमि तैयार कर देना भारतीय समाज में आम है। कई बार अबॉर्शन को सिर्फ इसलिए नकारा जाता है क्योंकि इसे असुरक्षित और असामान्य समझा जाता है। अबॉर्शन के कलंक का सामना करने वाले लोगों के लिए चुप रहना या छुपाना सामाजिक अवहेना से बचने का एक महत्वपूर्ण तंत्र है। लेकिन लोगों की उम्मीद के विपरीत अबॉर्शन या सेल्फ मैनेज्ड मेडिकल अबॉर्शन पर चुप्पी लोगों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती है। 

भारत में अबॉर्शन पर क्या हैं कानून

भारत में साल 1971 से मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी (एमटीपी) अधिनियम मौजूद है। इसके बाद, महिलाओं के स्वास्थ्य और सुरक्षा को मद्देनज़र रखते साल 2021 में इस अधिनियम में संशोधन किया गया। अब, नए अधिनियम के अनुसार अबॉर्शन के लिए विशेष परिस्थिति और मामलों में 20 हफ़्तों की ऊपरी सीमा को 24 हफ़्तों तक वैध किया गया है। भले यह कानून महिलाओं का अपने शरीर पर अधिकार, अच्छे स्वास्थ्य और न्याय को बढ़ावा देने के लिए थे, लेकिन आज तक हमारी नीति बनाने वाले पूरी तरह से सामाजिक पूर्वाग्रह और रूढ़िवादी मानसिकता से मुक्त नहीं हो पाए हैं। हालांकि सरकारी वेबसाइट महिलाओं की स्वास्थ्य और सुरक्षा की दलील देती है, लेकिन यह महिलाओं की गरिमा की बात भी पृष्ठभूमि से ओझल नहीं होने देती। इस रूढ़िवादी सोच के कारण जब बात अबॉर्शन की होती है, तो अबॉर्शन करवाने वालों को यह महसूस कराया जाता है कि वे अपने संस्कार, संस्कृति और गरिमा के विरुद्ध कुछ गलत कर रहे हैं।

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लोगों का अबॉर्शन के लिए सेल्फ मैनेज्ड मेडिकल तरीका चुनना उनका अधिकार होना चाहिए। इसके लिए समाज के प्रति उन्हें जवाबदेह होने की ज़रूरत नहीं है और न ही अपराधी महसूस करने की।

सेल्फ मैनेज्ड मेडिकल अबॉर्शन से जुड़ी सोच और इसका प्रभाव  

सुरक्षित सेल्फ मैनेज्ड मेडिकल अबॉर्शन के लिए जरूरी है कि अबॉर्शन से जुड़े कानून की जानकारी हो और सुविधाएं आसानी से मिले। वास्तव में, लोगों के गर्भधारण के फैसले में सबसे ज्यादा शारीरिक, मानसिक, आर्थिक या भावनात्मक बदलाव उसी के जीवन में आते हैं। इसलिए इस फैसले में सबसे ज्यादा और पहला अधिकार उनका ही होना चाहिए। हमारे समाज में प्रचलित पितृसत्तात्मक अवधारणा के कारण अक्सर महिलाएं, एलजीबीटी+ समुदाय से आनेवाले लोग या तो डॉक्टर के पास जाने में कतराते हैं या डॉक्टर खुद उसे अबॉर्शन के लिए साफ तौर पर मना कर देते हैं। इंडियास्पेंड में छपे एक सर्वे पर आधारित रिपोर्ट बताती है कि 1 मई 2019 से 15 अगस्त 2020 के बीच लगभग 243 महिलाओं को अबॉर्शन की अनुमति लेने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा। इन मामलों में 138 वयस्क महिलाएं शामिल थीं जबकि 105 नाबालिग थीं। यह एक महत्वपूर्ण मुद्दा है कि वयस्क लोगों द्वारा बच्चे को जन्म देने के बजाय कानून के तहत अबॉर्शन के प्रावधान को चुनने पर भी उन पर ही सवाल खड़े किए जाते हैं।

यह वीडियो  Médecins Sans Frontières और www.HowToUseAbortionPill.org. की साझेदारी के तहत बनाया गया है। यह वीडियो सीरीज़ ये समझने में मददगार साबित होगी कि अबॉर्शन पिल्स सुरक्षित और आपकी पहुंच में हैं। पूरी वीडियो सीरीज़ देखने के लिए यहां क्लिक करें।

यौन और प्रजनन स्वास्थ्य और अधिकार पर शोध करने वाली अमरीकी संस्थान गुट्टमाकर इंस्टीट्यूट और मेडिकल पत्रिका द लैनसेट के भारत में अबॉर्शन और अनचाहे गर्भावस्था पर साल 2015 की एक रिपोर्ट के अनुसार देश में अनुमानित सालाना 15.6 मिलियन अबॉर्शन किए जाते हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक 22 प्रतिशत अबॉर्शन स्वास्थ्य सुविधाओं के तहत किए गए, 73 प्रतिशत मेडिकल अबॉर्शन स्वास्थ्य सुविधाओं से बाहर किए गए और 5 फीसद अबॉर्शन मेडिकल पद्धति के अलावा अन्य तरीकों के ज़रिये स्वास्थ्य सुविधाओं के बाहर किए गए। अबॉर्शन को रूढ़िवादी समाज का अनैतिक समझना और लोगों के मन में अबॉर्शन से बच्चे को मारने की धारणा गढ़ देने के वजह से ज़रूरत या इच्छा होने के बावजूद, सेल्फ मैनेज्ड मेडिकल अबॉर्शन को चुनते लोग खुद को दोषी समझते हैं। बिना मेडिकल सहायता या देखरेख के जब लोग अबॉर्शन को चुनते हैं, तो इससे खतरा होने की आशंका भी रहती है। साथ ही, अबॉर्शन के खर्च के लिए पारिवारिक मदद या समर्थन नहीं मिलता जिससे मानसिक रूप से तनाव और चिंता बनी रहती है। ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता की भारी कमी और दक़ियानूसी सोच के बीच यदि लोग अबॉर्शन का विकल्प चुनते भी है तो डॉक्टर और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी के कारण आर्थिक बोझ और अधिक हो जाता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार असुरक्षित अबॉर्शन से होने वाली मृत्यु या विकलांगता के अलावा महिलाओं या उनके परिवारों, समुदाय और स्वास्थ्य प्रणालियों पर सामाजिक और वित्तीय लागत लगती है। विकासशील देशों में असुरक्षित अबॉर्शन से होने वाली जटिलताओं के इलाज के लिए 553 मिलियन अमेरिकी डॉलर तक खर्च आता है। यह विडम्बना ही है कि एक ओर हमारा पितृसत्तात्मक समाज अबॉर्शन की निंदा करता है और नकारता है वहीं दूसरी ओर गैरकानूनी तरीके से गर्भावस्था में लिंग जांच कर कन्या भ्रूण हत्या भी करवाता है। लोगों का अबॉर्शन के लिए सेल्फ मैनेज्ड मेडिकल तरीका चुनना उनका अधिकार होना चाहिए। इसके लिए समाज के प्रति उन्हें जवाबदेह होने की ज़रूरत नहीं है और न ही अपराधी महसूस करने की। सामाजिक पूर्वाग्रह, रूढ़िवादी धारणा और पितृसत्तात्मक सोच को ताक पर रखकर लोगों के अधिकार, प्रजनन स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए उन्हें वास्तव में अबॉर्शन करवाने की आज़ादी दी जानी चाहिए।

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(यह लेख HowToUse Abortion Pill और फेमिनिज़म इन इंडिया की पार्टनशिप के तहत लिखा गया है। HTU अबॉर्शन पिल्स से जुड़े तथ्य, रिसोर्स जैसे अबॉर्शन पिल्स लेने से पहले किन बातों का ख्याल रखना चाहिए, ये पिल्स कहां उपलब्ध हो सकती हैं, इनका इस्तेमाल कैसे किया जाए और कब चिकित्सक की ज़रूरत पड़ सकती है, जैसी जानकारियां साझा करने का काम करता है। HTU का सेफ़ अबॉर्शन असिस्टेंट Ally अबॉर्शन पिल्स से जुड़ी सभी जानकारियों पर आपकी मदद के लिए 24/7 उपलब्ध है। आप Ally से हिंदी और अंग्रेज़ी दो भाषाओं में बात कर सकते हैं। साथ ही फ्री वॉट्सऐप  नंबर +1 (833) 221-255 और  http://www.howtouseabortionpill.org/ के ज़रिये भी आप मदद ले सकते हैं)

तस्वीर साभार: The Conversation

कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से हिंदी में बी ए और पंजाब टेक्निकल यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद बतौर पत्रकार और शिक्षिका मैंने लम्बे समय तक काम किया है। बिहार और बंगाल के विभिन्न क्षेत्र में पले-बढ़े होने के कारण सामाजिक रूढ़िवाद, धार्मिक कट्टरपन्त, अंधविश्वास, लैंगिक और शैक्षिक असमानता जैसे कई मुद्दों को बारीकी से जान पायी हूँ। समावेशी नारीवादी विचारधारा की समर्थक, लैंगिक एवं शैक्षिक समानता ऐसे मुद्दें हैं जिनके लिए मैं निरंतर प्रयासरत हूँ।

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