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जेंडर आधारित हिंसा के ख़िलाफ़ चलने वाले सोलह दिवसीय अभियान के तहत जब हमलोगों ने बनारस ज़िले के गहरपुर ग्राम पंचायत (आराजीलाइन ब्लॉक) में सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में बनारस ज़िले के तेंदुई गाँव (सेवापुरी ब्लॉक) की मुसहर बच्चियों ने भी हिस्सा लिया। हम लोगों की संस्था की तरफ़ से बनारस ज़िले के तीन गाँव की मुसहर बस्तियों में अनौपचारिक शिक्षा कार्यक्रम चलाया जाता है, जिसमें भाग लेने वाली छोटी बच्चियों और लड़कियों ने भी इस कार्यक्रम हिस्सा लिया। हम लोगों को कहा गया कि ‘बच्चियाँ जो भी आत्मविश्वास के साथ बोल या कर सकती है उन्हें मंच पर आना होगा।

कार्यक्रम के दिन पहले तो बच्चियों के माता-पिता उन्हें भेजने को तैयार नहीं हुए, उन्हें डर था कि ये सभी लड़कियाँ है और गाँव के किसी कार्यक्रम में कभी गयी ही नहीं, ख़ासकर वहाँ जहां सभी खासकर उनसे तथाकथित ऊँची जाति के लोग हो, ऐसे जगह पर वे कैसे जा सकेंगीं। लेकिन फिर हम लोगों ने बच्चियों को अपने साधन से कार्यक्रम में लाने का इंतज़ाम किया और कुल सात बच्चियों ने कार्यक्रम में हिस्सा लिया और अपनी कविताओं की प्रस्तुति दी। ये उस गाँव में पहली बार था जब मुसहर बस्ती की लड़कियां गाँव के किसी कार्यक्रम में हिस्सा ले रही थीं।

कार्यक्रम में सम्मानित होती मुसहर बच्चियाँ

इन प्रस्तुतियों की शुरुआत के एक-दो प्रस्तुतियों में जब बच्चियों ने कविता-पाठ किया तो ये गाँव के लिए किसी अचंभे से कम नहीं था। इसके बाद पाँच साल की प्रीति ने हूलाहुप की अपनी प्रस्तुति दी। प्रस्तुति से पहले कार्यक्रम में हिस्सा ले रही कई अन्य लड़कियों ने पहले ही आवाज़ दी, ‘इसके बाद हमलोगों को मौक़ा दीजिएगा। हम इससे बेहतर हूलाहुप करेंगें।‘ पाँच साल की छोटी प्रीति ने दो मिनट-तेरह सेकंड तक लगातार जब साइकिल के पुराने टायर के साथ हूलाहुप की प्रस्तुति दी तो चारों तरफ़ तालियों की गूंज और प्रीति का नाम था। इतना ही नहीं सड़कों पर आते-जाते लोग खड़े होकर प्रीति की प्रस्तुति देखने लगे। प्रीति ने बेहद आसानी से दो मिनट-तेरह सेकंड तक बिना रुके लगातार हूलाहुप का एक रिकार्ड बना दिया, जिसे चुनौती देने के लिए किसी की भी हिम्मत नहीं हुई। ये अपने आप में इस गाँव के इतिहास का एक नया अध्याय जैसा रहा। बता दें कि बेहद सीमित संसाधनों में हमलोगों ने इन बच्चों के साथ शिक्षा और खेलकूद का ये कार्यक्रम शुरू किया और हूलाहुप जैसे गेम के लिए साइकिल के पुराने टायर जैसे देशी साधन का इस्तेमाल करना शुरू किया। 

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वह समाज जो लड़कियों को हमेशा लड़कों से कमतर समझता है और इस भेदभाव की परत तब और मोटी व क्रूर हो जाती है जब लड़कियाँ दलित जाति से आती हैं। आज़ादी के इतने साल बाद, आज भी मुसहर जाति के लोग हाशिए में रहने को मजबूर है। ऐसे में जब हम इन्हें मुख्यधारा से जोड़ने की बात करते है तो हमें हर स्तर पर काम करने की ज़रूरत होती है। प्रीति की प्रस्तुति ने न केवल कार्यक्रम के मंच पर बल्कि जातिगत भेदभाव से भरे लोगों के विचारों के बीच अपनी जगह को बेहद मज़बूती से क्लेम किया। अक्सर कहा जाता है कि अगर हम समाज में कोई बदलाव लाना चाहते है ख़ासकर जब वो बदलाव हाशिएबद्ध समुदाय को मुख्यधारा से जोड़ने का है तो उसके लिए सार्वजनिक सांस्कृतिक कार्यक्रम एक सशक्त माध्यम है।

वो समाज जो लड़कियों को हमेशा लड़कों से कमतर समझता है और इस भेदभाव की परत तब और मोटी व क्रूर हो जाती है जब लड़कियाँ दलित जाति से आती हैं।

जब हमलोगों को मुसहर बच्चियों को इस कार्यक्रम में भागीदारी करवाने के लिए कहा गया था तब इन प्रभावों को मैं नहीं सोच पा रही थी, लेकिन कार्यक्रम की शुरुआत में इन बच्चियों के साथ कैसे गाँव के लोग फ़ोटो खिंचाने लगे और तालियों के साथ बच्चियों का उत्साहवर्धन कर रहे थे ये देखने लायक़ था।

प्रीति की हूलाहुप की प्रस्तुति

इसे हमलोग समावेशी नारीवाद ही कहेंगें, जहां न केवल महिलाओं बल्कि समाज में वर्ग, जाति, योग्यता और अवसर जैसे अलग-अलग मानकों पर महिलाओं के संघर्षों को ध्यान में रखकर उन्हें समानता में लाने का प्रयास किया जाए। हो सकता बहुत लोगों को इन बच्चियों की कार्यक्रम में भगीदारी आम बात लगे, लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है। क्योंकि सच्चाई यही है कि आज भी गाँव की बस्तियाँ, वहाँ की गालियाँ वहाँ रहने वाले लोगों की जाति से जानी जाती है। इतना ही नहीं, गाँव चाहे जो भी हो उत्तर भारत में आज भी गाँव में मुसहर बस्तियाँ हमेशा गाँव के बाहरी हिस्सों पर है, जहां तक सभी योजनाएँ पहुँचते-पहुँचते सरकारें बदल जाती है। ये समाज की एक कड़वी सच्चाई है, ऐसे में उस समुदाय से ताल्लुक़ रखने वाली बच्चियाँ जब पूरे आत्मविश्वास के साथ उसी गाँव के मंच से अपनी कला का प्रदर्शन करे तो ये न केवल समाज में उनका स्पेस क्लेम करता है बल्कि आने वाले समय में नए रास्ते और बहुत-सी रूढ़िवादी धारणाओं को तोड़ने का भी काम करती है।

प्रीति की ये दमदार प्रस्तुति इसबात का भी उदाहरण है कि गाँव में आज भी कितनी दबी प्रतिभाएँ है जिन तक समाज के विकास की पहुँच नहीं बन पायी है। जाति, वर्ग और धर्म जैसे अलग-अलग भेदों की मार झेलते समाज के अलग-अलग वर्गों में बहुत ही प्रतिभाएँ उभर ही नहीं पाती, इसलिए ज़रूरी है कि गाँव की ऐसे अद्भुत प्रतिभाओं को उजागर कर उन्हें और निखारा जाए, जो आने वाले समय में देश को एक नयी दिशा देने में मदद करेंगीं।  

और पढ़ें : गांव की वे बस्तियां जो आज भी वहां रहने वाले लोगों की ‘जाति’ के नाम से जानी जाती हैं 


(ये सभी तस्वीरें नेहा की तरफ़ से उपलब्ध करवायी गयी है।)

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