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हमारे समाज में जाति-व्यवस्था बहुत मज़बूती से काम करती है। शहर में रहने वाले लोग अक्सर यह कहते हैं कि अब कोई जातिगत भेदभाव नहीं होता और न ही इसे कोई मानता है। मैं कभी किसी शहर गई नहीं, बनारस से क़रीब तीस किलोमीटर दूर मेरा गांव देईपुर है जिसकी हरिजन बस्ती में मेरा घर है। इसलिए शहर के बारे में कुछ भी कहना मेरे लिए मुश्किल है पर हां, गांव में अपनी जाति और यहां मौजूद जाति व्यवस्था के बारे में ज़रूरी बात कर सकती हूं। जिस क्षेत्र में मेरा गांव है और मेरी जानकारी में जितने भी गांव हैं, हर गांव में रहने वाली अलग-अलग जाति के लोगों के लिए जगह अलग है। जैसे शहर में किसी कॉलोनी या मोहल्ले को किसी नाम से जाना जाता है, गांव में वैसे ही किसी बस्ती या टोले को वहां रहने वाले लोगों की जाति के नाम से जाना जाता है। मैं हरिजन जाति से ताल्लुक़ रखती हूं, इसलिए मेरे दादा-परदादा गांव के बाहरी हिस्से में रहते थे जहां सभी हरिजन जाति के लोग रहते हैं इसलिए हमारी बस्ती को हरिजन बस्ती कहते हैं।

मैंने आठवीं तक पढ़ाई की है क्योंकि हमारी जाति में आज भी लड़कियों को ज़्यादा पढ़ाया नहीं जाता है पर मुझे पढ़ने का बचपन से बहुत शौक़ था। घर में छह बहनों वाले बड़े परिवार में मेरे पिता एक कमाने और दस खाने वाले थे, इसलिए घर में सभी बेटियों की शादी को ज़्यादा ज़रूरी मानकर सभी की शादी कर दी गई। मैं सबसे छोटी हूं और परिवारवाले बाकी बहनों की शादी में क़र्ज़ से दबे हुए हैं, इस वजह से अभी शादी की समस्या से बची हूं। मैं भले ही आठवीं कक्षा के बाद नहीं पढ़ सकी लेकिन बड़ी कक्षाओं की किताबें या कोई भी पत्रिका-अख़बार पढ़ने का मुझे जब भी मौक़ा मिलता मैं ज़रूर उसे पढ़ती हूं।

जब हम दलित महिलाओं और लड़कियों की स्थिति देखते हैं तो विकास के हर अवसर शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार पर उन्हें सबसे निचले पायदान में पाते हैं।

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उम्र बढ़ने के साथ जब मैंने जाति-व्यवस्था को समझना शुरू किया और अब जब मैं अपनी बस्ती में रहने वाली कई और लड़कियों को भी देखती हूं, जिनकी घर की स्थिति बेहतर है, लेकिन वे पढ़ना नहीं चाहती हैं। इसे लेकर जब भी मैं अपनी मां से बात करती हूं तो वह कहती हैं कि हमलोगों की जात में औरतों को ज़्यादा पढ़ाया नहीं जाता। अब लड़कियां हिम्मत करके स्कूल जाने की कोशिश भी करती हैं तो ऊंची जाति वाले इतना परेशान कर देते हैं कि सब पढ़ाई छोड़ देती हैं। जैसे ही कोई एक लड़की स्कूल छोड़ती है उस बस्ती ही सब लड़कियां स्कूल छोड़ देती हैं। मुझे नहीं मालूम की मेरी हरिजन बस्ती की किसी लड़की ने कभी कॉलेज का मुंह देखा भी है या नहीं पर यह ज़रूर मालूम होता है कि निचली जाति से होने की वजह से लड़कियां ख़ुद भी बहुत जोखिम नहीं लेना चाहती हैं। वे अपनी बस्ती में ही ख़ुद को सुरक्षित महसूस करती हैं। इसके साथ ही, चूंकि हमलोगों की बस्ती में अभी तक किसी लड़की ने कॉलेज तक पढ़ाई नहीं की और न ही शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ी इस वजह से लड़कियों को कोई प्रेरणास्रोत नहीं मिलता। वे अपने बच्चों को तो अच्छे स्कूल में पढ़ाने का सपना देखती हैं पर ख़ुद पढ़ने की चाह नहीं रखती हैं।

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गांव की तथाकथित ऊंची जाति के लोग कहते हैं कि अब हरिजनों के पास सारी सुविधाएं आ गई हैं और उनका विकास हो गया है। बेशक अब हमारी बस्ती में टीवी और हर घर के बाहर मोटरसाइकिल आम हो चुके हैं, लेकिन सुविधाओं और एक समुदाय का विकास क्या बस यहीं तक सीमित है? जब हम दलित महिलाओं और लड़कियों की स्थिति देखते हैं तो विकास के हर अवसर शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार पर उन्हें सबसे निचले पायदान में पाते हैं। आरक्षण के कारण दलित पुरुष तो फिर भी काम करने लगे हैं, लेकिन महिलाएं अभी भी ‘महिला’ होने और ‘हरिजन’ जाति की होने की वजह से बहुत पीछे ढकेल दी जाती हैं। आज भी हमारी बस्ती की महिलाओं को दूसरों के खेतों में मज़दूरी करने जाना होता है क्योंकि मज़दूरी के अलावा हमलोगों को और कोई काम नहीं सिखाया ही नहीं गया और ना ही इतना जागरूक किया गया कि हम अपने अवसर ख़ुद तलाश सकें। तो जो भी लोग ये कहते हैं कि जात-पात सब ख़त्म हो चुका है उन्हें गांव में जाति से पहचाने जाने वाली बस्तियों में ज़रूर जाना चाहिए और वहां की महिलाओं की हालत उनके कपड़ों की बजाय उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार से परखना चाहिए। 

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तस्वीर साभार : International Dalit Solidarity Network

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