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तस्वीर साभार : scroll.in
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जब तीस वर्षीय शादीशुदा नीतू (बदला हुआ नाम) अच्छे तरीक़े से कपड़े पहनकर सज-संवरकर रहती है तो आसपास के लोगों को ये बिल्कुल रास नहीं आता। नीतू को लेकर आसपास के ग़लत-ग़लत बातें बनाते है और कई बार तो उसके चरित्र पर भी सवाल करने लगते है। वे कहते है कि ‘इसका पति को बाहर रहता है तो फिर ये क्यों और किसके लिए सजती है?’

पचास वर्षीय फूलकुमारी (बदला हुआ नाम) जब किसी तीज़-त्योहार या काम-प्रयोजन में रंगीन साड़ी पहन लेती तो पूरे परिवार और समाज को ये बहुत बुरा लग जाते है। वे कहने लगते है कि ‘पति को मरे इतने साल हो गए। बुढ़ापा आ गया है और अभी भी इन्हें सजने-सँवरने में शर्म नहीं आती।‘

उन्नीस साल की पूजा (बदला हुआ नाम) सज-संवरकर रहती है और अपने पसंद के कपड़े पहनती है, तो उसे भी अपने घर में और आसपास वालों से ताने सुनने को मिलते है। घर वाले कहते है कि ‘ऐसे तैयार होने की वजह से ही यौन उत्पीड़न की घटनाएँ होती है।‘

नीतू, फूलकुमारी और पूजा, ये तीनों ही अलग-अलग उम्र, परिवेश और वैवाहिक प्रस्थिति से ताल्लुक़ रखती है। लेकिन इन तीनों के लिए अच्छी तरह और अपनी मर्ज़ी से तैयार होना किसी चुनौती से कम नहीं है। कितना अजीब है न कि जिस समाज में हमेशा महिलाओं को सजने-सँवरने का गुण सिखाया जाता है, वहीं ही महिलाओं का संजना उनके लिए कई बार चुनौती बनने लगता है। पर ये चुनौती तब बनता है जब वो समाज के बनाए और बताए गए मानको या नियमों की बजाय अपनी मर्ज़ी से अपने अनुसार तैयार होती है। भारतीय संविधान, मौलिक अधिकार के रूप में देश के हर नागरिक बिना जेंडर, धर्म, जाति और वर्ग से परे अपने अनुसार जीने की आज़ादी देता है। वो अपने अनुसार खा सकता है, अपनी पसंद के कपड़े पहन सकता है और अपने हिसाब से ज़िंदगी जी सकता है। लेकिन अपने समाज का अलिखित क़ानून इस अधिकार में जेंडर की दीवार को लेकर बेहद सख़्त है। ख़ासकर महिला के संदर्भ में।

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महिलाओं की अलग-अलग उम्र और वैवाहिक प्रस्थिति के अनुसार ही उसके संजने की योग्यता और वैध्यता को समाज निर्धारित करता है, पर इन सबमें पुरुष का होना सबसे ज़्यादा ज़रूरी समझा जाता है।

अपने पितृसत्तात्मक समाज ने महिलाओं की यौनिकता पर शिकंजा कसा है। पितृसत्ता ने महिलाओं के शरीर, अस्तित्व और जीवन के मायने को पुरुषों की उनकी ज़िंदगी की मौजूदगी के आधार पर ही सही और ग़लत बताया है। जब कोई लड़की बिना शादी के सजती-संवरती है तो उसे महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा, (खासकर यौन उत्पीड़न, बलात्कार और एसिड अटैक) का प्रमुख कारण मान लिया जाता है। पर जब कोई शादीशुदा औरत संजती-संवरती है तो उसे सही और ज़रूरी कहा जाता है, लेकिन सिर्फ़ तब तक जब तक उसका पति उसके साथ है। पति की ग़ैर-मौजूदगी में अगर वही महिला सजती-संवरती है तो इसे पूरी तरह ग़लत माना जाता है। वही जब कोई विधवा या तलाक़शुदा महिला सजती-संवरती है तो उसे समाज पाप के दायरे में रखने लगता है।

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महिलाओं की अलग-अलग उम्र और वैवाहिक प्रस्थिति के अनुसार ही उसके संजने की योग्यता और वैध्यता को समाज निर्धारित करता है, पर इन सबमें पुरुष का होना सबसे ज़्यादा ज़रूरी समझा जाता है। हाल ही में, चित्रसेनपुर गाँव में रहने वाली सोनी (बदला हुआ नाम) के पति ने उसके साथ बुरी तरह मारपीट की, सिर्फ़ इसलिए क्योंकि जब उसका पति मज़दूरी करने गया तब सोनी ने नहा-धोकर नयी साड़ी पहनी थी। उसके पति ने इस शक के आधार पर उसके साथ मारपीट की सोनी का किसी और पुरुष के साथ संबंध है, इसलिए उसके मज़दूरी पर जाने के बाद उसने नयी साड़ी पहनी। घरेलू हिंसा का कोई बहाना नहीं हो सकता है, पर इसके बावजूद अगर कोई पुरुष इस सोच के साथ किसी महिला के साथ हिंसा करता है तो महिला की यौनिकता पर पितृसत्ता के शिकंजे को समझा जा सकता है।

किसी भी इंसान को कब क्या पहनना है, कैसे तैयार होना है, ये सब सिर्फ़ और सिर्फ़ वो इंसान ही तय कर सकता है। लेकिन पितृसत्ता कभी भी महिला को इंसान नहीं मानती है, इसलिए उसके लिए महिला के कोई भी अधिकार मायने नहीं रखते है। यहाँ ये भी समझने की ज़रूरत है कि महिला के सजने-सँवरने के लिए पुरुष का होना ज़रूरी क्यों माना जाता है? ऐसा इसलिए क्योंकि पितृसत्ता महिला की ज़रूरत, उसका होना या न होना और उसका किस तरह से होना, ये सब सिर्फ़ पुरुष के होने पर भी निर्भर करता है। पितृसत्ता हमेशा पुरुष को महिला से बेहतर मानती है और महिला का काम सिर्फ़ परिवार बढ़ाने और घर संभालने ही मानती है, ऐसे में महिला की इच्छा, उसका अधिकार, उसकी सहमति या असहमति कभी भी मायने नहीं रखती है।

हम ऐसा क्यों मान लेते है कि अच्छी तरह तैयार होने, संजने-सँवरने की इच्छा महिला की अपनी भी हो सकता है। वो हमेशा किसी की बजाय ख़ुद के लिए संजना पसंद कर सकती है या ये भी हो सकता है कि किसी महिला को संजना पसंद न भी हो, ये सब सिर्फ़ किसी भी महिला का अपना व्यक्तिगत फ़ैसला होना चाहिए, जिसे समाज को सहजता से स्वाभाविक रूप से स्वीकार करना चाहिए, बजाय इन सबमें पुरुषों की मौजूदगी को तलाशना। हमलोगों को ये अच्छे से समझना होगा कि महिलाओं की जीवनशैली पर सिर्फ़ उनका अधिकार है, जिसका उनके शादीशुदा होने या न होने से कोई लेना-देना नहीं होना चाहिए।       

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रेनू वाराणसी ज़िले के रूपापुर गाँव की रहने वाली है। ग्रामीण महिलाओं और किशोरियों के साथ समुदाय स्तर पर रेनू बतौर सामाजिक कार्यकर्ता काम भी करती हैं और अपने अनुभवों व गाँव में हाशिएबद्ध समुदाय से जुड़ी समस्याओं को लेखन के ज़रिए उजागर करना इन्हें बेहद पसंद है।

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