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यह दुनिया के पितृसत्तात्मक समाज की रवायत है कि यहां हर अधिकार पुरूष को जन्मजात मिलते हैं। इसके विपरीत महिलाओं को उस अधिकार के लिए एक लंबा संघर्ष करना पड़ता है। दुनिया भर में महिलाओं ने वोट देने के अधिकार के लिए भी एक लंबी लडाई लड़ी थी। उस समय महिला अधिकार आंदोलन की पहली प्राथमिकता महिलाओं को वोट देने और कार्यालय चलाने का अधिकार दिलाना थी। महिला मताधिकार आंदोलन की औपचारिक शुरुआत 1848 की गर्मियों में न्यूयॉर्क में सेनेका फॉल्स कन्वेंशन में हुई थी। 19वीं शताब्दी के मध्य में दुनिया के अमेरिका, ब्रिटेन जैसे देशों ने मताधिकार के लिए संघर्ष करने के लिए संगठनों का गठन किया। 1888 में पहला अंतरराष्ट्रीय महिला अधिकार संगठन, ‘अंतरराष्ट्रीय महिला परिषद’ (आईसीडब्ल्यू) का गठन किया गया। 1904 में ब्रिटिश महिला अधिकार कार्यकर्ता मिलिसेंट फॉसेट, अमेरिकी कार्यकर्ता कैरी चैपमैन कैट और अन्य प्रमुख महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ने अंतरराष्ट्रीय महिला मताधिकार गठबंधन का गठन किया। इससे पहले गठित आईसीडब्ल्यू महिलाओं के वोट अधिकार के लिए सजगता से काम करने में नाकाम रहा था। आंदोलन को अपने लक्ष्य तक पहुंचने में एक लंबा समय लगा।

न्यूजीलैंड में मिला सबसे पहले वोटिंग अधिकार

महिलाओं को सबसे पहले वोटिंग का अधिकार देने वाला देश ब्रिटिश उपनिवेश का न्यूजीलैंड था। जिसने 19 सितंबर 1893 में चुनावी विधेयक पारित किया था। न्यूजीलैंड के लार्ड ग्लास्गो ने 19 सितंबर को महिलाओं को वोटिंग अधिकार देने वाले बिल पर हस्ताक्षर किए थे। इस उपलब्धि के लिए केट शेपर्ड ने न्यूजीलैंड की धरती पर महिला के मताधिकार के लिए लंबा आंदोलन चलाया था। जिनकी तस्वीर वहां के 10 डॉलर के नोट पर छपी हैं।

यूरोप में महिला मताधिकार

दुनिया के अन्य लोकतंत्रिक व्यवस्थाओं ब्रिटेन और अमेरिका में प्रथम विश्व युद्ध के बाद तक महिलाओं को वोट का अधिकार नहीं मिला। 1894 में ब्रिटिश उपनिवेश के दक्षिणी ऑस्ट्रेलिया ने महिला को पूर्ण मताधिकार दिए। 1902 तक आते-आते पूरे देश में महिला मताधिकारों का पालन किया गया। हालांकि ऑस्ट्रेलिया के स्वदेशी लोगों को 1949 तक इससे बाहर रखा गया। जबकि संघीय चुनावों में सभी स्वदेशियों को वोट देने का अधिकार दिया गया था। यह प्रतिबंध 1962 में वापिस लिया गया।

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अन्य देशों में भी महिलाओं के मताधिकार के लिए संघर्ष लगातार चल रहे थे। यूरोप में 1906 में फिनलैंड ने सबसे पहले महिलाओं को वोट करने का अधिकार दिया।20वीं सदी की शुरुआत में स्वीडन, ब्रिटेन और कुछ अमेरिकी राज्यों ने महिलाओं को सीमित अधिकार दिए। 1914 में प्रथम विश्व युद्ध की शुरू हो जाने के बाद से कुछ मताधिकार संगठनों ने अपना ध्यान युद्ध की ओर लगा लिया। इस दौरान कुछ संगठन महिला मताधिकारों के लिए लगातार संघर्ष करते रहे। युद्ध करने वाले देशों में जनशक्ति की कमी के दौरान महिलाओं ने पारंपरिक रूप से पुरुषों द्वारा निभाई जाने वाली भूमिकाओं को निभाया। इसी दौरान उन्होंने अपने मताधिकार आंदोलन को ‘महिला क्या करने में सक्षम है’ जैसे विचार की ओर केंद्रित कर लिया। 1918 में अज़रबैजान पहला मुस्लिम देश बना, जिसने महिलाओं को वोट करने का अधिकार दिया। नवंबर 1918 में ब्रिटेन की संसद में ‘महिला पात्रता अधिनियम’ पारित किया। जिसमें महिलाओं को संसद में निर्वाचित होने की अनुमति दी। दस साल बाद लोक प्रतिनिधत्व एक्ट के माध्यम से महिलाओं को वोट देने का अधिकार दिया गया। ब्रिटेन की तरह ही डेनमार्क, आइसलैंड, नीदरलैंड, कनाडा, ऑस्ट्रिया, चेकोस्लोवाकिया, पॉलेंड, स्वीडन, जर्मनी, लक्जमबर्ग और संयुक्त राज्य अमेरिका ने महिलाओं को वोट के अधिकार दिए।

इसके बहुत बाद तक भी यूरोप के अन्य देशों ने महिलाओं को वोट के अधिकार नहीं दिए। 1931 में स्पेन, 1944 में फ्रांस, और 1946 में बेल्जियम, इटली, रोमानिया और यूगोस्लाविया ने महिलाओं को वोट के लिए अधिकार दिए। लैटिन अमेरिकन देश इक्वाडोर (1929) और अर्जेंटीना (1946) में महिलाओं को राष्ट्रीय वोट का अधिकार दिया। अफ्रीका के स्वतंत्र होने पर वहां महिला व पुरुष दोनों को समान मताधिकार दिए गए। इसी तरह भारत में भी ब्रिटिश शासन खत्म होने के बाद से ही महिला व पुरुष को समान मताधिकार दिए गए। 1950 में भारतीय संविधान के लागू होने के बाद महिलाओं को संविधान के तहत सार्वभौमिक मताधिकार दिए गए। द्धितीय विश्व युद्ध के बाद मध्य पूर्वी देशों ने महिलाओं को वोट करने का अधिकार दिया। महिलाओं को वोट करने के अधिकार देने की लंबी लड़ाई इक्कीसवीं सदी तक भी चलती रही। कुवैत में 2005 में महिलाओं को वोट का अधिकार मिला। 2015 में सउदी अरब में पहली बार महिलाओं ने स्थानीय निकाय चुनाव में वोट दी थी।

अमेरिका में महिला मताधिकार

अमेरिका में महिला मताधिकार की यात्रा 1848 में सेनेका फॉल्स कन्वेंशन से चल रही थी। इस सम्मेलन का आयोजन लुक्रेटिया मॉट और एलिजाबेथ कैडी स्टैंटन ने किया था। 1851 में स्टैंटन ने अपने मित्र सुसन बी. एंथनी को भी इस आंदोलन में शामिल किया। एंथनी उस समय आंदोलनों में बहुत सक्रिय थी। दोनों ने मिलकर गुलामी के विरूद्ध और महिला मताधिकारों के लिए संघर्ष किए। इन दोनों नें 1863 में गुलामी खत्म करने और काले और महिलाओं के लिए पूर्ण नागरिकता के लिए ‘नेशनल लॉयल लीग’ का गठन किया। यह लीग तेरहवें संशोधन के समर्थन मे थी।

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राष्ट्रीय महिला मताधिकार संघ

1869 में राष्ट्रीय महिला मताधिकार संघ का गठन सुसान बी. एंथनी और एलिजाबेथ स्टैंटन ने न्यूयार्क में किया था। एक समय महिला अधिकार आंदोलन अफ्रीकी अमेरिकन के वोट के मुद्दे के साथ दो भागों में बंट गया था। उस समय एनडब्ल्यूएसए ने आंदोलन को महिला मताधिकारों को पहली प्राथमिकता दी। समूह ने सार्वजनिक रूप से महिला मताधिकारों के साथ महिला के शादी और तलाक जैसे मुद्दों पर भी बहस छेड़ दी थी। साथ ही इस समूह ने अमेरिका के सभी महिला मताधिकार संगठनों को एनडब्ल्यूएसए का हिस्सा बनने के लिए भी आमंत्रित किया। 20वीं सदी की शुरुआत में संगठन को पुनर्गठित किया गया और कार्रवाई में बदलाव भी किए। 1914 में एलिस पॉल और लूसी बर्न एनडब्ल्यूएसए से असंतुष्ट हो गए और उन्होंने कांग्रेस यूनियन का गठन किया। यह संगठन एनडब्ल्यूएसए से अधिक उग्र था। ये अधिकार की मांग में भूख हडताल, गिरफ्तारी और प्रदर्शन लगातार कर रहे थे।

कांग्रेस यूनियन ने सीधे तौर पर डेमोक्रेटिक पार्टी पर दबाव डालने पर ध्यान दिया। 1916 में इस संगठन ने अपना नाम बदलकर राष्ट्रीय महिला पार्टी रख लिया। इसके बाद इस संगठन ने व्हाइट हाउस के सामने लगातार धरना प्रदर्शन और उग्र तरीके से करने शुरू कर दिए। एनडब्ल्यूपी ने सरकार को देश में महिलाओं को वोट का अधिकार न देने और विदेशों में लोकतंत्र की बहाली के मुद्दे पर खूब आलोचना की। उन्होंने कांग्रेस पर दबाव डालने के लिए 1916 में वाशिगंटन में एक प्रचार ब्यूरो की स्थापना की। जून 1917 में एनडब्ल्यूपी के सदस्यों को यातायात में बाधा डालने के लिए गिरफ्तार किया गया था। कार्यकर्ता ने गिरफ्तारी, भूख हडताल को जबतक जारी रखा तबतक उन्नीसवें संशोधन की पुष्टि नहीं हुई।

अब आंदोलन को बड़ा समर्थन मिलने लगा था। अन्य दक्षिण के राज्यों की तरह, महिलाओं के मताधिकार आंदोलन की मांग तेजी से होने लगी थी। टेनेसी में आंदोलन की अंतिम युद्धभूमि बन गया था। वहां अन्य दक्षिण के राज्यों की तरह महिला मताधिकार आंदोलन को उन्नमूलन आंदोलन से जोड़ा गया। इससे अलग डिक्सी में देश के अन्य भागों में नारीवाद आंदोलन का विस्तार हुआ। कुछ लॉबिया महिला आंदोलन के विरोध में खुलकर सामने आने भी लगी थी। कपड़ा निर्माताओं, रेलमार्ग संगठन ने महिला अधिकारों के विस्तार का विरोध किया। कुछ वकील भी महिलाओं के वोटिंग अधिकारों के खिलाफ आ गए थे। जिनमें कुछ महिला वोटिंग अधिकार को केवल राज्य तक ही सीमित रखना चाहते थे। वे वोटिंग अधिकार के राष्ट्रीय स्तर तक के विस्तार के खिलाफ थे। इस दौरान लगातार मार्च, गिरफ्तारियां, भूख हड़ताल का सिलसिला चल रहा था। 18 अगस्त 1920 में टेनेसी विधायिका ने 19वें संशोधन को मंजूरी दी। इस संसोधन में कहा गया था कि अमेरिका या किसी राज्य में लिंग के आधार पर किसी को वोट करने से मना नहीं किया जा सकता है। टेनेसी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स ने अपने पिछले वोट के अधिकार को रद्द कर दिया था। अंग्रेजी विदेश मंत्री ने 26 अगस्त को इसकी घोषणा की थी। एनएडब्ल्यूएसए और एनडब्ल्यूपी दोनों ने राष्ट्रीय और स्थानीय स्तर पर महिला के वोटिंग के अधिकार के लिए लंबे संघर्ष किए।

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तस्वीर साभारः BBC

स्त्रोतः www.historynet.com

मैं पूजा राठी पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली हूँ। अपने आसपास के माहौल मे फ़िट नहीं बैठती हूँ।सामाजिक रूढ़िवाद, जाति-धर्मभेद, असमानता और लैंगिक भेद में गहरी रूचि है। नारीवाद व समावेशी विचारों की पक्षधर हूँ। खुद को एक नौसिखिया मानती हूँ, इसलिए सीखने की प्रक्रिया हमेशा जारी रखती हूँ।

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