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क्या आप भी यह सोचते हैं कि भला विज्ञान के क्षेत्र में पितृसत्तात्मक चश्मा कैसे काम करता होगा? शरीर और मन पर आधारित मेडिकल साइंस में होनेवाले काम भला महिलाओं को लेकर एक पूर्वाग्रह से ग्रसित कैसे हो सकते हैं? क्या आपने कभी बोलचाल में, “क्यों हिस्टेरिक हो रही हो” जैसे वाक्य का इस्तेमाल किया है? लेकिन आप को जानना चाहिए कि महिलाओं के शरीर को लंबे समय तक समझा नहीं गया। इससे महिलाओं के शरीर का इलाज डॉक्टरों ने ग़लत तरीक़ों से किया। उनकी बीमारियों को लेकर भ्रांतियां बनी रहीं। महिलाओं को मेडिकल क्षेत्र में बतौर डॉक्टर काम करने के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ा है।

आयरलैंड की मार्गरेट एन ब्लकी अठारवीं शताब्दी के अंत में महिला होने की अपनी पहचान छिपाकर डॉक्टर जेम्स बेरी के नाम से डिग्री लेकर ब्रिटिश सेना में सर्जन का काम करती थीं। चौदहवीं शताब्दी की एक कहानी भी चर्चित है। कहानी के अनुसार एथेंस की एक महिला ने सामाजिक तौर पर पुरुष की वेषभूषा कहेजाना वाला रूप बनाकर हेरोफिलॉस के अंदर चिकित्सा सीखी। ऐसा इसलिए क्योंकि उस समय महिला चिकित्सक होने की सज़ा मृत्युदंड थी। ऐसे माहौल में महिलाओं के शरीर को समझे जाने और उस समझ के आधार पर मेडिसिन का विकास किए जाने की बात असंभव ही लगती है। इस तरह से ‘हिस्टीरिया’ नाम की एक बीमारी को महिलाओं के ख़िलाफ़ खड़ा किया गया।

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इतिहास हिस्टीरिया को इसे केवल महिलाओं की समस्या बताता था। कभी कहा गया महिला की यौन इच्छा अधूरी रह जाने पर ऐसा होता है, तो कभी कहा गया ‘बुरा साया’ पड़ जाने पर ऐसा होता है। इलाज़ के लिए सेक्स से लेकर क्लिटोरिस को हाथों से मसाज किए जाने के तरीक़े बताए गए।

ईसा पूर्व पांचवी शताब्दी में हिपोक्रेट्स ने पहली बार ‘हिस्टीरिया’ शब्द का प्रयोग किया। इसे सिर्फ़ महिलाओं को होनेवाली बीमारी कहा गया। उनके अनुसार यह बीमारी केवल महिलाओं को होती थी क्योंकि उनके पास गर्भ होता है, इसलिए हिस्टीरिया शब्द का अर्थ ही था विचरता गर्भ। यौन रूप से सुस्त हो जाना इसकी वज़ह बताई गई। उपचार के तौर पर महिलाओं को वैवाहिक संबंध में यौन क्रिया बढ़ाने को कहा गया। इस बात को अगर हम आज के जेंडर लेंस से देखें तो ये कई स्तर पर प्रॉब्लेमेटिक है। एक तो महिलाओं के शरीर को लेकर शून्य समझ। दूसरा, महिलाएं यौन क्रिया में रुचि नहीं रखती हैं जैसे विचार यहीं से जन्मते हैं। तीसरा, महिला की पहचान होने के लिए गर्भ होने को जरूरी बताया जाना। जबकि कई बार महिलाओं का गर्भ किसी कारण से निकाल दिया जाता है या ट्रांस महिलाओं के केस में भी गर्भ को महिला होने की पहचान से नहीं जोड़ा जा सकता है। 

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हिस्टीरिया का अर्थ आज खोजें तो जवाब आता है है कि अत्यधिक भावनात्मक होना जिसे नियंत्रित न किया जा सके। यह किसी भी इंसान के साथ हो सकता है। लेकिन इसका इतिहास हिस्टीरिया को इसे केवल महिलाओं की समस्या बताता था। कभी कहा गया महिला की यौन इच्छा अधूरी रह जाने पर ऐसा होता है, तो कभी कहा गया ‘बुरा साया’ पड़ जाने पर ऐसा होता है। इलाज़ के लिए सेक्स से लेकर क्लिटोरिस को हाथों से मसाज किए जाने के तरीक़े बताए गए। कहा जाता है डॉक्टर जे मोरटीमेर ग्रेंविल ने पहला वाइब्रेटर इसलिए बनाया था ताकि पुरुष डॉक्टरों को महिलाओं के हिस्टीरिया का इलाज़ करने में आसानी हो।

एक और थ्योरी दी गई जिसके अनुसार जब महिलाएं पुरुषों से सेक्स नहीं ‘लेना’ चाहती थीं वे पागल हो जातीं, चरमसुख न पा पाने की वजह से उनका ऐसा व्यवहार होता था। इसलिए उन्हें सेक्स की प्राप्ति के लिए पुरुषों पर आश्रित रहना था ताकि वे हिस्टीरिया के स्टेज तक न पहुंच जाए।

हिस्टीरिया महिला के यौन स्वास्थ्य या प्रजनन स्वास्थ्य से जुड़ी कोई दिक़्क़त नहीं है लेकिन इसे समझने में चिकित्सा क्षेत्र को कई सौ साल लगे। हिस्टीरिया का इतिहास बताता है कि जब डॉक्टरों को महिला शरीर से जुड़ी कोई बीमारी समझ नहीं आती थी वे इसे हिस्टीरिया का नाम दे देते थे, इससे उन्हें महिला शरीर को समझने या महिलाओं डॉक्टरों की ज़रूरत स्वीकारने के सच से छुट्टी मिल जाती। फ्रेड्रिक होल्लिक, उन्नीसवीं शताब्दी के सेक्स एडुकेटर और चिकित्सक ने कहा था, “जिनकी महावारी बिगड़ जाती है या विधवाएं या जिनके बच्चे न हो” उन्हें हिस्टीरिया होने की संभावना ज्यादा है।

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प्लेटो नामक दार्शनिक ने तो गर्भ को जीता-जागता जीव बताया दिया था। एक और थ्योरी दी गई जिसके अनुसार जब महिलाएं पुरुषों से सेक्स नहीं ‘लेना’ चाहती थीं वे पागल हो जातीं, चरमसुख न पा पाने की वजह से उनका ऐसा व्यवहार होता था। इसलिए उन्हें सेक्स की प्राप्ति के लिए पुरुषों पर आश्रित रहना था ताकि वे हिस्टीरिया के स्टेज तक न पहुंच जाए। इस तरह से न सिर्फ़ महिलाओं के अनुभवों को, उनके स्वास्थ्य को खारिज किया गया, बल्कि दुनिया को हेट्रनॉर्मल चश्मे से देखा गया है। महिलाओं के चरमसुख को केवल पेनिट्रेशन तक सीमित माना गया है। 

एक अन्य थ्योरी के मुताबिक महिलाओं द्वारा सेक्स की चाहत को खुलेआम ज़ाहिर करना हिस्टीरिया था। इसलिए उनकी यौनिकता को नियंत्रित करना ज़रूरी था, सेक्स की चाहत महिला द्वारा खुलेआम प्रदर्शित करने को अनैतिक और ‘बीमार’ कहा गया। अगर किसी अविवाहित महिला को डॉक्टर के मुताबिक हिस्टीरिया हो जाए तो सुझाए गए उपचार महिला का उसके शरीर पर से यौन अधिकार छीनने वाले थे। हस्थमैथुन यानी मास्टरबेशन वे कर नहीं सकती थीं क्योंकि ऐसा करना ईशनिंदा यानी ब्लासफेमी थी, इस के बाद पुरुष के हांथों में महिलाओं के यौन अधिकार आ जाते थे। 1980 में जाकर अमरीका के साइकोलोजिकल एसोसिएशन ने हिस्टीरिया के इस आइडिया को नकार दिया। हिस्टीरिया शब्द ही ग्रीक शब्द hystera से आता है जिसका अर्थ है गर्भ (यूटेरस) इसलिए इसे नकारा ही जाना चाहिए था। इसके बाद ‘conversion disorder’ शब्द लाया गया जिसके अंदर कई तरह के डिसऑर्डर आते हैं।

महिलाओं के स्वास्थ्य को जिस ऐतिहासिक ढंग से नकारा गया है उससे विज्ञान में पुरुषों के एकतरफ़ा वर्चस्व से हुए सामाजिक भेदभाव का मंजर दिखता है। आज भी महिलाओं को शारीरिक और मानसिक स्तर पर किसी कार्य को कर सकने में पुरुषों की तुलना में कमज़ोर समझा जाता है। ऐसा करने से न सिर्फ़ पितृसत्ता मज़बूत होती है बल्कि इससे जेंडर रोल को मजबूती मिलती है। जेंडर रोल को मजबूती मिलने से जेंडर का वह आइडिया जिसके मुताबिक जेंडर केवल समाज की थोपी सोच है कहीं न कहीं कमजोर होती है। ऐसा होने से क्वीयर समाज को अपनी आइडेंटिटी उसी कठोर जेंडर रोल के ढांचे में तलाशने की समस्या उठानी पड़ती है। इसलिए नारीवाद और क्वीयर लेंस, दोनों ही तरह से हिस्टीरिया ने समाज को लंबे समय तक असमानता से भरा स्पेस होने में अपना योगदान दिया है। कई महिला की पहचान वाले लोगों को बोलचाल के लहज़े में किसी परिस्थिति में ‘हिस्टेरिक’ कहकर उनके अनुभवों को खारिज़ करने की कोशिश की जा सकती है। ऐसा औपचारिक या अनौपचारिक किसी भी स्पेस में होता देखें तो ऐसा करने वाले/वालीं को तुंरत टोकें।

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तस्वीर साभार : Wellcome Collection

मेरा नाम ऐश्वर्य अमृत विजय राज है। फिलहाल दिल्ली विश्वविद्यालय से फिलॉसफी में मास्टर्स कर रही हूँ। और शुरुआती पढ़ाई लिखाई बिहार में हुई।  नारीवाद को ख़ासकर भारतीय संदर्भ में उसकी बारीकियों के साथ थ्योरी में और ज़मीनी स्तर पर समझना, जाति और वर्ग के दख़ल के साथ समझना व्यक्तिगत रुचि और संघर्ष दोनों ही है। मुझे आसपास की घटनाएं डॉक्यूमेंट करना पसंद है।

साल 2021 में रिज़नल और नेशनल लाड़ली मीडिया अवार्ड मिला।

कभी कभी/हमेशा लगता है "I am too tired to exist".

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