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तस्वीर साभार : thebetterindia
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‘पढ़ने की आज़ादी दी गयी है, इतना काफ़ी नहीं है, जो अब मीटिंग वग़ैरह में जाने की इजाज़त दी जाए।‘ ग़ुस्से में एक किशोरी की माँ ने ये बात उस दौरान कही जब मैं गाँव की किशोरियों के साथ मीटिंग के लिए गयी थी। महिला की इस बात के बाद बाक़ी किशोरियों के साथ इसी विषय पर चर्चा शुरू हुई और इसके बाद एक-एक करके किशोरियों ने अपनी चुनौतियों के बारे में बात करना शुरू किया।

भदया गाँव की वंदना (बदला हुआ नाम) ने बताया कि ‘मुझे अपनी पढ़ाई ज़ारी रखने के लिए घर में बहुत लड़ाई लड़नी पड़ी और घरवाले तमाम शर्तों के बाद परिवारवालों ने हमें पढ़ने की इजाजत दी गयी। घरवालों ने कहा कि – पढ़ाई हो चाहे न हो, लेकिन सुबह-शाम का खाना बनाना तुम्हारी ज़िम्मेदारी होगी। इसके साथ ही, पढ़ाई करने की छूट दी गयी है, इसके अलावा कभी भी किसी कार्यक्रम में हिस्सा नहीं लेना और न ही इसके अलावा कहीं आने-जाने की अनुमति होगी।‘ ये सब ऐसा है, जैसे पढ़ने की आज़ादी देना हमलोगों पर कोई एहसान जैसा है।

गाँव में किशोरियों की ये स्थिति कोई नयी बात नहीं है। अधिकतर गाँव में लड़कियाँ दो ही हाशिए पर दिखाई पड़ती है – या तो वो स्कूल जाती है या नहीं जाती है। लेकिन इसके अलावा उन्हें किसी भी अन्य कार्यक्रम से जोड़ना अपने आप में बहुत बड़ी चुनौती होती है। वंदना की ही तरह कम-ज़्यादा हर परिवार की यही हालत है, जहां लड़कियों को पढ़ने-लिखने आगे बढ़ने के अधिकार रियायत में मिलते है जैसे। यूँ तो शिक्षा का अधिकार किसी भी भारतीय नागरिक का मौलिक अधिकार है, जो लिंग, जेंडर, जाति, धर्म जैसे तमाम वर्ग से परे है लेकिन इसके बावजूद ये अधिकार गाँव में लड़कियों को मिलेगा, नहीं मिलेगा, कब मिलेगा, कितना मिलेगा, उसकी क्या सीमाएँ होंगीं, ये सारी बातों का निर्णय लड़कियों के अलावा पूरा समाज और परिवार करता है और अगर लड़कियों को ये अधिकार दिया भी जाता है तो उसकी भी इतनी नियम-शर्तें होती है कि एक समय के बाद लड़कियाँ खुद अपने कदम पीछे खींचने को मज़बूर हो जाती है। इसमें कई बार, स्कूल का दूर होना, पोषण की कमी से किशोरियों का गिरता स्वास्थ्य, स्कूल में शौचालय की अनुपलब्धता और यौन हिंसा जैसे कई समस्याएँ है, जिसकी वजह से कई बार लड़कियों को अपनी पढ़ाई रोकनी पड़ जाती है।

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पढ़ाई के बाद जब बात आती है लड़कियों की अतिरिक्त गतिविधियों में भागीदारी की, गाँव-समाज और अपने विकास के मुद्दों पर समझ बनाने और जागरूक होने की तो इसपर पितृसत्तात्मक समाज की लगाम और भी ज़्यादा कसी दिखाई पड़ती है। पितृसत्ता हमेशा से महिला एकता का विरोध करती है और वो किसी भी स्तर पर महिलाओं को एकजुट नहीं होने देना चाहती है और इसी विचार की वजह से ग्रामीण स्तर पर किशोरियों को किसी कार्यक्रम से जोड़ना और उन्हें ग्रामीण स्तर पर आयोजित होने वाली मीटिंग से जोड़ना काफ़ी चुनौतीपूर्ण होता है। लड़कियों की सीमित भागीदारी उनके नेतृत्व विकास को काफ़ी प्रभावित करती है, जिससे उनके में निर्णय-क्षमता का विकास भी बहुत सीमित होता है।

लड़कियों की सीमित भागीदारी उनके नेतृत्व विकास को काफ़ी प्रभावित करती है, जिससे उनके में निर्णय-क्षमता का विकास भी बहुत सीमित होता है।

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ऐसे में कुछ परिवारों में साफ़ शब्दों में लड़कियों को किसी भी कार्यक्रम में भाग लेने से मना कर दिया जाता है, लेकिन कुछ परिवार लड़कियों की भागीदारी के बाद उनसे इतने ज़्यादा सवाल करते है कि अक्सर लड़कियाँ ख़ुद भी हार मानने को मजबूर हो जाती है। हर अवसर के लिए लड़कियों पर कभी सुरक्षा तो कभी लाभ के मानक के आधार पर उनके कदम रोकने का प्रयास किया जाता है।

गाँव स्तर पर आयोजित होने वाली मीटिंग या ज़न जागरूकता कार्यक्रम में हिस्सा लेनी वाली लड़कियों अक्सर ये पूछा जाता है कि – वहाँ जाने से तुम्हें क्या फ़ायदा होगा? ये सवाल बहुत आम है, जिसका सामना हर दूसरी लड़की को करना पड़ता है और जब बात फ़ायदे की आती है तो उसे पितृसत्ता हमेशा पैसे या वस्तु से आंकती है। भले ही वो खुद अपने घर चौबीस घंटे काम करने वाली महिला को पैसे न दे लेकिन जैसे ही घर की महिलाएँ-लड़कियाँ कहीं जाती है तो उनसे फ़ायदे का हिसाब लेने लगती है। लेकिन इन सभी चुनौतियों के बाद धीरे-धीरे ही सही लड़कियाँ लड़ना सीख रही है और अपने अधिकारों को पहचान कर उसके लिए अड़ना सीख रही है, पर अभी भी इनकी संख्या बेहद सीमित है।

कहीं न कहीं लड़कियों की पढ़ने की आज़ादी को भी तमाम नियम-शर्तों के साथ लड़कियों को दिया जाता है। पढ़ाई के लिए उनको मिलने वाली आज़ादी भी पितृसत्ता के कठोर नियमों वाली पाबंदी से लैस होती है। इससे जब हम अलग-अलग क्षेत्रों और नेतृत्व की दिशा में किशोरियों की भागीदारी और विकास की बात करते है तो किताबी पढ़ाई तक सीमित लड़कियाँ उन तमाम अवसरों से दूर हो जाती है जो उनके विकास के लिए ज़रूरी है। यही वजह है कि कहने को लड़कियाँ हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही है, लेकिन अभी भी इन लड़कियों में ग्रामीण क्षेत्र से आने वाली लड़कियों की संख्या काफ़ी नहीं। इसलिए ज़रूरी है की महिलाओं के मौलिक अधिकारों को ज़मीनी स्तर पर सुरक्षित किया जाए, जिससे लड़कियाँ विकास की दिशा में आगे बढ़ सके और अपने अधिकारों के साथ विकास कर सके।

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लेखन के माध्यम से ग्रामीण किशोरियों और दलित समुदाय के मुद्दों को उजागर करने वाली नेहा, वाराणसी ज़िले के देईपुर गाँव की रहने वाली है। नेहा को किशोरी नेतृत्व विकास करने की दिशा में रचनात्मक कार्यक्रम करना पसंद है, वह समुदाय स्तर पर बतौर सामाजिक कार्यकर्ता काम भी करती हैं।

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